19 नवंबर 2011
संपादकीय
यह नर्मजोशी का माहौल नहीं
इंटरनेट पर ट्विटर पर आज दोपहर जावेद अख्तर ने लिखा कि इस माध्यम का उपयोग लोग दोस्ती, गर्मजोशी और खूबसूरत भावनाओं और विचारों के पुल की तरह करें। इसके बाद अमिताभ बच्चन सहित कुछ और लोगों ने इस बात से सहमत होते हुए इसे आगे बढ़ाया। लेकिन हमारी तरह के कुछ लोग इससे असहमत थे और उनका मानना था कि किसी भी सार्वजनिक संचार माध्यम या मीडिया का इस्तेमाल आज के जमाने में सिर्फ दोस्ती, सिर्फ गर्मजोशी और सिर्फ खूबसूरत भावनाओं के लिए नहीं हो सकता। जब चारों तरफ बेइंसाफी बिखरी हुई है तो कैसे कोई सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें कर सकता है।
कल से सुखराम की खबरें आने लगीं तो लोगों को याद आया कि एक वक्त वह भाजपा के साथ भी था। उसके घर से करोड़ों के नगद नोट मिलने के भ्रष्टाचार का मामला, आज खबरों में बने हुए दूरसंचार मंत्रालय में बड़े भ्रष्टाचार का मामला को सुखराम को आज जेल भेज ही रहा है लेकिन सीबीआई ने सुखराम के बारे में आज अदालत ने कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते हुए कहा कि वह आदतन अपराधी है। ऐसी हालत में सुखराम के बारे में वे, उन, जैसे शब्द इस्तेमाल करना हमको ठीक नहीं लग रहा है। जब तक कोई महज कटघरे में होते हैं तब तक तो संदेह का लाभ देते हुए वैसे लोगों को थोड़े-बहुत सम्मान के साथ लिखा जा सकता है। लेकिन जिसे कांग्रेस सरकार की मातहत सीबीआई ही कांग्रेस कार्यकाल के अपराधों के लिए आदतन अपराधी करार दे रही है उसे हम किसी भी सम्मान का या शिष्टाचार का हकदार कैसे मानें?
आज की ही एक दूसरी खबर है कि अटल सरकार में सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक रहे, और भाजपा के बहुत बड़े नेता माने जाते रहे प्रमोद महाजन के दूरसंचार कार्यकाल के समय के स्पेक्ट्रम आबंटन को लेकर सीबीआई ने एक मामला दर्ज किया है और टेलीफोन कंपनियों और महाजन के अफसरों पर छापे मारे हैं। हम इसमें सीधे-सीधे सीबीआई पर कोई राजनीतिक दबाव इसलिए नहीं देखते कि दूरसंचार घोटाले को लेकर सीबीआई सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रही है और उसका अपना हाल शीशे के मछली घर में तैरने वाली मछली जैसा है। इसलिए इस बात की अधिक उम्मीद नहीं लगाई जा सकती कि सीबीआई यूपीए सरकार के साथ-साथ एनडीए सरकार को भी लपेटने के लिए एक फर्जी मामला दर्ज कर रही है। यहां पर उस बयान को भी याद करने की जरूरत है जो प्रमोद महाजन की हत्या के बाद उनके भाई ने दिया था और जिसमें महाजन के बारे में कहा गया था कि वे हजारों करोड़ के मालिक थे। राजनीतिक चर्चाओं को मानें तो ऐसी चर्चा महाजन के बारे में उस समय थी भी। एक तरफ भाजपा के कर्नाटक के भ्रष्टाचार की खबरें हैं तो दूसरी तरफ गोवा में कांग्रेस की सरकार अवैध खुदाई के मामले में कम या अधिक हद तक फंसी हुई दिख रही है। भारत की बाकी हवा भी ऐसी ही गंदगी और बदबू से भरी हुई है।
जिस बात से हमने शुरू किया था उसे आगे बढ़ाएं तो आज जावेद अख्तर या गुलजार जैसे भावनाओं वाले कवियों और लेखकों के बजाए कबीर जैसे कड़क और साफ-साफ कहने वाले, बेइंसाफी और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाने वाले और कोड़े जैसी मार करने वाले लोगों की जरूरत है। बहुत से लोगों को बिना कड़वाहट की बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि जिस रीढ़ की हड्डी से, जिसके भीतर की नसों से पूरा बदन चलता है, उस रीढ़ की हड्डी को कड़क होना पड़ता है। सिर्फ नर्मजोशी से और दोस्ती की गर्मजोशी से दुनिया नहीं चल सकती। यह एक बहुत ही रोमांटिक सोच है जो कोई कवि तो कर सकता है, या ऐसे लोग कर सकते हैं जो बेइंसाफी के शिकार नहीं हैं, जो ऐसी जगहों पर हैं या ऐसे ताकतवर हो गए हैं कि उनका अब आसानी से कुछ नहीं बिगड़ सकता, वे खूबसूरत भावनाओं तक अपने आपको सीमित रख सकते हैं। लेकिन कबीर आज होते और ट्विटर तक उनकी पहुंच होती तो वे या तो जावेद अख्तर की बात को न मानते, और अगर उनकी बात को मानते तो फिर ट्विटर छोड़कर जाकर अपने हाथकरघे पर बैठ गए होते। जब पूरी दुनिया बेइंसाफी से भरी हुई हो, तो सच कैसे नर्म हो सकता है और कैसे गर्मजोशी से भरा हो सकता है? कैसे बातें बहुत दोस्ताना हो सकती हैं?
संपादकीय
यह नर्मजोशी का माहौल नहीं
इंटरनेट पर ट्विटर पर आज दोपहर जावेद अख्तर ने लिखा कि इस माध्यम का उपयोग लोग दोस्ती, गर्मजोशी और खूबसूरत भावनाओं और विचारों के पुल की तरह करें। इसके बाद अमिताभ बच्चन सहित कुछ और लोगों ने इस बात से सहमत होते हुए इसे आगे बढ़ाया। लेकिन हमारी तरह के कुछ लोग इससे असहमत थे और उनका मानना था कि किसी भी सार्वजनिक संचार माध्यम या मीडिया का इस्तेमाल आज के जमाने में सिर्फ दोस्ती, सिर्फ गर्मजोशी और सिर्फ खूबसूरत भावनाओं के लिए नहीं हो सकता। जब चारों तरफ बेइंसाफी बिखरी हुई है तो कैसे कोई सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें कर सकता है।
कल से सुखराम की खबरें आने लगीं तो लोगों को याद आया कि एक वक्त वह भाजपा के साथ भी था। उसके घर से करोड़ों के नगद नोट मिलने के भ्रष्टाचार का मामला, आज खबरों में बने हुए दूरसंचार मंत्रालय में बड़े भ्रष्टाचार का मामला को सुखराम को आज जेल भेज ही रहा है लेकिन सीबीआई ने सुखराम के बारे में आज अदालत ने कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते हुए कहा कि वह आदतन अपराधी है। ऐसी हालत में सुखराम के बारे में वे, उन, जैसे शब्द इस्तेमाल करना हमको ठीक नहीं लग रहा है। जब तक कोई महज कटघरे में होते हैं तब तक तो संदेह का लाभ देते हुए वैसे लोगों को थोड़े-बहुत सम्मान के साथ लिखा जा सकता है। लेकिन जिसे कांग्रेस सरकार की मातहत सीबीआई ही कांग्रेस कार्यकाल के अपराधों के लिए आदतन अपराधी करार दे रही है उसे हम किसी भी सम्मान का या शिष्टाचार का हकदार कैसे मानें?
आज की ही एक दूसरी खबर है कि अटल सरकार में सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक रहे, और भाजपा के बहुत बड़े नेता माने जाते रहे प्रमोद महाजन के दूरसंचार कार्यकाल के समय के स्पेक्ट्रम आबंटन को लेकर सीबीआई ने एक मामला दर्ज किया है और टेलीफोन कंपनियों और महाजन के अफसरों पर छापे मारे हैं। हम इसमें सीधे-सीधे सीबीआई पर कोई राजनीतिक दबाव इसलिए नहीं देखते कि दूरसंचार घोटाले को लेकर सीबीआई सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रही है और उसका अपना हाल शीशे के मछली घर में तैरने वाली मछली जैसा है। इसलिए इस बात की अधिक उम्मीद नहीं लगाई जा सकती कि सीबीआई यूपीए सरकार के साथ-साथ एनडीए सरकार को भी लपेटने के लिए एक फर्जी मामला दर्ज कर रही है। यहां पर उस बयान को भी याद करने की जरूरत है जो प्रमोद महाजन की हत्या के बाद उनके भाई ने दिया था और जिसमें महाजन के बारे में कहा गया था कि वे हजारों करोड़ के मालिक थे। राजनीतिक चर्चाओं को मानें तो ऐसी चर्चा महाजन के बारे में उस समय थी भी। एक तरफ भाजपा के कर्नाटक के भ्रष्टाचार की खबरें हैं तो दूसरी तरफ गोवा में कांग्रेस की सरकार अवैध खुदाई के मामले में कम या अधिक हद तक फंसी हुई दिख रही है। भारत की बाकी हवा भी ऐसी ही गंदगी और बदबू से भरी हुई है।
जिस बात से हमने शुरू किया था उसे आगे बढ़ाएं तो आज जावेद अख्तर या गुलजार जैसे भावनाओं वाले कवियों और लेखकों के बजाए कबीर जैसे कड़क और साफ-साफ कहने वाले, बेइंसाफी और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाने वाले और कोड़े जैसी मार करने वाले लोगों की जरूरत है। बहुत से लोगों को बिना कड़वाहट की बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि जिस रीढ़ की हड्डी से, जिसके भीतर की नसों से पूरा बदन चलता है, उस रीढ़ की हड्डी को कड़क होना पड़ता है। सिर्फ नर्मजोशी से और दोस्ती की गर्मजोशी से दुनिया नहीं चल सकती। यह एक बहुत ही रोमांटिक सोच है जो कोई कवि तो कर सकता है, या ऐसे लोग कर सकते हैं जो बेइंसाफी के शिकार नहीं हैं, जो ऐसी जगहों पर हैं या ऐसे ताकतवर हो गए हैं कि उनका अब आसानी से कुछ नहीं बिगड़ सकता, वे खूबसूरत भावनाओं तक अपने आपको सीमित रख सकते हैं। लेकिन कबीर आज होते और ट्विटर तक उनकी पहुंच होती तो वे या तो जावेद अख्तर की बात को न मानते, और अगर उनकी बात को मानते तो फिर ट्विटर छोड़कर जाकर अपने हाथकरघे पर बैठ गए होते। जब पूरी दुनिया बेइंसाफी से भरी हुई हो, तो सच कैसे नर्म हो सकता है और कैसे गर्मजोशी से भरा हो सकता है? कैसे बातें बहुत दोस्ताना हो सकती हैं?
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