08 नवंबर 11
संपादकीय
लोकतंत्र और संविधान जब-जब किसी तरह की आस्था हावी होती है तो लोकतंत्र का लंबा-चौड़ा नुकसान होता है। ऐसी आस्था धार्मिक भी हो सकती है और आध्यात्मिक भी। यह एक गैरराजनीतिक आस्था भी हो सकती है जो कि चुनाव जैसे एक राजनीतिक काम पर हावी हो सकती है। ऐसे कई मौके हमने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में देखे हैं जब एक राजनीतिक दल किसी एक धर्मगुरू का इस्तेमाल करता है तो कभी कोई दूसरी पार्टी किसी दूसरे धर्मगुरू या आध्यात्मिक गुरू का। एक शंकराचार्य तो कांगे्रसी शंकराचार्य ही कहलाते हैं। कुछ मुसलमान धर्मगुरू भी चुनावों के वक्त फतवे जारी करते हैं कि किसे जिताना या हराना है, और उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई जगहों पर चर्च चुनावों में भारी सक्रिय हो जाता है। उत्तर-भारत में कुछ दशक पहले जय गुरूदेव नाम के एक गुरू ने अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लडऩा शुरू कर दिया था और कुछ दशकों में पूरे देश पर कब्जे की अपनी उम्मीदें सार्वजनिक की थीं।
इन दिनों देश के चुनावों में वैसा ही एक माहौल फिर से बनते दिख रहा है। अपने-आपको गांधीवादी कहने वाले एक तानाशाह-मिजाजी अन्ना-हजारे और उनकी टोली के लोग गांधीगिरी और अन्नागिरी का नाम लेकर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार में इस कदर आक्रामक हो गए हैं कि अन्ना के साथ जुड़े हुए कुछ इज्जतदार सामाजिक कार्यकर्ता उनसे घोषित रूप से अलग हो गए हैं। एक भगवा योगी के हुलिए में सक्रिय बाबा रामदेव हजारों करोड़ के अपने औद्योगिक साम्राज्य को चलाने के साथ-साथ अब खुलकर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार में उतरने की मुनादी कर चुके हैं। पिछले कुछ बरसों से खबरों में बढ़ते चले गए कर्नाटक निवासी श्रीश्री रविशंकर अपने ऑर्ट ऑफ लिविंग अभियान के साथ-साथ अब उत्तरप्रदेश में कांगे्रस के खिलाफ प्रचार करते घूम रहे हैं। उनके साथ एक मजे की बात यह है कि वे अपने ही कर्नाटक के विकराल भाजपाई भ्रष्टाचार को इस तरह और इस कदर, छोड़कर चल रहे हैं, अनदेखा कर रहे हैं कि उनका आध्यात्मिक अभियान ऑर्ट ऑफ लीविंग (छोडऩा) लगने लगा है, बजाय ऑर्ट ऑफ लिविंग (जीना) के। पंजाब में हम लंबे समय से सिख पंथ का अकाली दल के मार्फत चुनावी राजनीति में दखल देखते आ रहे हैं और यही वजह है कि जब पंजाब में सिख आतंकवाद फैला हुआ था, वहां अकाली दल गुमसुम सा चुप था।
लोकतांत्रिक राजनीति और चुनाव पर जब भी आस्था हावी होती है, उसके खतरे इतिहास में दर्ज होते हैं। धार्मिक नफरत में एक वक्त गांधी की हत्या की थी, और एक वक्त इंदिरा गांधी की। इसके बाद 1992 को याद करें, तो यह नारा उस समय खूब चला कि संविधान धार्मिक आस्था से ऊपर नहीं है। नतीजा जो निकला उसने इतिहास में भारत को एक शर्मिंदगी दिलाई। हम किसी धर्म या आध्यात्म से लेकर गांधीवाद तक का झंडा लेकर चलने वाली ऐसी गैरराजनीतिक ताकतों को बुरे राजनीतिक दलों से भी अधिक खराब मानते हैं क्योंकि उनकी कोई जवाबदेही जनता या लोकतंत्र, संसद या विधानसभा के लिए नहीं होती। बुरी पार्टियां और बुरे नेता भी, ऐसे रंग-बिरंगे झंडों-डंडों के मुकाबले जनता के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। इसलिए हम जाहिर तौर पर सुहावने नारों को लेकर चलने वाली अन्ना-बाबानुमा लोगों के मुकाबले जाहिर तौर पर राजनीति करने वाले लोगों को लोकतंत्र के लिए बेहतर समझते हैं। जिस तरह से अन्ना-बाबा ने कुछ महीनों के भीतर ही भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किए गए अभियान को कांगे्रस विरोधी चुनाव प्रचार बनाकर रख दिया, उससे उनकी असली राजनीतिक नीयत उजागर हो गई और राजेंद्र सिंह जैसे प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता टीम-अन्ना को छोड़कर पानी के अपने मोर्चे पर लौट गए। दूसरी तरफ अन्ना के अभियान में शुरू से जुड़े हुए जस्टिस संतोष हेगड़े भी चुनाव प्रचार से सार्वजनिक रूप से असहमत होकर खुद होकर हाशिए पर चले गए हैं।
हम ऐसे पत्रकारों के खिलाफ हैं जो राजनीति करते हैं या सामाजिक आंदोलनों की अगुवाई करते हैं। लोगों की पहचान बहुत साफ होनी चाहिए। या तो कोई जर्नलिस्ट रह ले, या फिर वे एक्टिविस्ट हो जाएं। या तो वे अपने को अखबारनवीस कह लें, या फिर किसी राजनीतिक दल के प्रवक्ता की तरह टीवी के स्टूडियो में ही बैठे रहें। अद्र्धनारीश्वर की तरह का व्यक्तित्व पुराणकथाओं तक तो ठीक है, लोकतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए। यह बात हम उन लोगों पर असर डालने के लिए नहीं कह रहे जो भेड़ की खाल की पतलून पहनकर, भेडि़ए की खाल की जाकिट पहनकर सार्वजनिक जीवन में ओवरटाईम करते दिखते हैं, वे तो अपने इन दो मुखौटों को अच्छी तरह जानते हैं। हम यह बात जनता के सोचने के लिए छेड़ रहे हैं कि वह आस्था और लोकतंत्र को अलग-अलग लेकर चले और दोमुंहे लोगों से यह साफ मांग करें कि वे खुलकर सामने आएं। लड़ते भी हैं और हाथ में तलवार भी नहीं, यह अंदाज ठीक नहीं है।
संपादकीय
लोकतंत्र और संविधान जब-जब किसी तरह की आस्था हावी होती है तो लोकतंत्र का लंबा-चौड़ा नुकसान होता है। ऐसी आस्था धार्मिक भी हो सकती है और आध्यात्मिक भी। यह एक गैरराजनीतिक आस्था भी हो सकती है जो कि चुनाव जैसे एक राजनीतिक काम पर हावी हो सकती है। ऐसे कई मौके हमने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में देखे हैं जब एक राजनीतिक दल किसी एक धर्मगुरू का इस्तेमाल करता है तो कभी कोई दूसरी पार्टी किसी दूसरे धर्मगुरू या आध्यात्मिक गुरू का। एक शंकराचार्य तो कांगे्रसी शंकराचार्य ही कहलाते हैं। कुछ मुसलमान धर्मगुरू भी चुनावों के वक्त फतवे जारी करते हैं कि किसे जिताना या हराना है, और उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई जगहों पर चर्च चुनावों में भारी सक्रिय हो जाता है। उत्तर-भारत में कुछ दशक पहले जय गुरूदेव नाम के एक गुरू ने अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लडऩा शुरू कर दिया था और कुछ दशकों में पूरे देश पर कब्जे की अपनी उम्मीदें सार्वजनिक की थीं।
इन दिनों देश के चुनावों में वैसा ही एक माहौल फिर से बनते दिख रहा है। अपने-आपको गांधीवादी कहने वाले एक तानाशाह-मिजाजी अन्ना-हजारे और उनकी टोली के लोग गांधीगिरी और अन्नागिरी का नाम लेकर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार में इस कदर आक्रामक हो गए हैं कि अन्ना के साथ जुड़े हुए कुछ इज्जतदार सामाजिक कार्यकर्ता उनसे घोषित रूप से अलग हो गए हैं। एक भगवा योगी के हुलिए में सक्रिय बाबा रामदेव हजारों करोड़ के अपने औद्योगिक साम्राज्य को चलाने के साथ-साथ अब खुलकर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार में उतरने की मुनादी कर चुके हैं। पिछले कुछ बरसों से खबरों में बढ़ते चले गए कर्नाटक निवासी श्रीश्री रविशंकर अपने ऑर्ट ऑफ लिविंग अभियान के साथ-साथ अब उत्तरप्रदेश में कांगे्रस के खिलाफ प्रचार करते घूम रहे हैं। उनके साथ एक मजे की बात यह है कि वे अपने ही कर्नाटक के विकराल भाजपाई भ्रष्टाचार को इस तरह और इस कदर, छोड़कर चल रहे हैं, अनदेखा कर रहे हैं कि उनका आध्यात्मिक अभियान ऑर्ट ऑफ लीविंग (छोडऩा) लगने लगा है, बजाय ऑर्ट ऑफ लिविंग (जीना) के। पंजाब में हम लंबे समय से सिख पंथ का अकाली दल के मार्फत चुनावी राजनीति में दखल देखते आ रहे हैं और यही वजह है कि जब पंजाब में सिख आतंकवाद फैला हुआ था, वहां अकाली दल गुमसुम सा चुप था।
लोकतांत्रिक राजनीति और चुनाव पर जब भी आस्था हावी होती है, उसके खतरे इतिहास में दर्ज होते हैं। धार्मिक नफरत में एक वक्त गांधी की हत्या की थी, और एक वक्त इंदिरा गांधी की। इसके बाद 1992 को याद करें, तो यह नारा उस समय खूब चला कि संविधान धार्मिक आस्था से ऊपर नहीं है। नतीजा जो निकला उसने इतिहास में भारत को एक शर्मिंदगी दिलाई। हम किसी धर्म या आध्यात्म से लेकर गांधीवाद तक का झंडा लेकर चलने वाली ऐसी गैरराजनीतिक ताकतों को बुरे राजनीतिक दलों से भी अधिक खराब मानते हैं क्योंकि उनकी कोई जवाबदेही जनता या लोकतंत्र, संसद या विधानसभा के लिए नहीं होती। बुरी पार्टियां और बुरे नेता भी, ऐसे रंग-बिरंगे झंडों-डंडों के मुकाबले जनता के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। इसलिए हम जाहिर तौर पर सुहावने नारों को लेकर चलने वाली अन्ना-बाबानुमा लोगों के मुकाबले जाहिर तौर पर राजनीति करने वाले लोगों को लोकतंत्र के लिए बेहतर समझते हैं। जिस तरह से अन्ना-बाबा ने कुछ महीनों के भीतर ही भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किए गए अभियान को कांगे्रस विरोधी चुनाव प्रचार बनाकर रख दिया, उससे उनकी असली राजनीतिक नीयत उजागर हो गई और राजेंद्र सिंह जैसे प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता टीम-अन्ना को छोड़कर पानी के अपने मोर्चे पर लौट गए। दूसरी तरफ अन्ना के अभियान में शुरू से जुड़े हुए जस्टिस संतोष हेगड़े भी चुनाव प्रचार से सार्वजनिक रूप से असहमत होकर खुद होकर हाशिए पर चले गए हैं।
हम ऐसे पत्रकारों के खिलाफ हैं जो राजनीति करते हैं या सामाजिक आंदोलनों की अगुवाई करते हैं। लोगों की पहचान बहुत साफ होनी चाहिए। या तो कोई जर्नलिस्ट रह ले, या फिर वे एक्टिविस्ट हो जाएं। या तो वे अपने को अखबारनवीस कह लें, या फिर किसी राजनीतिक दल के प्रवक्ता की तरह टीवी के स्टूडियो में ही बैठे रहें। अद्र्धनारीश्वर की तरह का व्यक्तित्व पुराणकथाओं तक तो ठीक है, लोकतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए। यह बात हम उन लोगों पर असर डालने के लिए नहीं कह रहे जो भेड़ की खाल की पतलून पहनकर, भेडि़ए की खाल की जाकिट पहनकर सार्वजनिक जीवन में ओवरटाईम करते दिखते हैं, वे तो अपने इन दो मुखौटों को अच्छी तरह जानते हैं। हम यह बात जनता के सोचने के लिए छेड़ रहे हैं कि वह आस्था और लोकतंत्र को अलग-अलग लेकर चले और दोमुंहे लोगों से यह साफ मांग करें कि वे खुलकर सामने आएं। लड़ते भी हैं और हाथ में तलवार भी नहीं, यह अंदाज ठीक नहीं है।
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