30 नवंबर 2011
संपादकीय
कमजोर-गरीब को बिन मांगे जमानत मिल जानी चाहिए
देश के बड़े-बड़े मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, बड़े-बड़े अफसर और निजी कारोबारों के बड़े-बड़े लोग पिछले दो-चार दिनों में जेल के भीतर महीनों गुजारकर जमानत पर बाहर निकले हैं। इसके पहले कई किस्म के सामाजिक आंदोलनकारी बरसों तक जमानत न मिलने को लेकर खबरों में बने रहे हैं। इनके अलावा ऐसे सभी तबकों के बड़े-बड़े सैकड़ों और लोग तरह-तरह की तिकड़में लगाकर गिरफ्तारी से बचे हुए हैं, और गिरफ्तारी हो जाने पर जमानत में महीनों लग जाने की बात उनकी नींद जरूर उड़ा रही होगी। यह मौका इस चर्चा को छेडऩे के लिए सही है कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को उस पर लगे आरोपों की सुनवाई चलने तक जमानत पाने का कितना हक कानून में लिखा हुआ है और कितना मौका उसे इसे पाने का मिलता है। देश में दसियों लाख विचाराधीन कैदी बरसों से जेल काट रहे हैं और जब कभी कोई अदालत जेल की सलाखों के पीछे झांकने का समय निकालती है, बहुत से ऐसे लोग, ऐसे बेजुबान-कमजोर लोग, सलाखों के पीछे बरसों से बंद मिलते हैं जो कि उन पर चल रहे मामले में संभव अधिकतम सजा से अधिक दिन सुनवाई के दौरान ही कैद में काट चुके हैं। इन दसियों लाख लोगों की बरसों की तकलीफ के आधार पर तो हम सरकार-संसद के रूख में किसी फर्क की उम्मीद नहीं करते थे, न ही करते हैं, लेकिन अब चूंकि सरकार और संसद के लोग, बहुत बड़े-बड़े लोग, कई-कई महीनों तक बिना जमानत जेल रहने लगे हैं, सरकार और संसद में इन्हें पहुंचाने या कुछ खास कुर्सियों पर बिठाने (राडिया टेप याद रखें) वाले बड़े-बड़े कारोबारी-अफसर भी जेलों में ईद-दीवाली मनाने को बेबस हुए हैं, इसलिए अब शायद जमानत के माहौल में फर्क लाने की बात कुछ लोग सोचने लगें। वैसे भी अदालत का कागजी नजरिया तो यही है कि बेल एक हक है और जेल मजबूरी। मतलब यह कि किसी पर चल रहे मामले का फैसला होने तक जमानत पाना उसका हक है, और सजा के पहले तक उसे जेल में जांच एजेंसी किसी मजबूरी में ही रखे। बड़े-बड़े लोगों के पिसने से हो सकता है कि छोटे लोगों का भी कुछ भला हो जाए और कांगे्रस के सबसे आक्रामक बयान दे रहे पदाधिकारी दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों लगातार दुनिया के कई देशों की मिसालें दे-देकर ट्विटर पर लिखा कि भारत में भी इसी तरह जमानत मिल जानी चाहिए।
अब हम थोड़ी जमीनी हकीकत की बात करें तो कोई जांच एजेंसी भी किसी अभियुक्त को या संदिग्ध को लंबे समय तक अपनी हिरासत में या न्यायिक हिरासत में जेल में इसीलिए रख पाती है कि वह अदालत से बार-बार समय लेती है कि उसकी जांच जारी है और फलां लोगों के जमानत पर बाहर आ जाने से जांच, सुबूत या गवाह पर असर पड़ सकता है। अदालतें कई बार इस तर्क को न मानते हुए जमानत दे देती हैं और कई बार उससे साफ मना कर देती हैं। न्यायपालिका में यह बात छुपी हुई नहीं है कि बहुत से जज दरियादिली से अधिकतर लोगों को जमानत दे देने के लिए जाने जाते हैं और बहुत से जज तकरीबन तमाम अर्जियों को खारिज करते हुए जमानत न देने के लिए जाने जाते हैं। दरअसल कानून जमानत के मामलों में समझ का पूरा इस्तेमाल करके लगभग मर्जी से ही फैसला लेने का हक अदालत को देता है। इसके चलते होता यह है कि जिले से राज्य के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक होते हुए जमानत का रास्ता महीनों लंबा हो सकता है। हमने आज इस मुद्दे की शुरूआत जिन दिग्गज लोगों से की है, वे तमाम लखपति, करोड़पति और अरबपति लोग हैं। उनको अपने परिवार के लिए कुछ कमाने की कोई जरूरत नहीं होती और वे पूरी जिंदगी जेल में रह लें तो भी घर भूखा नहीं मरेगा। दूसरी तरफ देश भर में दसियों लाख गरीब लोग ऐसे हैं जो कि अपने घर के लगभग अकेले कमाऊ होते हैं जिनके जेल में फैसले के पहले के गुजारे हुए दिन, महीने या बरस, उनके परिवार को भूखा मार डालते हैं, बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है और रोज कमाने वाले ऐसे लोगों की इस विचाराधीन कैद की भरपाई कानून कभी नहीं कर पाता।
ऐसे लोगों के भले के लिए कानून या कानून के नजरिए में ऐसे फेरबदल की जरूरत है जिससे कि इन्हें अधिक समय तक जेल के भीतर न रखा जा सके। वैसे भी जो गरीब है, कमजोर है, छोटे तबके का है, वह गिरफ्तारी के बाहर आकर, क्या खाकर सुबूतों और गवाहों को प्रभावित कर सकता है? इसलिए जमानत के कानून-नजरिए में हम तुरंत इस फेरबदल की सिफारिश करते हैं कि तमाम गरीब लोग तुरंत ही जमानत के हकदार माने जाएं। इनमें जो लोग हिंसक या संगठित अपराधों वाले पुराने और पेशेवर लोग हों, उन्हें चाहे तो अदालत कुछ और अरसा जेल मेें रख ले लेकिन जो आदतन अपराधी नहीं हैं, गरीब हैं, छोटे हैं और जिनके अपराध बड़े नहीं हैं, उनकी जमानत सिर्फ उनकी अर्जी पर आनन-फानन हो जानी चाहिए और एक दिन भी उन्हें जेल के भीतर नहीं रखना चाहिए। हमारा ख्याल है कि मौजूदा कानून के भीतर ही ऐसी व्याख्या करने का पूरा हक न्यायपालिका को है, और सुप्रीम कोर्ट को तुरंत ही इसे एक अनिवार्य व्यवस्था बनाना चाहिए। आज बड़े-बड़े ताकतवर अभियुक्तों के लिए बड़े-बड़े वकील गवाह, सुबूत, बयान और जांच से लेकर अदालती कार्रवाई तक को ताकत से प्रभावित करने की पूरी कोशिश करते हुए अपने मुवक्किल को जेल से बाहर लाने में जुटे रहते हैं। ऐसे स्टिंग ऑपरेशन भी सामने आ चुके हैं, और यह भी जाहिर बात है कि चाहे कम संख्या में सही, अदालती व्यवस्था अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्ट है। ऐसे में गरीब को बराबरी की सुनवाई पाने, जमानत की शर्तों का इंतजाम करने, बड़े-बड़े वकील रखने की कोई सहूलियत तो होती नहीं। कानून जब दूसरे कई पहलुओं से देखने पर अपने को पूरी तरह अंधा साबित करने में लगा हुआ दिखता है, तो फिर उसे गरीब और अमीर के फर्क, उनकी ताकत के फर्क को अनदेखा करते हुए दोनों को बराबरी के मौके देना चाहिए, और यह कहने से हमारा यह मतलब है कि दोनों के लिए बराबरी की संभावनाएं अदालत को खड़ी करनी चाहिए, जिसका रास्ता सिर्फ यही हो सकता है कि आदतन, पेशेवर अपराधियों को छोड़ तमाम गरीबों को गिरफ्तारी के साथ ही जमानत का हक रहना चाहिए। हम इस मुद्दे पर चर्चा सिर्फ मानवाधिकार संगठनों के बैनर तले नहीं चाहते, भारत में इस तबके ने सरकार विरोधी होने की एक साख कमा ली है, जिससे कि उनकी बातें बहुत सा असर खो बैठी हैं। इस मुद्दे पर हम उन तमाम संगठनों की पहल की अपील भी करते हैं जो कि गरीबों से किसी भी तरह की हमदर्दी रखते हैं, फिर चाहे वे मानवाधिकार आंदोलनकारी हों या न हों।
संपादकीय
कमजोर-गरीब को बिन मांगे जमानत मिल जानी चाहिए
देश के बड़े-बड़े मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, बड़े-बड़े अफसर और निजी कारोबारों के बड़े-बड़े लोग पिछले दो-चार दिनों में जेल के भीतर महीनों गुजारकर जमानत पर बाहर निकले हैं। इसके पहले कई किस्म के सामाजिक आंदोलनकारी बरसों तक जमानत न मिलने को लेकर खबरों में बने रहे हैं। इनके अलावा ऐसे सभी तबकों के बड़े-बड़े सैकड़ों और लोग तरह-तरह की तिकड़में लगाकर गिरफ्तारी से बचे हुए हैं, और गिरफ्तारी हो जाने पर जमानत में महीनों लग जाने की बात उनकी नींद जरूर उड़ा रही होगी। यह मौका इस चर्चा को छेडऩे के लिए सही है कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को उस पर लगे आरोपों की सुनवाई चलने तक जमानत पाने का कितना हक कानून में लिखा हुआ है और कितना मौका उसे इसे पाने का मिलता है। देश में दसियों लाख विचाराधीन कैदी बरसों से जेल काट रहे हैं और जब कभी कोई अदालत जेल की सलाखों के पीछे झांकने का समय निकालती है, बहुत से ऐसे लोग, ऐसे बेजुबान-कमजोर लोग, सलाखों के पीछे बरसों से बंद मिलते हैं जो कि उन पर चल रहे मामले में संभव अधिकतम सजा से अधिक दिन सुनवाई के दौरान ही कैद में काट चुके हैं। इन दसियों लाख लोगों की बरसों की तकलीफ के आधार पर तो हम सरकार-संसद के रूख में किसी फर्क की उम्मीद नहीं करते थे, न ही करते हैं, लेकिन अब चूंकि सरकार और संसद के लोग, बहुत बड़े-बड़े लोग, कई-कई महीनों तक बिना जमानत जेल रहने लगे हैं, सरकार और संसद में इन्हें पहुंचाने या कुछ खास कुर्सियों पर बिठाने (राडिया टेप याद रखें) वाले बड़े-बड़े कारोबारी-अफसर भी जेलों में ईद-दीवाली मनाने को बेबस हुए हैं, इसलिए अब शायद जमानत के माहौल में फर्क लाने की बात कुछ लोग सोचने लगें। वैसे भी अदालत का कागजी नजरिया तो यही है कि बेल एक हक है और जेल मजबूरी। मतलब यह कि किसी पर चल रहे मामले का फैसला होने तक जमानत पाना उसका हक है, और सजा के पहले तक उसे जेल में जांच एजेंसी किसी मजबूरी में ही रखे। बड़े-बड़े लोगों के पिसने से हो सकता है कि छोटे लोगों का भी कुछ भला हो जाए और कांगे्रस के सबसे आक्रामक बयान दे रहे पदाधिकारी दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों लगातार दुनिया के कई देशों की मिसालें दे-देकर ट्विटर पर लिखा कि भारत में भी इसी तरह जमानत मिल जानी चाहिए।
अब हम थोड़ी जमीनी हकीकत की बात करें तो कोई जांच एजेंसी भी किसी अभियुक्त को या संदिग्ध को लंबे समय तक अपनी हिरासत में या न्यायिक हिरासत में जेल में इसीलिए रख पाती है कि वह अदालत से बार-बार समय लेती है कि उसकी जांच जारी है और फलां लोगों के जमानत पर बाहर आ जाने से जांच, सुबूत या गवाह पर असर पड़ सकता है। अदालतें कई बार इस तर्क को न मानते हुए जमानत दे देती हैं और कई बार उससे साफ मना कर देती हैं। न्यायपालिका में यह बात छुपी हुई नहीं है कि बहुत से जज दरियादिली से अधिकतर लोगों को जमानत दे देने के लिए जाने जाते हैं और बहुत से जज तकरीबन तमाम अर्जियों को खारिज करते हुए जमानत न देने के लिए जाने जाते हैं। दरअसल कानून जमानत के मामलों में समझ का पूरा इस्तेमाल करके लगभग मर्जी से ही फैसला लेने का हक अदालत को देता है। इसके चलते होता यह है कि जिले से राज्य के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक होते हुए जमानत का रास्ता महीनों लंबा हो सकता है। हमने आज इस मुद्दे की शुरूआत जिन दिग्गज लोगों से की है, वे तमाम लखपति, करोड़पति और अरबपति लोग हैं। उनको अपने परिवार के लिए कुछ कमाने की कोई जरूरत नहीं होती और वे पूरी जिंदगी जेल में रह लें तो भी घर भूखा नहीं मरेगा। दूसरी तरफ देश भर में दसियों लाख गरीब लोग ऐसे हैं जो कि अपने घर के लगभग अकेले कमाऊ होते हैं जिनके जेल में फैसले के पहले के गुजारे हुए दिन, महीने या बरस, उनके परिवार को भूखा मार डालते हैं, बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है और रोज कमाने वाले ऐसे लोगों की इस विचाराधीन कैद की भरपाई कानून कभी नहीं कर पाता।
ऐसे लोगों के भले के लिए कानून या कानून के नजरिए में ऐसे फेरबदल की जरूरत है जिससे कि इन्हें अधिक समय तक जेल के भीतर न रखा जा सके। वैसे भी जो गरीब है, कमजोर है, छोटे तबके का है, वह गिरफ्तारी के बाहर आकर, क्या खाकर सुबूतों और गवाहों को प्रभावित कर सकता है? इसलिए जमानत के कानून-नजरिए में हम तुरंत इस फेरबदल की सिफारिश करते हैं कि तमाम गरीब लोग तुरंत ही जमानत के हकदार माने जाएं। इनमें जो लोग हिंसक या संगठित अपराधों वाले पुराने और पेशेवर लोग हों, उन्हें चाहे तो अदालत कुछ और अरसा जेल मेें रख ले लेकिन जो आदतन अपराधी नहीं हैं, गरीब हैं, छोटे हैं और जिनके अपराध बड़े नहीं हैं, उनकी जमानत सिर्फ उनकी अर्जी पर आनन-फानन हो जानी चाहिए और एक दिन भी उन्हें जेल के भीतर नहीं रखना चाहिए। हमारा ख्याल है कि मौजूदा कानून के भीतर ही ऐसी व्याख्या करने का पूरा हक न्यायपालिका को है, और सुप्रीम कोर्ट को तुरंत ही इसे एक अनिवार्य व्यवस्था बनाना चाहिए। आज बड़े-बड़े ताकतवर अभियुक्तों के लिए बड़े-बड़े वकील गवाह, सुबूत, बयान और जांच से लेकर अदालती कार्रवाई तक को ताकत से प्रभावित करने की पूरी कोशिश करते हुए अपने मुवक्किल को जेल से बाहर लाने में जुटे रहते हैं। ऐसे स्टिंग ऑपरेशन भी सामने आ चुके हैं, और यह भी जाहिर बात है कि चाहे कम संख्या में सही, अदालती व्यवस्था अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्ट है। ऐसे में गरीब को बराबरी की सुनवाई पाने, जमानत की शर्तों का इंतजाम करने, बड़े-बड़े वकील रखने की कोई सहूलियत तो होती नहीं। कानून जब दूसरे कई पहलुओं से देखने पर अपने को पूरी तरह अंधा साबित करने में लगा हुआ दिखता है, तो फिर उसे गरीब और अमीर के फर्क, उनकी ताकत के फर्क को अनदेखा करते हुए दोनों को बराबरी के मौके देना चाहिए, और यह कहने से हमारा यह मतलब है कि दोनों के लिए बराबरी की संभावनाएं अदालत को खड़ी करनी चाहिए, जिसका रास्ता सिर्फ यही हो सकता है कि आदतन, पेशेवर अपराधियों को छोड़ तमाम गरीबों को गिरफ्तारी के साथ ही जमानत का हक रहना चाहिए। हम इस मुद्दे पर चर्चा सिर्फ मानवाधिकार संगठनों के बैनर तले नहीं चाहते, भारत में इस तबके ने सरकार विरोधी होने की एक साख कमा ली है, जिससे कि उनकी बातें बहुत सा असर खो बैठी हैं। इस मुद्दे पर हम उन तमाम संगठनों की पहल की अपील भी करते हैं जो कि गरीबों से किसी भी तरह की हमदर्दी रखते हैं, फिर चाहे वे मानवाधिकार आंदोलनकारी हों या न हों।
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