गरीब और अमीर के हकों का फर्क

29 अक्टूबर 11
संपादकीय
देश के दौलतमंद, शहरी और आधुनिक तबकों में राजधानी दिल्ली के करीब उत्तरप्रदेश के नोएडा में अभी शुरू हुई कारों की एक रेस को लेकर हलचल मची हुई है। देश के दो सबसे बड़े शोबाज, विजय माल्या और सुब्रत राय सहारा ने सैकड़ों करोड़ झोंककर फार्मूला-वन नाम की तेज रफ्तार कारों की इस दौड़ को शोहरत दिलाई है और इसे बाजार के एक बड़े प्रचार के मौके की तरह देखा जा रहा है जिसमें लगाया पैसा ये कंपनियां एक समझदार पूंजीनिवेश मान रही हैं। हो सकता है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ऐसे चर्चित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों का कोई फायदा मिल सके, लेकिन जब ऐसे महंगे कार्यक्रमों के लिए उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री, एक दलित की बेटी मनोरंजन कर और बाकी टैक्स में रियायत देती है तो देश की आज की राजनीतिक संस्कृति के बारे में सोचने की जरूरत पड़ती है। भारत आज एक मॉल संस्कृति में पहुंच गया है जहां पर बाजार के सबसे संगठित और बहुराष्ट्रीय तबके ने सबसे अधिक चमक-दमक के साथ उपभोक्तावाद को बढ़ाने का एक आक्रामक दौर शुरू किया है। ऐसे में जब देश के सबसे महंगे कारोबारी हमलों को सरकार तरह-तरह की रियायत इस तर्क के आधार पर देती है कि उससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तो यह आर्थिक उदारवाद का एक खतरनाक अंदाज है।
फार्मूला-वन जैसी कार दौड़ पश्चिम के उस सबसे महंगे बाजार के ग्राहकों का नशा है जहां किसी साधारण सामान की कोई जगह नहीं है। कुछ इसी किस्म का हाल गोल्फ कोर्स नाम के घास के उन बड़े-बड़े मैदानों का है जो कि खेती की जमीन पर बनने जा रहे हैं और जो एक प्यासे राक्षस की तरह पानी पीते हैं। जहां सैकड़ों एकड़ जमीन पर घास को बारहों महीने हरा रखने के लिए फौव्वारों से पूरे-पूरे वक्त पानी छिड़का जाता है और उन पर गिने-चुने मु_ी भर दौलतमंद लोग खेलते हैं, खेल से अधिक वहां पर कारोबारी फैसले होते हैं और इसके लिए खेती का रकबा घटता है, जमीन के भीतर का पानी खींच लिया जाता है। आज कोई अगर यह तौले कि गोल्फ कोर्स के प्रति एकड़ पर कितने खिलाड़ी खेलने का औसत बैठता है और प्रति खिलाड़ी कितने लीटर पानी खर्च होने का औसत बैठता है तो ये आंकड़े चौंकाने वाले होंगे। लेकिन बहुत से प्रदेशों में सरकार ऐसे रईस खेल के लिए जगह दे रही है और पर्यावरण से लेकर खेती तक की क्या बदहाली इससे होने जा रही है उसे अनदेखा किया जा रहा है।
हम बड़े-बड़े आलीशान मॉल को मिलने वाली रियायतों को देखकर भी हैरान हैं। जिन शहरों में रात साढ़े दस बजे पुलिस की गाडिय़ां सायरन और लाठी लेकर एक-एक पानठेले और चाय ठेले तक को बंद करवाने पर उतर आती है, वहां पर मॉल में खाने-पीने की जगहें आधी रात के बाद तक वहां के महंगे सिनेमाघरों के साथ-साथ चलती रहती हैं। इसी तरह शहरों में स्टार दर्जा पाने वाले होटलों के लिए तो यह शर्त ही होती है कि वहां पर चौबीसों घंटे कॉफी शॉप चले। मतलब यह कि अगर आपकी जेब में सौ रूपए हैं तो आप रात-दिन किसी भी पल कॉफी पी सकते हैं। लेकिन पांच रूपए की चाय आपको रात साढ़े दस के बाद पुलिस पीने नहीं देगी। महंगे मॉल के सिनेमाघरों में जाने वालों को अपने घर का पानी भी लेकर जाने की इजाजत नहीं होती चाहे उनके लिए यह डॉक्टरी जरूरत ही क्यों न हो। बैग की तलाशी लेकर बच्चों का पानी तक रखवा लिया जाता है ताकि उन सिनेमाघरों की कैंटीन से बाजार भाव से दुगुने-चौगुने पर खाने-पीने के सामान बेचे जा सकें। लेकिन सरकार का कोई विभाग न तो ऐसी मुनाफाखोरी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। हमारी सामान्य समझ यह कहती है कि जब खाने-पीने के सामान को महंगे दामों पर ही खरीदने की शर्त सिनेमा के मनोरंजन के साथ जोड़ दी गई है तो उन सामानों पर बिक्रीकर के अलावा मनोरंजन कर भी जोडऩे की जरूरत है। लेकिन महंगे कारोबारों के लिए खास सरकारी रियायत एक आम रूख है। इसके अलावा यह देखें कि शहरों के परंपरागत साधारण बाजार पर सरकार का जो अमला तरह-तरह के मजदूर कानून लागू करके हफ्ते में एक दिन उन्हें बंद करवाने की शर्त पूरी करवाता है, उस अमले का मानो महंगे मॉल पर कोई काबू ही नहीं है और उन्हें रात-दिन किसी भी वक्त, साल के 365 दिन अपना कारोबार करने की छूट है। जब सरकारों को चलाने वाले लोग, राजनीति करने वाले लोग और मुद्दों को उठाने वाले मीडिया, इन सबमें संपन्नता बढ़ती चली जाती है तो असमानता की समझ घटती चली जाती है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक शर्मनाक नौबत है कि उत्तरप्रदेश में दलित की बेटी से करोड़पतियों के खेल को रियायत मिल रही है और अदालतें इस रियायत पर सवाल उठाकर उस पर रोक लगा रही है। एक वक्त जजों के बारे में यह कहा जाता था कि वे अपनी ऊंची मीनारों में बैठे हुए जमीनी हकीकत से दूर रहते हैं। आज हम बहुत से मामलों में यह देख रहे हैं कि अरबपति होती चली जा रही संसद और विधानसभाओं में लोकतांत्रिक समानता की सोच से लोग दूर होते चले जा रहे हैं और अदालत को दखल देकर बहुत से मुद्दों पर समानता और लोकतंत्र का लागू करवाना पड़ रहा है। जिस प्रदेश में ऐसी जो आर्थिक असमानता है, उसके खिलाफ वहां के जागरूक तबके (अगर कोई हो तो) को जनता के बीच ऐसे मामले उठाकर सरकार पर समानता के लिए दबाव बनाना चाहिए। हमारा यह मानना है कि जिस देश में सितारा होटलों को चौबीस घंटे कारोबार की छूट है वहां पर चाय ठेले और पान ठेले को बंद करवाने का हक किसी सरकार को कैसे मिल सकता है? क्या कोई जागरूक वकील इन मुद्दों पर अदालत में जनहित याचिका नहीं लगा सकता?

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