छत्तीसगढ़ के बारे में सोचने का मौका

30 अक्टूबर 11
संपादकीय
बिहार के जिस नौजवान सुशील कुमार ने कौन बनेगा करोड़पति में अपने सामान्य ज्ञान से पांच करोड़ रुपए जीते हैं वह ग्रामीण विकास विभाग में छह हजार रुपए महीने पर एक कम्प्यूटर ऑपरेटर है। टैक्स कटने के बाद उसे मिलने जा रहे करीब साढ़े तीन करोड़ रुपए अपने बैंक में लाने के लिए निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े-बड़े बैंक उसके घर पहुंच चुके हैं, इसके साथ ही वहां के स्थानीय भाजपा विधायक ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लिखा है कि राज्य को शोहरत दिलाने वाले इस नौजवान को बिहार का ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाए।
जिस तरह से इस टीवी कार्यक्रम में इस बहुत ही गरीब नौजवान ने इतनी बड़ी कामयाबी पाई है वह किसी भी राज्य के लिए एक बड़े फख्र की बात हो सकती है, होनी ही चाहिए। लेकिन अपने नौजवान पर गर्व करने वाले किसी राज्य के बारे में क्या यह सोचने की जरूरत नहीं है कि इस कामयाबी में क्या राज्य का कोई योगदान रहा, क्या इसमें समाज का कोई योगदान रहा, या फिर यह बहुत गरीबी में जीने वाले एक नौजवान की ऐसी सफलता ही है जो कि उसने अपनी सरकार और अपने समाज के किसी योगदान के बिना ही अपने बूते पाई है। यह मौका हमें अपनी एक पुरानी, बिन मांगी, सलाह को दुहराने का लगता है कि भारत जैसे देश में या छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में नौजवान पीढ़ी को देश और दुनिया की चुनौतियों के मुकाबले के लिए तैयार करने को सरकार और समाज मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं, और उनसे ही अगली पीढ़ी की संभावनाएं बनेंगी, समाज बेहतर हो सकेगा।
सामान्य ज्ञान तो उन कई औजारों में से एक है जो कि नौकरी या रोजगार के मोर्चे पर लोगों को अधिक काबिल साबित कर सकता है। इसके अलावा भी हम बहुत बार यह बात लिखते आए हैं कि शहर, कस्बे और गांव-गांव तक फैले हुए कॉलेज और स्कूल के कई घंटे खाली रहने वाले कमरों में आसपास के बच्चों और नौजवानों के लिए तरह-तरह की कक्षाएं लगानी चाहिए, उन्हें कई किस्म की ट्रेनिंग देनी चाहिए। दूर की बात क्यों करें, हमें जब अपने अखबार में काम करने के लिए लोगों की जरूरत पड़ती है और काबिल लोगों की तलाश की जाती है तो शायद ही कभी छत्तीसगढ़ में ऐसे उम्मीदवार हमें मिलते हैं जिनका सामान्य ज्ञान अच्छा हो, और साथ-साथ जिनका अंगे्रजी का ज्ञान भी हो, और साथ-साथ जो कम्प्यूटर का काम भी जानते हों, जो सामान्य शिष्टाचार जानते हों, जो दफ्तर या कारोबार के काम की चि_ियां लिखना जानते हों, वगैरह-वगैरह। ऐसी बहुत सी खूबियां आज के जमाने में भारत और दुनिया में रोजगार देने वाले लोग देखते हैं और भारत के ही कुछ प्रदेशों में अपने नौजवानों को दूसरे प्रदेशों के मुकाबले सोच-समझकर बेहतर तैयार किया जाता है। जो प्रदेश अपनी पीढिय़ों को डिग्री और बेकारी साथ-साथ थमाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं, वे न केवल आज बेरोजगार की फेहरिस्त में एक नाम जोड़ते हैं बल्कि उस बेरोजगार की आने वाली पीढिय़ों के लिए मुमकिन हो सकने वाली गुंजाइशों को भी खत्म या सीमित कर देते हैं। आज अगर एक नौजवान पीढ़ी कामयाब होती है तो वह अपनी आने वाली पीढिय़ों को भी बेहतर बना सकती है। भारत के अधिक कामयाब इलाकों में आज कामयाब हो गए लोगों के बच्चों को देखकर इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। इसी तरह जब हम दुनिया के दूसरे देशों में जाकर बसे हुए हिंदुस्तानियों को देखते हैं तो उनके बच्चे अपने मां-बाप के भारत के दायरे के दूसरे बच्चों के मुकाबले अधिक आगे बढ़ते हुए दिखते हैं। हम  दूसरे देश या भारत के भीतर के किसी बड़े शहर को कामयाबी के लिए अनिवार्य नहीं मानते, लेकिन अपनी जगह पर बने रहकर भी जो लोग बेहतर तैयार होते हैं, वे बेहतर भविष्य पाते हैं।
स्कूलों और कॉलेजों की इमारतें बरस में आधे दिन तो छुट्टियों की वजह से पूरी खाली रहती हैं, और बाकी दिनों भी वे छह-आठ घंटों से अधिक पढ़ाई में व्यस्त नहीं होतीं। ऐसे में सुबह-शाम के खाली घंटों में अगर समाज और सरकार मिलकर अपनी पीढ़ी को सामान्य ज्ञान, अंगे्रजी, कम्प्यूटर, इंटरनेट, पत्र-व्यवहार, व्यक्तित्व विकास जैसे पैमानों पर बेहतर बनाने के लिए कक्षाएं चलाएं तो इससे नौजवानों और बच्चों के बर्बाद हो रहे खाली समय का एक ऐसा उत्पादक उपयोग होगा जो कि प्रदेश के अलावा देश को भी आगे ले जाने में मदद करेगा। हमारा मानना है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां से सेना में जाना भी कम है, विदेशों में जाना भी कम है, बड़ी-बड़ी दाखिला परीक्षाओं में भी कामयाबी यहां कुछ कम मिलती है, ऐसे प्रदेश में अगर कोशिश की जाए तो यहां का भविष्य बदल सकता है। हम अपने लोगों की संभावनाओं को, उनकी कल्पनाशीलता को, उनकी क्षमता और दक्षता को बेहतर बनाने के लिए राज्य के ढांचे और लोगों के खाली समय का इस्तेमाल करें तो पूरा समाज अधिक काबिल और अधिक कामयाब हो जाना तय है। इसके लिए सरकार को बंधी-बंधाई लकीर से हटकर सोचना होगा और समाज के लोगों को इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए शामिल करने की पहल करनी होगी। और हम हर बात में सिर्फ सरकार की तरफ देखना नहीं चाहते हैं, बिल गेट्स की तरह के कोई कामयाब और दौलतमंद व्यक्ति उनकी तरह की दरियादिली दिखाकर अपने पैसों से भी ऐसी पहल कर सकते हैं और जिस तरह बिहार में एक नौजवान सुपर-30 नाम से आईआईटी प्रवेश परीक्षा में सबसे गरीब बच्चों को सौ फीसदी कामयाब साबित कर रहा है, उस तरह से भी कोई छत्तीसगढ़ में काम कर सकता है। बिहार के एक होनहार नौजवान की इस ताजा कामयाबी की चर्चा करते हुए हमें अपने इर्दगिर्द के छत्तीसगढ़ के बारे में ऐसा सोचने का मौका मिला है, शायद इस सोच को आगे बढ़ाने की भी कुछ लोग सोचें।

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