उत्कृष्टता की एक बेरहम कसौटी

आजकल
सुनील कुमार
उत्कृष्टता की एक बेरहम कसौटी
भारत के एक वक्त के सबसे मशहूर कार्टूनिस्ट रहे आर.के. लक्ष्मण के काम पर  अभी टीवी पर किसी सीरियल की मुनादी रात-दिन आ रही है इसलिए अभी उनके बारे में सोचने का एक मौका आया। उन्होंने अपनी लगभग तमाम कामकाजी जिंदगी टाईम्स ऑफ इंडिया में काम करते गुजारी और वहां पर इस बड़े अखबार के भीतर वे अपने-आपमें उसी तरह एक साम्राज्य थे जिस तरह इटली के बीच में बसा वेटिकन अपने-आपमें एक अलग देश और साम्राज्य है। इस अखबार समूह में अब वैसे तो पहले वाली कोई बात रही नहीं, लेकिन जब यह एक बहुत अच्छा, विचारों का अखबार हुआ करता था तब भी आर.के. लक्ष्मण के विचार उनके कार्टूनों से झांकते हुए अखबार के विचारों से टकराते भी चलते थे, तो भी उनकी अहमियत इस अखबार में कभी कम नहीं हुई।
हालांकि लक्ष्मण के बारे में आज इस तरह की बात लिखने का कोई मौका नहीं है, लेकिन घिसे-पिटे मुद्दों पर बार-बार लिखने के बजाय बेहतर यह है कि देश के इस दिग्गज कार्टूनिस्ट के काम और उनके बारे में इस हफ्ते मैं आज यहां लिखूं, क्योंकि मेरी उनसे एक मुलाकात रही है और पिछली चौथाई सदी से अधिक वक्त से मैं देश के हिंदी और अंगे्रजी मीडिया के प्रमुख कार्टूनिस्टों का काम देखते आ रहा हूं, बड़ी बारीकी से।
लक्ष्मण के आखिरी कई बरस फिल्मी जुबान में एंटीक्लाइमेक्स रहे। पहले का उनका काम जितना अच्छा था, आखिरी का उनका काम फीका और बेअसर होते चले गया। लेकिन काम से अधिक उनका नाम था जो उनके जीते-जी मानो एक चबूतरे पर खड़ा हुआ था इसलिए लोगों ने उनका मूल्यांकन करना छोड़ दिया था। आज जिस तरह सचिन तेंदुलकर पांच-दस रनों पर कभी आऊट हो जाए तो भी लोग इस खिलाड़ी के महान प्रदर्शन के साए में खड़े हुए ऐसे कमजोर प्रदर्शन के अस्तित्व को देखना ही नहीं चाहते। उसी तरह लक्ष्मण का काम रहा, वे अपने-आपको दोहराते रहे, शायद बुजुर्गियत और कमजोरी के चलते वे अपने उस कमरे में कैद होकर रह गए थे जो टाईम्स ऑफ इंडिया के दफ्तर के भीतर एक टापू की तरह था और जहां बैठकर लक्ष्मण अपनी मर्जी से अपना काम करते थे। शायद ऐसा ही कुछ असर बहुत से दायरों के बुजुर्ग, वरिष्ठ या ऊंची कुर्सी पर पहुंचे हुए लोगों के साथ होता है कि वे जमीन से कट से जाते हैं। लक्ष्मण अपने-आपको दोहराने के साथ-साथ भार भी खोते चल रहे थे और एक वक्त उनका अच्छा काम देखे हुए लोग धीरे-धीरे टाईम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने के आखिरी कॉलम को देखना कम कर चुके थे।
एक धार और पैनापन पूरी जिंदगी कहीं भी कायम रहना बहुत मुश्किल होता है। अच्छे खासे तेज लोग भी अगर जिंदगी के आखिरी में जाकर अपने पिछले काम को जारी रखने की जिद करते हैं तो बहुत से मामलों में वे अपनी पिछली साख को खोते ही हैं, नया कुछ नहीं पाते। यह ठीक वैसे ही है कि जैसे सचिन के आने के बाद तक गावस्कर अगर मैदान में जमे रहने की जिद जारी रखते, तो हो सकता है कि वे अपने ही पुराने आंकड़ों के महत्व को कम करते जाते, वे अपने ही औसत को गिराते जाते, और लोग उन्हें आज उस तरह याद नहीं करते, जिस तरह आज करते हैं।
यह सिलसिला मैंने अखबारनवीसी के पेशे में भी देखा, जहां लोग बुजुर्ग होने के साथ-साथ वरिष्ठ होते चलना भूल सा जाते हैं। और महज यादों को ताजा मामलों पर लिखने के लिए काफी काबिलीयत मान लेते हैं। यादों का अपना एक महत्व होता है, वे आत्मकथा, जीवनी या संस्मरण लिखने के लिए बहुत ही कीमती सामान होती हैं, लेकिन यादें आज के मुद्दों पर विश्लेषण के लिए जरूरी सामानों में से महज एक होती हैं। बहुत से चुक गए लोग अब तक उस अंदाज में, उन्हीं पुरानी बातों के दम पर लिखते चलते हैं जिस किस्म की पुरानी तकनीक के दम पर आज मानो गावस्कर बैटिंग करने लगे।
वक्त के साथ-साथ जवान और जानकार बने रहना खासा मुश्किल होता है। और फिर एक बात यह भी रहती है कि जिस कारोबार या जिस पेशे में लोगों का पिछला काम उनकी जवानी या कामकाजी जिंदगी की चुनौतियों की आग में तपकर निखरा हुआ रहता है, आज जब वे सांझ के करीब बोझिल कदमों से टहलते हुए काम करते हैं तो वह काम उस तपन से गुजरा हुआ तो रहता नहीं, उनके सामने वह चुनौती भी नहीं रहती, और बहुत से या अधिकतर मामलों में लोगों के मन में अपने इतिहास को लेकर एक बददिमागी आ जाने का खतरा भी रहता है। नतीजा यह होता है कि ताजा जानकारी और ताजा मुद्दों से अछूते रहते हुए कुछ पुराने दिग्गज जब लिखते हैं तो अपनी बेदिमागी को अनदेखा करते हुए वे अपने इतिहास को लेकर एक बददिमागी का शिकार भी हो जाते हैं। यहां पर उनका काम अपने पिछले काम से खराब होने लगता है और यह कमजोरी वक्त के साथ-साथ बढ़ती चली जाती है।
कुछ ऐसे भी बुजुर्ग होते हैं जो अपने सीनियर होने के अहसास से आजाद रहते हैं और अपने काम को ही अपनी वरिष्ठता मानने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे लोग नौजवान और जानकार, सुनार की लपटों से गुजरते हुए सोने की तरह खरे और शानदार लोगों को तगड़ी टक्कर भी देते हैं, जैसे आऊटलुक पत्रिका के संपादक विनोद मेहता। लेकिन दूसरी तरफ कुछ ऐसे संपादक होते हैं जो अपने कामकाज के दौर में ही काम से अलग हो जाते हैं, द हिन्दू के प्रधान संपादक एन. राम की तरह, जो कि एक दूसरा काबिल संपादक देखकर उसे काम देते हैं। पिछले दिनों कार्पोरेट विरासत का हिन्दुस्तान के इतिहास का एक सबसे बड़ा मामला सामने आया जब टाटा उद्योग समूह के मुखिया रतन टाटा के वारिस का फैसला इस उद्योग समूह के बाहर की एक चयन कमेटी ने तय किया। रतन टाटा गर चाहते तो कई और बरस तक वे अपनी इस कुर्सी पर कायम रह सकते थे, इसी तरह भारत की एक सबसे बड़ी कंपनी इंफोसिस के चेयरमेन एन.आर. नारायणमूर्ति ने इसी अगस्त में अपने-आपको कंपनी के कामकाज से पूरी तरह अलग कर लिया, और इसके पहले भी वे 2006 से अपने को गैरकामकाजी चेयरमेन की तरह रखे हुए थे।
आर.के. लक्ष्मण के बारे में यह चर्चा कुछ लोगों को गैरजरूरी और कुछ कड़वी लग सकती है। लेकिन जिस इंसान ने पूरी जिंदगी देश और दुनिया के अनगिनत ताकतवर लोगों पर कोड़े चलाने का काम किया है, उसके बारे में कुछ खुली-खुली, कुछ खरी-खरी, और कुछ निजी विचारों से भरी बातचीत करने में क्या दिक्कत है? यह बात मुझे इसलिए लगती है क्योंकि हिन्दी के कम से कम दो ऐसे कार्टूनिस्ट मुझे अच्छी तरह याद हैं, जिनका काम इतना पैना और इतना धारदार रहा कि उनके सामने अपने बेहतर दिनों में भी लक्ष्मण नहीं टिक पाते थे। ये एक अलग बात है कि जनसत्ता के कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर की पहुंच हिंदी अखबार की वजह से एक तो सीमित थी और एक यह भी कि वह कम ताकतवर तबके तक थी। दूसरी तरफ आर.के. लक्ष्मण की पहुंच देश के सबसे बड़े अखबार की वजह से, अंगे्रजी अखबार की वजह से बहुत अधिक थी क्योंकि अंगे्रजी की पहुंच देश के सबसे ताकतवर तबके तक होती है। ऐसे में आखिरी-आखिरी में लक्ष्मण का काम वैसा ही फीका होते चले गया था जैसा कि कम पड़ती हुई आखिरी की दाल में पानी पड़ते चले जाने से उसका स्वाद हो जाता है। आखिरी के कई बरस वे अपने लिए अखबार में तय जगह को भरने का काम करते रहे और सुबह की चाय के साथ उनके काम से अखबार शुरू करने के आदी लोग उन्हें पहले की तरह वफादारी से, पढ़ते भी रहे। लेकिन बेहतर तो यह होता कि वे कुछ बरस पहले अपना काम छोड़ चुके होते। यह बात उसी तरह की है कि कुछ नेता कुछ चुनाव पहले लडऩा छोड़ चुके होते, कुछ उपन्यासकार अपनी पकड़ खोने के पहले लिखना बंद कर चुके होते।
यह लिखने का मौका आज इसलिए मिला कि लक्ष्मण के काम पर जो टीवी कार्यक्रम बन रहा है वह कहता है कि लक्ष्मण के हास्य चित्रों पर वह बन रहा है। देश के ताजा मुद्दों पर आधी सदी काम करने वाले कार्टूनिस्ट के नाम के साथ उसके व्यंग्य चित्रों के बजाय, उसके हास्य चित्र जुड़े रहें, तो यह बात लक्ष्मण के मेरे सरीखे पुराने प्रशंसक को उदास करती है। यहां पर एक दूसरी बात जो लिखने की और है, वह है हिन्दी के कार्टूनों की ताकत की। अंगे्रजी की पहुंच अधिक है, मतलब यह कि अधिक ताकतवर तबके तक उसकी पहुंच अधिक है, लेकिन फिर भी इस देश में सबसे भयानक हालात में सबसे पैने और तीखे हिंदी-अंगे्रजी कार्टून बनाने वालों में अगर मैं आज के टीवी-परख के अंदाज में नंबर दूं, तो राजेंद्र धोड़पकर के काम को दस, और लक्ष्मण के काम को शायद पांच नंबर ही दे पाऊंगा। राजेंद्र का काम भट्टी में तपकर लाल, सबसे धारदार तलवार की तरह का रहा, और लक्ष्मण का काम लगभग पूरे समय औसत से बेहतर दर्जे का रहा।
इस किस्म की बेरहमी से किसी के काम को परखने और इतनी कड़वी बात को साफ-साफ लिख देने वाले कुछ और लोग भी किसी दिन हो सकते हैं, इसलिए जिंदगी के किसी भी दायरे के वरिष्ठ लोगों, बुजुर्ग लोगों को अपनी यादों के टोकरे के तले न दबते हुए अपने काम की बेहतरी में लगना चाहिए। बालों की सफेदी उम्र का सम्मान तो दिला सकती है, काम की कसौटी पर, उत्कृष्टता की कसौटी लेकर अगर बेरहम लोग बैठे हों, तो बालों की सफेदी अपने-आपमें कोई अतिरिक्त सम्मान नहीं दिला सकती।

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