22 नवंबर 2011
संपादकीय
यह संसद का नहीं, अपनी जिम्मेदारियों का बहिष्कार
भारतीय संसद का सत्र शुरू होने पर विपक्ष ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम के बहिष्कार की घोषणा की है। खासकर भाजपा पिछले कुछ महीनों से 2जी घोटाले में चिदंबरम के नाम को जोड़ते हुए उनके इस्तीफे के लिए लगातार अभियान चला रही है। संसद में यूपीए को घेरने के लिए भाजपा ने कल ही यह कहा है कि सदन के भीतर वामपंथियों के साथ उसका एक तालमेल तय हो चुका है। इसके खिलाफ हमने वामपंथियों का कोई बयान अभी तक देखने नहीं मिला, इसलिए ऐसा लगता है कि पिछले कुछ और मौकों की तरह हो सकता है कि इस बार भी भाजपा और वामपंथी किसी तालमेल से सत्ता का विरोध करने के लिए एक साथ हों। लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां चर्चा का मकसद भाजपा और वामपंथियों के बीच के एक अटपटा तालमेल नहीं है बल्कि संसद के बहिष्कार की बात है।
संसद की कार्रवाई को दिन भर के लिए रोक देना या किसी एक मंत्री का बहिष्कार करना, इसको हम पूरी तरह नाजायज मानते हैं। अभी हम इस वाक्य तक पहुंचे ही थे कि संसद की खबर कि लोकसभा हंगामे के बाद कल तक के लिए स्थगित हो गई है। यह सिलसिला खतरनाक है और देश की जनता के साथ बेइंसाफी है। कल ही हमने इसी जगह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में लिखा है कि वे कैसे-कैसे अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर रही हैं। आज संसद के बारे में यह दुबारा इसलिए लिखना पड़ रहा है कि आरोपों के घेरे में आए हुए किसी मंत्री के बहिष्कार के पहले संसद के विपक्ष को यह बात भी सोचनी चाहिए कि उन आरोपों पर अभी क्या हो रहा है? विपक्ष के ही एक बहुत आक्रामक नेता, और नेहरू-गांधी परिवार और कांगे्रस से दुश्मनी सी रखने वाले सुब्रमण्यम स्वामी सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा दायर करके पी. चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं और अदालत के हुक्म पर सीबीआई ने उन्हें 2जी घोटाले की फाईलों में से चिदंबरम और राजा के बीच के कागजों को दे भी दिया है। अदालत किसी जांच एजेंसी से इस तरह फाईलों की कॉपियां किसी पिटीशनर को दिलवाए, ऐसा भी हमें पहले का याद नहीं पड़ता है। अब कानून पढ़ाने वाले, और सोनिया-चिदंबरम से खुली दुश्मनी रखने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जिन आरोपों के साथ 2जी घोटाले में चिदंबरम को जेल भेजने की अपनी घोषणा पूरी करने में लगे हैं, उस मामले में अदालत की किसी पहली कार्रवाई के भी पहले अगर संसद का विपक्ष चिदंबरम का बहिष्कार करता है तो यह अदालत के फैसले के पहले ही, अदालत में पहली नजर में किसी अपराध की बात भी सामने आने के पहले ही फैसला दे देने जैसा है। प्रीजज करना ठीक नहीं होता। खासकर ऐसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर की कार्रवाई को प्रभावित करते हुए जहां पर कि लोगों की कुछ लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां होती हैं। विपक्ष का यह हमलावर तेवर उसी तरह का है जिस तरह अन्ना हजारे पिछले कुछ हफ्तों में लगातार सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं और इस बात को पूरी तरह अनदेखा कर रहे हैं कि सरकार ने एक तरफ तो इसी सत्र में लोकपाल विधेयक को रखने की बार-बार घोषणा की है, और दूसरी तरफ संसद की स्थाई समिति इस विधेयक के मसौदे से या इसकी बातों से वैसे भी जूझ रही है। जब यह संसदीय सिलसिला जारी है, तब घर बैठे बेवजह पूरी तरह नाजायज बयानबाजी करके अन्ना हजारे ने इस पूरे मुद्दे की, अपने आंदोलन की और अपनी खुद की साख चौपट की है। उनके विरोध की गंभीरता उन लोगों के बीच खत्म हो चुकी है जो यह देख रहे हैं कि लोकपाल विधेयक एक पटरी पर संसदीय प्रक्रिया से गुजरते हुए इस सत्र में सांसदों के सामने पहुंचने जा रहा है। लोकतंत्र के भीतर एक प्रक्रिया के चलते हुए उसमें बिना किसी जरूरत बाहर बैठे कोंचना सिर्फ कुछ लोगों के अहंकार को मजा दे सकता है।
हम संसद के बाहर भाजपा या किसी दूसरी विपक्षी पार्टी की चिदंबरम को हटाने की मांग के खिलाफ नहीं हैं, और अगर वे चाहें तो इसके लिए लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से आंदोलन करते रहें, डॉ. स्वामी की तरह अदालत में जाएं, प्रधानमंत्री से मिलकर यह मांग करें, राष्ट्रपति से मिलें, और मीडिया को सहमत कराने की कोशिश करें कि किसी भ्रष्ट को सत्ता पर बने रहने का हक क्यों नहीं होना चाहिए? लेकिन हम अदालत में चल रहे एक मामले को लेकर संसद को प्रभावित करने के खिलाफ हैं। कल के दिन संसद में चल रही किसी बहस को लेकर अदालत की कार्रवाई प्रभावित होने लगे, अदालत की कार्रवाई को लेकर किसी फैसले के पहले ही सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगे, आरोपों को लेकर बिना किसी जांच, नतीजे के चुनाव प्रभावित होने लगें, तो यह सिलसिला ठीक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में तीन बड़ी स्पष्ट संस्थाओं को बनाकर उनकी जिम्मेदारियां और उनके अधिकार तय किए गए हैं और जहां तक 2जी घोटाले का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में जब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है, जब अदालती दखल से याचिकाकर्ता को फाईलें मिल रही हैं तो संसद के विपक्ष को डॉ. स्वामी की क्षमता और उनकी मेहनत पर भरोसा करना चाहिए। एक कानूनी कार्रवाई के बीच संसद को प्रभावित करने का कोई भी तर्क आज चिदंबरम के मामले में जायज नहीं दिख रहा, और हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आज के इस बयान से सहमत हैं कि चिदंबरम के बहिष्कार का कोई आधार नहीं है। जब पूरी की पूरी यूपीए सरकार कई अदालतों के कई कटघरों में किस्तों में खड़ी है, तो अदालतों से परे ही अगर इस सरकार को कुसूरवार ठहराना है तो फिर बचे सारे बरस इस संसद का बहिष्कार ही कर देना चाहिए। लेकिन संसदीय लोकतंत्र न इस तरह से बनाया गया है और न ही इस तरह से हांका जाना चाहिए। विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए जिसके लिए देश की जनता ने उसे चुना है। देश की जनता ने यूपीए की पार्टियों को सरकार चलाने के लिए चुना है, यूपीए ने मंत्रालय चलाने के लिए अपने मंत्री चुने हैं, देश में किसी भी तरह के अपराधों पर कार्रवाई के लिए अदालतें बनी हैं और जज नियुक्त किए गए हैं, इन सबके बीच में सस्ता मुर्गा खाते हुए ऐश की जिंदगी जीने वाले सांसद अगर अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे तो देश की जनता की नजरों में आज भी सांसदों की बहुत अधिक इज्जत नहीं रह गई है। आज लोगों को इक्का-दुक्का भ्रष्ट जजों के रहने पर भी देश की अदालतों पर भरोसा है। और वे किसी राजनीतिक दल के साथ हमदर्दी रखे बिना मोटे तौर पर ईमानदारी और असरदार तरीके से अपना काम कर रही हैं। ऐसे में अदालत की सीधी निगरानी में खड़े चिदंबरम के बहिष्कार का क्या औचित्य है? आज देश में इतने सारे मुद्दे हैं, और संसद के इस सत्र के सामने इतने सारे विधेयक हैं कि सांसदों को ओवरटाईम करके इन सब पर मेहनत करनी चाहिए। यह बहिष्कार वे चिदंबरम का या संसद का नहीं कर रहे हैं, वे अपनी जिम्मेदारियों का बहिष्कार कर रहे हैं।
संपादकीय
यह संसद का नहीं, अपनी जिम्मेदारियों का बहिष्कार
भारतीय संसद का सत्र शुरू होने पर विपक्ष ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम के बहिष्कार की घोषणा की है। खासकर भाजपा पिछले कुछ महीनों से 2जी घोटाले में चिदंबरम के नाम को जोड़ते हुए उनके इस्तीफे के लिए लगातार अभियान चला रही है। संसद में यूपीए को घेरने के लिए भाजपा ने कल ही यह कहा है कि सदन के भीतर वामपंथियों के साथ उसका एक तालमेल तय हो चुका है। इसके खिलाफ हमने वामपंथियों का कोई बयान अभी तक देखने नहीं मिला, इसलिए ऐसा लगता है कि पिछले कुछ और मौकों की तरह हो सकता है कि इस बार भी भाजपा और वामपंथी किसी तालमेल से सत्ता का विरोध करने के लिए एक साथ हों। लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां चर्चा का मकसद भाजपा और वामपंथियों के बीच के एक अटपटा तालमेल नहीं है बल्कि संसद के बहिष्कार की बात है।
संसद की कार्रवाई को दिन भर के लिए रोक देना या किसी एक मंत्री का बहिष्कार करना, इसको हम पूरी तरह नाजायज मानते हैं। अभी हम इस वाक्य तक पहुंचे ही थे कि संसद की खबर कि लोकसभा हंगामे के बाद कल तक के लिए स्थगित हो गई है। यह सिलसिला खतरनाक है और देश की जनता के साथ बेइंसाफी है। कल ही हमने इसी जगह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में लिखा है कि वे कैसे-कैसे अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर रही हैं। आज संसद के बारे में यह दुबारा इसलिए लिखना पड़ रहा है कि आरोपों के घेरे में आए हुए किसी मंत्री के बहिष्कार के पहले संसद के विपक्ष को यह बात भी सोचनी चाहिए कि उन आरोपों पर अभी क्या हो रहा है? विपक्ष के ही एक बहुत आक्रामक नेता, और नेहरू-गांधी परिवार और कांगे्रस से दुश्मनी सी रखने वाले सुब्रमण्यम स्वामी सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा दायर करके पी. चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं और अदालत के हुक्म पर सीबीआई ने उन्हें 2जी घोटाले की फाईलों में से चिदंबरम और राजा के बीच के कागजों को दे भी दिया है। अदालत किसी जांच एजेंसी से इस तरह फाईलों की कॉपियां किसी पिटीशनर को दिलवाए, ऐसा भी हमें पहले का याद नहीं पड़ता है। अब कानून पढ़ाने वाले, और सोनिया-चिदंबरम से खुली दुश्मनी रखने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जिन आरोपों के साथ 2जी घोटाले में चिदंबरम को जेल भेजने की अपनी घोषणा पूरी करने में लगे हैं, उस मामले में अदालत की किसी पहली कार्रवाई के भी पहले अगर संसद का विपक्ष चिदंबरम का बहिष्कार करता है तो यह अदालत के फैसले के पहले ही, अदालत में पहली नजर में किसी अपराध की बात भी सामने आने के पहले ही फैसला दे देने जैसा है। प्रीजज करना ठीक नहीं होता। खासकर ऐसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर की कार्रवाई को प्रभावित करते हुए जहां पर कि लोगों की कुछ लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां होती हैं। विपक्ष का यह हमलावर तेवर उसी तरह का है जिस तरह अन्ना हजारे पिछले कुछ हफ्तों में लगातार सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं और इस बात को पूरी तरह अनदेखा कर रहे हैं कि सरकार ने एक तरफ तो इसी सत्र में लोकपाल विधेयक को रखने की बार-बार घोषणा की है, और दूसरी तरफ संसद की स्थाई समिति इस विधेयक के मसौदे से या इसकी बातों से वैसे भी जूझ रही है। जब यह संसदीय सिलसिला जारी है, तब घर बैठे बेवजह पूरी तरह नाजायज बयानबाजी करके अन्ना हजारे ने इस पूरे मुद्दे की, अपने आंदोलन की और अपनी खुद की साख चौपट की है। उनके विरोध की गंभीरता उन लोगों के बीच खत्म हो चुकी है जो यह देख रहे हैं कि लोकपाल विधेयक एक पटरी पर संसदीय प्रक्रिया से गुजरते हुए इस सत्र में सांसदों के सामने पहुंचने जा रहा है। लोकतंत्र के भीतर एक प्रक्रिया के चलते हुए उसमें बिना किसी जरूरत बाहर बैठे कोंचना सिर्फ कुछ लोगों के अहंकार को मजा दे सकता है।
हम संसद के बाहर भाजपा या किसी दूसरी विपक्षी पार्टी की चिदंबरम को हटाने की मांग के खिलाफ नहीं हैं, और अगर वे चाहें तो इसके लिए लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से आंदोलन करते रहें, डॉ. स्वामी की तरह अदालत में जाएं, प्रधानमंत्री से मिलकर यह मांग करें, राष्ट्रपति से मिलें, और मीडिया को सहमत कराने की कोशिश करें कि किसी भ्रष्ट को सत्ता पर बने रहने का हक क्यों नहीं होना चाहिए? लेकिन हम अदालत में चल रहे एक मामले को लेकर संसद को प्रभावित करने के खिलाफ हैं। कल के दिन संसद में चल रही किसी बहस को लेकर अदालत की कार्रवाई प्रभावित होने लगे, अदालत की कार्रवाई को लेकर किसी फैसले के पहले ही सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगे, आरोपों को लेकर बिना किसी जांच, नतीजे के चुनाव प्रभावित होने लगें, तो यह सिलसिला ठीक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में तीन बड़ी स्पष्ट संस्थाओं को बनाकर उनकी जिम्मेदारियां और उनके अधिकार तय किए गए हैं और जहां तक 2जी घोटाले का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में जब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है, जब अदालती दखल से याचिकाकर्ता को फाईलें मिल रही हैं तो संसद के विपक्ष को डॉ. स्वामी की क्षमता और उनकी मेहनत पर भरोसा करना चाहिए। एक कानूनी कार्रवाई के बीच संसद को प्रभावित करने का कोई भी तर्क आज चिदंबरम के मामले में जायज नहीं दिख रहा, और हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आज के इस बयान से सहमत हैं कि चिदंबरम के बहिष्कार का कोई आधार नहीं है। जब पूरी की पूरी यूपीए सरकार कई अदालतों के कई कटघरों में किस्तों में खड़ी है, तो अदालतों से परे ही अगर इस सरकार को कुसूरवार ठहराना है तो फिर बचे सारे बरस इस संसद का बहिष्कार ही कर देना चाहिए। लेकिन संसदीय लोकतंत्र न इस तरह से बनाया गया है और न ही इस तरह से हांका जाना चाहिए। विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए जिसके लिए देश की जनता ने उसे चुना है। देश की जनता ने यूपीए की पार्टियों को सरकार चलाने के लिए चुना है, यूपीए ने मंत्रालय चलाने के लिए अपने मंत्री चुने हैं, देश में किसी भी तरह के अपराधों पर कार्रवाई के लिए अदालतें बनी हैं और जज नियुक्त किए गए हैं, इन सबके बीच में सस्ता मुर्गा खाते हुए ऐश की जिंदगी जीने वाले सांसद अगर अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे तो देश की जनता की नजरों में आज भी सांसदों की बहुत अधिक इज्जत नहीं रह गई है। आज लोगों को इक्का-दुक्का भ्रष्ट जजों के रहने पर भी देश की अदालतों पर भरोसा है। और वे किसी राजनीतिक दल के साथ हमदर्दी रखे बिना मोटे तौर पर ईमानदारी और असरदार तरीके से अपना काम कर रही हैं। ऐसे में अदालत की सीधी निगरानी में खड़े चिदंबरम के बहिष्कार का क्या औचित्य है? आज देश में इतने सारे मुद्दे हैं, और संसद के इस सत्र के सामने इतने सारे विधेयक हैं कि सांसदों को ओवरटाईम करके इन सब पर मेहनत करनी चाहिए। यह बहिष्कार वे चिदंबरम का या संसद का नहीं कर रहे हैं, वे अपनी जिम्मेदारियों का बहिष्कार कर रहे हैं।
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