04 नवंबर 11
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में इस पखवाड़े सरकार के तीन जिलों के नेत्र शिविर में ऑपरेशन के बाद करीब पचास से अधिक लोग अपनी रौशनी खो चुके हैं और आधा दर्जन के करीब मौतें भी ऑपरेशन के मरीजों के बीच हो चुकी हैं। देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, दिल्ली के एम्स, से जांच दल आज ही छत्तीसगढ़ पहुंचा है और उसकी रिपोर्ट आने में कुछ वक्त लगेगा कि आंखों के साधारण ऑपरेशन के दौरान सरकारी इंतजाम में भी ऐसा हादसा क्यों हुआ, और हफ्ते-दस दिन के भीतर ही अगल-बगल के तीन जिलों में ऐसा क्यों हुआ? दुर्ग जिला छत्तीसगढ़ के ताकतवर नेताओं से लबालब है, राजनांदगांव और कवर्धा मुख्यमंत्री के अपने जिले हैं, इसलिए यह समझना भी कुछ मुश्किल है कि इन जिलों में ही ऐसा क्यों हुआ? इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल पर जो हमला बोला है, वह तो विपक्ष की एक राजनीतिक जिम्मेदारी भी है, और उसे ऐसा मौका भी सरकार की ऐसी गलतियों से मिल गया है, लेकिन आरोपों से परे हम यह देखना चाहते हैं कि सरकारी इलाज की ऐसी दुर्गति क्यों है और उसका क्या नतीजा निकलता है।
पूरे देश में ही सरकारें लोगों के इलाज से हाथ खींचते चली जा रही हैं। एक तरफ बड़े-बड़े निजी अस्पताल बड़ा-बड़ा कारोबार कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ में सरकार अपने अमले के इलाज के लिए एक-एक करके ऐसे बहुत से अस्पतालों को मान्यता दे चुकी है। जिस तरह के इलाज की सहूलियत सरकार के अपने अस्पतालों में है, और जिसकी क्षमता बढ़ाने की जरूरत है, उस तरह के इलाज का खर्च भी इन निजी अस्पतालों को सरकार अपने कर्मचारियों की तरफ से देती है। नतीजा यह है कि सरकार के लोग अब निजी अस्पतालों की तरफ जा चुके हैं और राजधानी तक के सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज अस्पताल का बुरा हाल है। हमारे पास मेडिकल कॉलेज अस्पताल की जो तस्वीरें आती हैं उनमें बहुत किस्म की जांच के लिए हफ्तों के इंतजार की कतार दिखती है। लोग अस्पताल के गलियारों में अपने-अपने मरीजों को लिए हुए एक-एक पखवाड़े जांच का इंतजार करते हैं। हम सरकारी क्षेत्र से जनता के इलाज की सुविधाओं को लगातार कम करते चले जाने, या बिगड़ते चले जाने देने और निजी अस्पतालों के कारोबार को बढ़ावा देने के बीच एक सीधा रिश्ता देखते हैं। यह बात सोच-समझकर किसी नीयत से हो रही है, या फिर देश के आर्थिक उदारीकरण के माहौल के चलते अपने-आप हो रही है, इसकी परख करने की कोई कसौटी अभी हम अपने पास नहीं देख रहे, लेकिन ऐसा हो तो रहा है कि जिस तरह महंगे स्कूल-कॉलेज बढ़ रहे हैं और सरकार की सुविधाएं या तो बढ़ नहीं रही हैं, या घट रही हैं, इसी तरह सरकारी अस्पतालों में जनता का इलाज एक वजह से या दूसरी वजह से, घटते चल रहा है।
ऐसी हालत के बीच जब आंखों के बहुत साधारण और सामान्य ऑपरेशनों के मामले में सरकारी अस्पतालों या शिविरों में तीन-तीन जिलों में बड़े पैमाने पर ऐसे हादसे हुए हैं, तो उससे इन मरीजों के अलावा भी प्रदेश के उन तमाम गरीब लोगों का विश्वास खत्म होता है जिनके लिए हफ्तों के इंतजार वाले सरकारी अस्पताल भी उनकी पहुंच के भीतर के अकेले अस्पताल हैं। जिनके लिए और कोई जगह नहीं है, जो तीन रूपए किलो चावल के बाद से दो वक्त पेट भर खाना अपनी जिंदगी में पहली बार देख रहे हैं, वे सरकारी अस्पताल छोड़कर और कहां जा सकते हैं? लेकिन जब आंखों की रौशनी खत्म हो जाने, और जिंदगी चले जाने के ऐसे मामले खबरों में आते हैं और छा जाते हैं, तो इसके बाद गरीब भी ऐसा कर्ज जुटाने की कोशिश करता है जिससे कि वह निजी अस्पताल में भी हजारों रूपए खर्च करके जा सके। गरीबों के एक तबके के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने इलाज के लिए बीमा कार्ड लागू किया है जो धीरे-धीरे लोगों तक पहुंच रहा है। लेकिन आंखें और जान चली जाने की दहशत से क्या यह नहीं होगा कि लोग सरकारी कैम्प में ऑपरेशन कराने के बजाय ऐसे कार्ड से निजी अस्पतालों में ऑपरेशन कराने जाएं? हम इस हादसे के पीछे ऐसी किसी साजिश की बात नहीं करते, लेकिन ऐसे हादसे का बहुत सीधा-सीधा असर यही होता है कि सरकारी अस्पतालों पर से लोगों का भरोसा खत्म हो जाता है और लोग या तो सरकारी बीमा कार्ड लेकर या कर्ज लेकर निजी अस्पतालों तक जाएंगे।
पढ़ाई और इलाज, पीने का पानी और सफाई या बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतें-जरूरतें, इन सबसे सरकारें हाथ खींच रही हैं, और म्युनिसिपल जैसी स्थानीय संस्थाएं भी बड़े-बड़े बिल्डरों की तरह बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को अपना बुनियादी काम मान ले रही हैं। यह सिलसिला खतरनाक है और जनविरोधी भी है। समाज के लोगों की जो मूलभूत जरूरतें हैं, उनके बजाय जब सरकारों का ध्यान सार्वजनिक या निजी कमाई के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट पर केंद्रित हो जाता है, तो फिर इसकी सबसे बड़ी मार गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ती है।
हम तीन नेत्र शिविरों में हुए इन हादसों को सिर्फ एक जांच और कार्रवाई का मौका नहीं मानते। इसे लेकर सरकार और समाज के भीतर सरकारी इलाज सुविधाओं पर एक गंभीर चर्चा की जरूरत है और सरकार को गरीब जनता की सेहत बाजार के हवाले नहीं करनी चाहिए, और सरकारी अस्पतालों को सुधारने के लिए जो कुछ करने की जरूरत है वह करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में जनसेवा के जिस एक विभाग की भ्रष्टाचार से लेकर, बेअसर होने तक, कई किस्म की नाकामयाबी रही है, उनमें स्वास्थ्य विभाग लगभग सबसे ऊपर है। इस राज्य में जब संपन्नता की रौशनी शहरों को चमचमा रही है, तब सरकारी इलाज से गरीबों की आंखों की रौशनी और उनकी जिंदगी छिने, पूरे राज्य के गरीबों का भरोसा छिने, यह अच्छी बात नहीं है।
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में इस पखवाड़े सरकार के तीन जिलों के नेत्र शिविर में ऑपरेशन के बाद करीब पचास से अधिक लोग अपनी रौशनी खो चुके हैं और आधा दर्जन के करीब मौतें भी ऑपरेशन के मरीजों के बीच हो चुकी हैं। देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, दिल्ली के एम्स, से जांच दल आज ही छत्तीसगढ़ पहुंचा है और उसकी रिपोर्ट आने में कुछ वक्त लगेगा कि आंखों के साधारण ऑपरेशन के दौरान सरकारी इंतजाम में भी ऐसा हादसा क्यों हुआ, और हफ्ते-दस दिन के भीतर ही अगल-बगल के तीन जिलों में ऐसा क्यों हुआ? दुर्ग जिला छत्तीसगढ़ के ताकतवर नेताओं से लबालब है, राजनांदगांव और कवर्धा मुख्यमंत्री के अपने जिले हैं, इसलिए यह समझना भी कुछ मुश्किल है कि इन जिलों में ही ऐसा क्यों हुआ? इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल पर जो हमला बोला है, वह तो विपक्ष की एक राजनीतिक जिम्मेदारी भी है, और उसे ऐसा मौका भी सरकार की ऐसी गलतियों से मिल गया है, लेकिन आरोपों से परे हम यह देखना चाहते हैं कि सरकारी इलाज की ऐसी दुर्गति क्यों है और उसका क्या नतीजा निकलता है।
पूरे देश में ही सरकारें लोगों के इलाज से हाथ खींचते चली जा रही हैं। एक तरफ बड़े-बड़े निजी अस्पताल बड़ा-बड़ा कारोबार कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ में सरकार अपने अमले के इलाज के लिए एक-एक करके ऐसे बहुत से अस्पतालों को मान्यता दे चुकी है। जिस तरह के इलाज की सहूलियत सरकार के अपने अस्पतालों में है, और जिसकी क्षमता बढ़ाने की जरूरत है, उस तरह के इलाज का खर्च भी इन निजी अस्पतालों को सरकार अपने कर्मचारियों की तरफ से देती है। नतीजा यह है कि सरकार के लोग अब निजी अस्पतालों की तरफ जा चुके हैं और राजधानी तक के सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज अस्पताल का बुरा हाल है। हमारे पास मेडिकल कॉलेज अस्पताल की जो तस्वीरें आती हैं उनमें बहुत किस्म की जांच के लिए हफ्तों के इंतजार की कतार दिखती है। लोग अस्पताल के गलियारों में अपने-अपने मरीजों को लिए हुए एक-एक पखवाड़े जांच का इंतजार करते हैं। हम सरकारी क्षेत्र से जनता के इलाज की सुविधाओं को लगातार कम करते चले जाने, या बिगड़ते चले जाने देने और निजी अस्पतालों के कारोबार को बढ़ावा देने के बीच एक सीधा रिश्ता देखते हैं। यह बात सोच-समझकर किसी नीयत से हो रही है, या फिर देश के आर्थिक उदारीकरण के माहौल के चलते अपने-आप हो रही है, इसकी परख करने की कोई कसौटी अभी हम अपने पास नहीं देख रहे, लेकिन ऐसा हो तो रहा है कि जिस तरह महंगे स्कूल-कॉलेज बढ़ रहे हैं और सरकार की सुविधाएं या तो बढ़ नहीं रही हैं, या घट रही हैं, इसी तरह सरकारी अस्पतालों में जनता का इलाज एक वजह से या दूसरी वजह से, घटते चल रहा है।
ऐसी हालत के बीच जब आंखों के बहुत साधारण और सामान्य ऑपरेशनों के मामले में सरकारी अस्पतालों या शिविरों में तीन-तीन जिलों में बड़े पैमाने पर ऐसे हादसे हुए हैं, तो उससे इन मरीजों के अलावा भी प्रदेश के उन तमाम गरीब लोगों का विश्वास खत्म होता है जिनके लिए हफ्तों के इंतजार वाले सरकारी अस्पताल भी उनकी पहुंच के भीतर के अकेले अस्पताल हैं। जिनके लिए और कोई जगह नहीं है, जो तीन रूपए किलो चावल के बाद से दो वक्त पेट भर खाना अपनी जिंदगी में पहली बार देख रहे हैं, वे सरकारी अस्पताल छोड़कर और कहां जा सकते हैं? लेकिन जब आंखों की रौशनी खत्म हो जाने, और जिंदगी चले जाने के ऐसे मामले खबरों में आते हैं और छा जाते हैं, तो इसके बाद गरीब भी ऐसा कर्ज जुटाने की कोशिश करता है जिससे कि वह निजी अस्पताल में भी हजारों रूपए खर्च करके जा सके। गरीबों के एक तबके के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने इलाज के लिए बीमा कार्ड लागू किया है जो धीरे-धीरे लोगों तक पहुंच रहा है। लेकिन आंखें और जान चली जाने की दहशत से क्या यह नहीं होगा कि लोग सरकारी कैम्प में ऑपरेशन कराने के बजाय ऐसे कार्ड से निजी अस्पतालों में ऑपरेशन कराने जाएं? हम इस हादसे के पीछे ऐसी किसी साजिश की बात नहीं करते, लेकिन ऐसे हादसे का बहुत सीधा-सीधा असर यही होता है कि सरकारी अस्पतालों पर से लोगों का भरोसा खत्म हो जाता है और लोग या तो सरकारी बीमा कार्ड लेकर या कर्ज लेकर निजी अस्पतालों तक जाएंगे।
पढ़ाई और इलाज, पीने का पानी और सफाई या बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतें-जरूरतें, इन सबसे सरकारें हाथ खींच रही हैं, और म्युनिसिपल जैसी स्थानीय संस्थाएं भी बड़े-बड़े बिल्डरों की तरह बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को अपना बुनियादी काम मान ले रही हैं। यह सिलसिला खतरनाक है और जनविरोधी भी है। समाज के लोगों की जो मूलभूत जरूरतें हैं, उनके बजाय जब सरकारों का ध्यान सार्वजनिक या निजी कमाई के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट पर केंद्रित हो जाता है, तो फिर इसकी सबसे बड़ी मार गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ती है।
हम तीन नेत्र शिविरों में हुए इन हादसों को सिर्फ एक जांच और कार्रवाई का मौका नहीं मानते। इसे लेकर सरकार और समाज के भीतर सरकारी इलाज सुविधाओं पर एक गंभीर चर्चा की जरूरत है और सरकार को गरीब जनता की सेहत बाजार के हवाले नहीं करनी चाहिए, और सरकारी अस्पतालों को सुधारने के लिए जो कुछ करने की जरूरत है वह करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में जनसेवा के जिस एक विभाग की भ्रष्टाचार से लेकर, बेअसर होने तक, कई किस्म की नाकामयाबी रही है, उनमें स्वास्थ्य विभाग लगभग सबसे ऊपर है। इस राज्य में जब संपन्नता की रौशनी शहरों को चमचमा रही है, तब सरकारी इलाज से गरीबों की आंखों की रौशनी और उनकी जिंदगी छिने, पूरे राज्य के गरीबों का भरोसा छिने, यह अच्छी बात नहीं है।
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