लोकतंत्र से परे आखिर ना सोचें, तो कैसे?

संपादकीय
17 नवंबर 2011
कल और आज की कुछ ख़बरें दिल को परेशान करने वाली हैं, दिमाग को भी। बहुत से मामलों में एक बार फिर यह बात आसमान पर लिखी दिख  रही है कि हिंदुस्तान में जनतंत्र किस तरह धनतंत्र में तब्दील हो गया है, और लोकतंत्र के तौर-तरीके किस तरह बेशर्म हो गए हैं। अभी कुछ दिन पहले ही जब कर्नाटक के गिरफ्तार हुए पिछले मुख्यमंत्री येदियुरप्पा जेल जाते ही अस्पताल चले गए थे, और एक विचाराधीन अभियुक्त या आरोपी से मिलने उनकी भाजपा  के मुख्यमंत्री अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ अस्पताल गए थे, बिना जेल या अदालत की इजाजत के। कल राजस्थान में सीबीआई की जांच झेल रहे, कटघरे के करीब, कांग्रेस के एक भूतपूर्व मंत्री के अस्पताल में भर्ती होते ही मुख्यमंत्री गहलोत उन्हें  देखने  अस्पताल चले गए। जबकि  इस भूतपूर्व मंत्री पर जो तोहमत लगी  है वह  एक नर्स  के अपहरण, और संभावित क़त्ल  के मामले में शामिल होने की है। जिस मंत्री को वह अपने मंत्रिमंडल में रखने लायक नहीं समझते थे, उसे मिजाज़पुर्सी के लायक समझते हुए उन्होंने यह भुला दिया कि वह एक राज्य के मुख्यमंत्री हंै, उनके इस  व्यवहार से एक आरोपी के अपराध को  सामाजिक मान्यता मिल सकती है। लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की यह परेशानी मानो काफी नहीं थी, तो देश के एक सबसे चर्चित हत्याकांड में हत्यारे मनु शर्मा को पेरोल दिलाने में दिल्ली पुलिस ने अपने पिछले अदालती रुख से पलटकर एकदम से इस हत्यारे को पेरोल दिलाने में पूरी ताकत लगा दी। इसके पहले भी मनु शर्मा को जेसिका हत्याकांड में पुलिस और जांचकर्ताओं ने  किस तरह बचाया था, वह अभी पुरानी बात नहीं है। जेसिका की बहन के संघर्ष को अगर मीडिया की मदद से जन समर्थन नहीं मिलता, और न्यायपालिका जागरुक न होती, तो अपनी ताकत के बूते मनु शर्मा कभी जेल गया ही नहीं होता।
कल ही खबर थी कि सुप्रीम कोर्ट में एक मामले में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक जमीन घोटाले के मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत के नोटिस का जवाब सात बरस बाद दिया। क्या इनमें से कोई भी एक बात इन लोगों के ताकतवर हुए बिना हो सकती थी? सत्ता  की ताकत, दौलत  की ताकत, और मनु शर्मा जैसे हत्यारे के मामले  में तो दौलत  के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के एक बड़े नेता, अपने बाप की ताकत भी। किस तरह बात की बात में, ताकतवर लोग गिरफ्तार हो जाने पर जेल से घंटों में अस्पताल चले जाते हैं, यह देखते ही बनता है। दूसरी तरफ अमर सिंह जैसे स्वघोषित राष्ट्रीय  दलाल जेल से जमानत पर बाहर आते ही कहते हैं कि उन्हें पूरी साजिश की खबर है, और अदालत ऐसे जानकार को गवाही देने के बाद ही गंभीर इलाज के लिए विदेश जाने को नहीं कहती। बहुत बीमार होने की वजह से इलाज के लिए जमानत मिली, फिर इलाज के लिए विदेश जाने की इजाजत मिली, और सारी साजिश का जानकार यह आदमी सीने में राज लिए हुए बाहर चले जा रहा है। गंभीर इलाज से वह लौटे, या ना लौटे, अदालत इस आदमी को कोर्ट बुलाकर पूरी साजिश पर बयान क्यों नहीं लेती?
नितीश कटारा हत्याकांड में ऐसे ही एक दबंग हस्ती के फरजन्द विकास यादव को अदालत ने उम्रकैद की सजा तो सुनाई, लेकिन वह सजा सुनाने के 45 महीनों के भीतर जेल से किसी न किसी बहाने 85 बार बाहर आया। आखिरी बार वह मेडिकल जांच के बहाने 25 दिनों तक एम्स में  ठाठ से भर्ती रहा। जब मीडिया ने उसके बारे में दरयाफ्त करना शुरू किया तो उसे अचानक जांच किए बिना ही छुट्टी दे दी गई। ताकत के दम पर जेल से अस्पताल तक हर इंतज़ाम हो जाता है, और बड़े-बड़े ज़ुर्म करने वाले, उन्हें दी गई सजा और इंसाफ का माखौल  उड़ाते हुए आराम से घूमते हंै। जब जनतंत्र धनतंत्र में बदल जाता है, तो इससे असहमत लोग अलग -अलग दर्जे की अनास्था जनतंत्र के प्रति विकसित कर लेते हैं। उनमें से कुछ लोग हथियार उठाकर जंगलों में भी उतर जाते हैं।
अमिताभ बच्चन के परिवार में ऐश्वर्या राय ने एक कन्या को जन्म दिया है। इसके कई दिन पहले ही भारत के समाचार चैनलों के संगठन ने खुद होकर फैसला लिया था, और अमिताभ बच्चन को उसकी खबर भी कर दी थी कि इस जन्म को लेकर टीवी न्यूज़ चैनलों के कैमरे, उनकी गाडिय़ाँ, अमिताभ के घर या जन्म वाले अस्पताल के बाहर नहीं जाएंगीं। बहुत सी और बंदिशें न्यूज़ चैनलों ने खुद होकर अपने पर लाद ली थीं। यह सारे वे ही चैनल हैं जो कि एक मंत्री के साथ भंवरी की रेकॉर्डिंग समाचारों में दिखाते हैं। उस वक्त भंवरी की कोई निजी जिन्दगी नहीं होती, उसके पति और बच्चों का कोई दिल नहीं होता। आज कोई चैनल अमिताभ बच्चन और उनके कुनबे  को नाराज करना नहीं चाहता, इसलिए रातों रात आचार संहिता बनाकर अमिताभ को पेश भी कर दी। क्या कोई  छोटे, कमजोर कभी ऐसे सम्मान लायक हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों को दिखते हैं?
ताकत का सम्मान कैसा होता है, यह देखना हो तो भारत की संसद देख लें, विधानसभाएं देख लें। इनमें एक-एक करके करोड़पति और अरबपति बढ़ते चल रहे हैं। धनबल को टिकट, जीत, और फिर मंत्रीपद जैसे तोहफे कैसे मिलते हैं, यह देश की किसी भी राजधानी में देखा जा सकता है। हर दिन गैरबराबरी की ऐसी ख़बरें लोगों को लोकतंत्र से परे सोचने को मजबूर करती हैं।


 

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