18 नवंबर 2011
संपादकीय
इटली की एक फैशन कंपनी यूनाइटेड कलर्स ऑफ बेनेटन ने अपने विज्ञापनों के ताजा अभियान से एक बार फिर खबरें खड़ी कर दी हैं। यह कंपनी अपने मालिक की एक पीढ़ी पहले से दुनिया को चौंकाने वाले विज्ञापनों की वजह से इतनी खबरों में आती रही है जितना प्रचार अपने विज्ञापनों से भी वह नहीं पा सकती थी। उसके अभी के ताजा अभियान में उसने दुनिया के कुछ देशों के बड़े-बड़े सरकारी नेताओं और ईसाई धर्म के एक प्रमुख गुरू, पोप को एक मौलवी को चूमते हुए गढ़ी गई तस्वीरों की वजह से हड़कंप मचा हुआ है। कहने को तो बेनेटन नाम की इस कंपनी ने अपने इस अभियान को नफरत नहीं का नाम दिया है, लेकिन कुल मिलाकर यह बाजारू चर्चा पाने का एक जरिया ही है।
इस अभियान के बारे में यूनाइटेड कलर्स ऑफ बेनेटन का कहना है कि यह सुलह की प्रतीकात्मक तस्वीरें है। उसका कहना है कि ये विज्ञापन 'सकारात्मक उकसावाÓ है जिसका उद्देश्य सहनशीलता की आदर्श स्थिति लोगों के सामने लाना है। अपने विज्ञापनों के जरिए लोगों को चकित करने का बेनेटन का ये प्रयास नया नहीं है। इससे पहले वह मृत्युदंड पाए कैदियों, एक पादरी का चुंबन लेती नन और एड्स से मरते एक व्यक्ति की तस्वीरों का उपयोग विज्ञापनों में कर चुका है। इस कंपनी की ऐसी हरकतों के चलते कई बार दुनिया के अलग-अलग तबकों में इसका विरोध हुआ और जैसा कि बाजार का रिवाज है, बेनेटन बदनाम हुआ, तो क्या उसका नाम नहीं हुआ? इसलिए बुरे प्रचार के चक्कर में बहुत से फिल्म वाले अपने ही फिल्मों के खिलाफ किसी-किसी से अदालतों में केस करवाते हैं, कहीं उसके पोस्टर जलवाते हैं, और कहीं उस पर रोक की मांग करवाते हैं। यही हाल किताबों का होता है, उनमें कुछ ऐसी चर्चित और विवादास्पद बातें लिखी जाती हैं कि किताब के आने के पहले ही उसके बारे में अनगिनत खबरें आने लगती हैं और उसे पढऩे के पहले ही डरी-सहमीं, बिना आत्मविश्वास वाली सरकारें उस पर रोक लगाने लगती हैं। कहीं किसी नाटक को ऐसे विरोध या ऐसी रोक के बाद सौ गुना अधिक दर्शन नसीब हो जाते हैं तो किसी किताब के एक की जगह चार-चार संस्करण छप जाते हैं।
नकारात्मक या बुरा प्रचार आम तौर पर एक सोची-समझी रणनीति के सदियों से सफल हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। लेकिन दुनिया को चौंकाते हुए कभी-कभी कुछ गैरबाजारू जनचेतना अभियान भी चलते हैं जिनका मकसद चर्चा पाना होता है। यह पूरा सिलसिला लोगों के दिल-दिमाग के बाजारू शोषण से परे का भी है और जब यह बाजार को फायदा दिलाने के लिए नहीं होता तो फिर यह लोगों को झकझोरने के लिए भी होता है। आज दिक्कत यह है कि किसी तस्वीर, नारे, विज्ञापन या सार्वजनिक जगह पर किसी प्रदर्शन या नुमाइश की इस ताकत का इस्तेमाल करने के बजाय सरकारों से लेकर बाजारों तक ऐसा खर्च अधिक होता है जिससे असर पैदा नहीं होता। प्रचार के मनोविज्ञान, उसकी तकनीक और कल्पनाशीलता के बिना जब कभी जिस तरह के अभियान चलते हैं, वे अपनी लागत को वसूल करके, खर्च करने वाले लोग कोई फायदा नहीं दे पाते। ऐसे में बेनेटन की लोगों को चौंकाने की अपार क्षमता पश्चिम के देशों में तो प्रचार से जुड़े जानकारों के बीच गंभीर अध्ययन और विचार-विमर्श की एक मॉडल बन ही चुकी है, इस पर हमारे जैसे दूर बैठे हुए लोग भी सोचते हैं, बात करते हैं, उसकी तारीफ करते हैं या उसे कोसते हैं, उसके ब्रांड के कपड़े खरीदें या न खरीदें, उस ब्रांड को जानने तो लगते ही हैं।
जैसा कि इस कंपनी के बारे में कहा जाता है कि यह बिना लागत बहुत अधिक प्रचार पा लेनेेे का हुनर जानती है और यह किसी विवाद की सरहद के भीतर तक घुसकर काम करने की आदी है, वैसा बिना किसी अधिक विवाद के भी भारत में किया जा सकता है लेकिन एक दिलचस्प और बुरी बात यह है कि बाजार के वे लोग जो प्रचार पर खासा खर्च करते हैं, वे भी अपने अभियान को असरदार बनाने के लिए मेहनत नहीं करते। लोगों को किसी कल्पनाशील कलाकार, डिजाइनर, लेखक पर खर्च करना बर्बादी लगता है, जबकि वे विज्ञापनों पर करोड़ों रूपए खर्च कर देते हैं। बहुत से अभियान देखकर हमें यह अफसोस होता है कि जरा सी और मेहनत से, कल्पनाशीलता से इस लंबे-चौड़े खर्च को कितना अधिक असरदार बनाया जा सकता था, लेकिन क्वालिटी या उत्कृष्टता के पैमाने पर सस्ता सामान कितना फीका और बेस्वाद हो जा रहा है, इसकी समझ कम लोगों को दिखाई पड़ती है। हम सिर्फ नकारात्मक या विवादास्पद अभियानों की बात नहीं कर रहे हैं, यह बात लोगों का ध्यान खींचने की तरकीबों की है, और यह काम तो बाजार से लेकर सदाचार तक के कई किस्मों के अभियानों के लिए जरूरी होता है। बिना मर्दों के बीच चुंबन की तस्वीरों के भी लोगों का ध्यान खींचने के तरीके हो सकते हैं जिससे कि कम लागत से लोगों के दिल-दिमाग में अधिक गहराई तक पहुंचा जा सकता है।
संपादकीय
इटली की एक फैशन कंपनी यूनाइटेड कलर्स ऑफ बेनेटन ने अपने विज्ञापनों के ताजा अभियान से एक बार फिर खबरें खड़ी कर दी हैं। यह कंपनी अपने मालिक की एक पीढ़ी पहले से दुनिया को चौंकाने वाले विज्ञापनों की वजह से इतनी खबरों में आती रही है जितना प्रचार अपने विज्ञापनों से भी वह नहीं पा सकती थी। उसके अभी के ताजा अभियान में उसने दुनिया के कुछ देशों के बड़े-बड़े सरकारी नेताओं और ईसाई धर्म के एक प्रमुख गुरू, पोप को एक मौलवी को चूमते हुए गढ़ी गई तस्वीरों की वजह से हड़कंप मचा हुआ है। कहने को तो बेनेटन नाम की इस कंपनी ने अपने इस अभियान को नफरत नहीं का नाम दिया है, लेकिन कुल मिलाकर यह बाजारू चर्चा पाने का एक जरिया ही है।
इस अभियान के बारे में यूनाइटेड कलर्स ऑफ बेनेटन का कहना है कि यह सुलह की प्रतीकात्मक तस्वीरें है। उसका कहना है कि ये विज्ञापन 'सकारात्मक उकसावाÓ है जिसका उद्देश्य सहनशीलता की आदर्श स्थिति लोगों के सामने लाना है। अपने विज्ञापनों के जरिए लोगों को चकित करने का बेनेटन का ये प्रयास नया नहीं है। इससे पहले वह मृत्युदंड पाए कैदियों, एक पादरी का चुंबन लेती नन और एड्स से मरते एक व्यक्ति की तस्वीरों का उपयोग विज्ञापनों में कर चुका है। इस कंपनी की ऐसी हरकतों के चलते कई बार दुनिया के अलग-अलग तबकों में इसका विरोध हुआ और जैसा कि बाजार का रिवाज है, बेनेटन बदनाम हुआ, तो क्या उसका नाम नहीं हुआ? इसलिए बुरे प्रचार के चक्कर में बहुत से फिल्म वाले अपने ही फिल्मों के खिलाफ किसी-किसी से अदालतों में केस करवाते हैं, कहीं उसके पोस्टर जलवाते हैं, और कहीं उस पर रोक की मांग करवाते हैं। यही हाल किताबों का होता है, उनमें कुछ ऐसी चर्चित और विवादास्पद बातें लिखी जाती हैं कि किताब के आने के पहले ही उसके बारे में अनगिनत खबरें आने लगती हैं और उसे पढऩे के पहले ही डरी-सहमीं, बिना आत्मविश्वास वाली सरकारें उस पर रोक लगाने लगती हैं। कहीं किसी नाटक को ऐसे विरोध या ऐसी रोक के बाद सौ गुना अधिक दर्शन नसीब हो जाते हैं तो किसी किताब के एक की जगह चार-चार संस्करण छप जाते हैं।
नकारात्मक या बुरा प्रचार आम तौर पर एक सोची-समझी रणनीति के सदियों से सफल हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। लेकिन दुनिया को चौंकाते हुए कभी-कभी कुछ गैरबाजारू जनचेतना अभियान भी चलते हैं जिनका मकसद चर्चा पाना होता है। यह पूरा सिलसिला लोगों के दिल-दिमाग के बाजारू शोषण से परे का भी है और जब यह बाजार को फायदा दिलाने के लिए नहीं होता तो फिर यह लोगों को झकझोरने के लिए भी होता है। आज दिक्कत यह है कि किसी तस्वीर, नारे, विज्ञापन या सार्वजनिक जगह पर किसी प्रदर्शन या नुमाइश की इस ताकत का इस्तेमाल करने के बजाय सरकारों से लेकर बाजारों तक ऐसा खर्च अधिक होता है जिससे असर पैदा नहीं होता। प्रचार के मनोविज्ञान, उसकी तकनीक और कल्पनाशीलता के बिना जब कभी जिस तरह के अभियान चलते हैं, वे अपनी लागत को वसूल करके, खर्च करने वाले लोग कोई फायदा नहीं दे पाते। ऐसे में बेनेटन की लोगों को चौंकाने की अपार क्षमता पश्चिम के देशों में तो प्रचार से जुड़े जानकारों के बीच गंभीर अध्ययन और विचार-विमर्श की एक मॉडल बन ही चुकी है, इस पर हमारे जैसे दूर बैठे हुए लोग भी सोचते हैं, बात करते हैं, उसकी तारीफ करते हैं या उसे कोसते हैं, उसके ब्रांड के कपड़े खरीदें या न खरीदें, उस ब्रांड को जानने तो लगते ही हैं।
जैसा कि इस कंपनी के बारे में कहा जाता है कि यह बिना लागत बहुत अधिक प्रचार पा लेनेेे का हुनर जानती है और यह किसी विवाद की सरहद के भीतर तक घुसकर काम करने की आदी है, वैसा बिना किसी अधिक विवाद के भी भारत में किया जा सकता है लेकिन एक दिलचस्प और बुरी बात यह है कि बाजार के वे लोग जो प्रचार पर खासा खर्च करते हैं, वे भी अपने अभियान को असरदार बनाने के लिए मेहनत नहीं करते। लोगों को किसी कल्पनाशील कलाकार, डिजाइनर, लेखक पर खर्च करना बर्बादी लगता है, जबकि वे विज्ञापनों पर करोड़ों रूपए खर्च कर देते हैं। बहुत से अभियान देखकर हमें यह अफसोस होता है कि जरा सी और मेहनत से, कल्पनाशीलता से इस लंबे-चौड़े खर्च को कितना अधिक असरदार बनाया जा सकता था, लेकिन क्वालिटी या उत्कृष्टता के पैमाने पर सस्ता सामान कितना फीका और बेस्वाद हो जा रहा है, इसकी समझ कम लोगों को दिखाई पड़ती है। हम सिर्फ नकारात्मक या विवादास्पद अभियानों की बात नहीं कर रहे हैं, यह बात लोगों का ध्यान खींचने की तरकीबों की है, और यह काम तो बाजार से लेकर सदाचार तक के कई किस्मों के अभियानों के लिए जरूरी होता है। बिना मर्दों के बीच चुंबन की तस्वीरों के भी लोगों का ध्यान खींचने के तरीके हो सकते हैं जिससे कि कम लागत से लोगों के दिल-दिमाग में अधिक गहराई तक पहुंचा जा सकता है।
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