सुरक्षा जांच से किसी को भी छूट क्यों?

13 सितंबर 2011
संपादकीय
भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के अमरीका जाने पर वहां एक से अधिक बार उनकी तलाशी ली गई, प्लेन पर भी और एयरपोर्ट पर भी। इस बात का भारत में विरोध हुआ, भारत ने अमरीका से विरोध किया और आज अमरीका ने भारत को चि_ी भेजकर इस घटना के लिए माफी मांगी। लेकिन हमारा मानना है कि इस सिलसिले में कुछ अलग है। न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में भी उन तमाम जगहों पर बैठे हुए लोग तरह-तरह के जुर्म में शामिल पकड़ाए जा चुके हैं जिनकी वजह से उन्हें बिना तलाशी किसी नाजुक जगह पर क्यों आने-जाने दिया जाए, यह सवाल आम इंसानों के मन में उठता है। आज इस देश में जितनी बड़ी संख्या में मंत्री, मुख्यमंत्री, अफसर, कारोबारी, कारखानेदार जेलों में पड़े हैं, वे अगर बिना सुरक्षा जांच किसी विमान में चढऩे दिए जाते हैं तो रोक-टोक वाले किसी सामान को छुपाकर ले जाने का उनका जुर्म तो आज उन पर लगी तोहमतों से कम ही होता। इसलिए किसी के किसी कुर्सी पर चढ़े होने से या उतर जाने के बाद उसे सुरक्षा जांच से किसी तरह की रियायत दी जाए यह बात हमारी समझ से परे है। क्यों दुनिया के तमाम लोगों को ऐसी सुरक्षा जांच के मामले में एक बराबर नहीं रखा जाता जहां पर और लोगों की जिंदगियां भी जुड़ी हुई हैं। यह समझने की जरूरत है कि किसी सार्वजनिक विमान पर या किसी सार्वजनिक जगह पर किसी एक व्यक्ति को महत्वपूर्ण मानकर उसे जांच से छूट देने का मतलब वहां मौजूद बाकी तमाम लोगों के हिफाजत के हक को छीन लेने जैसा भी है। जिस विमान में दूसरे लोग भी सफर कर रहे हों, या जो जनता के पैसों से खरीदा गया विमान हो, उन पर किसी को भी जांच से रियायत क्यों मिलनी चाहिए? कई बार ऐसा भी हो सकता है कि ऐसे रियायती खास लोगों की जानकारी के बिना भी उनके कपड़ों में या सामान में कोई दूसरे लोग साजिश के तहत कोई खतरनाक सामान डाल दें।
और भारत का इतिहास तो कुछ और बातों का गवाह भी है। दो-दो साजिशों के तहत अपने दो-दो प्रधानमंत्रियों और पार्टी अध्यक्षों को खोने वाली कांगे्रस पार्टी ने एक विमान अपहरणकर्ता को अपनी पार्टी का टिकट देकर सांसद या विधायक बनवाया था क्योंकि उसने शायद इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के खिलाफ यह विमान अपहरण किया था। ऐसे में दूसरे लोग सुरक्षा जांच से बचने के बाद ऐसी महानता का दर्जा पाने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते?
सुरक्षा जांच से छूट की मांग हमारे हिसाब से एक झूठा अहंकार है और एक महत्वोन्मादी तबके के लिए बनाई गई चापलूस व्यवस्था है। गैरबराबरी का यह इंतजाम पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए। जिस व्यक्ति की सुरक्षा जांच होती है, उसके खुद के भले के लिए वह एक जरूरी इंतजाम होता है। आज किसी के कपड़ों या जूतों में कोई सामान भरकर कोई तस्करी करे और दूसरे देश जाकर फिल्मी अंदाज में उनके सामानों से वह प्रतिबंधित सामान निकाल ले, तो इसकी क्या रोक-टोक जांच में छूट के साथ-साथ मुमकिन है? फिर हमने भारत के विमानतलों पर और दूसरी जगहों पर महत्वपूर्ण समझे जाने वाले ऐसे तबके के लिए आम लोगों की नजरों में नफरत को बार-बार देखा है। किसी और को जांच से छूट देकर दूसरों की जान को खतरे में डालना, उन दूसरों को कैसे अच्छा लग सकता है? यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए और जो डॉ. कलाम अपनी सादगी के लिए अपने पूरे कार्यकाल में जाने जाते थे, उन्हें खुद होकर यह जिद करनी चाहिए कि वे भी आम इंसानों की तरह हर सुरक्षा जांच से होकर गुजरेंगे। अपनी जिंदगी में पाखंड से कोसों दूर रहने वाले डॉ. कलाम अगर यह काम नहीं करेंगे तो फिर ऊंची कुर्सियों पर बैठने वाले बहुत छोटे व्यक्तित्व के अहंकारी लोग कहां से सामाजिक प्रतिष्ठा के बाहुबल के ऐसे प्रदर्शन का लालच छोड़ पाएंगे? हमने राजनीति और भारत में खास दर्जा प्राप्त दूसरी जगहों पर इक्का-दुक्का ही लोग ऐसे देखे हैं जो साधारण इंसानों की तरह रहना पसंद करते हैं और बिना लाल-पीली बत्ती के, बिना सायरन और शक्ति प्रदर्शन के जीते हैं और चलते हैं। गांधी अगर चाहते तो अंगे्रज हुकूमत उन्हें लालबत्ती और सायरन लगी हुई गाडिय़ों का पूरा काफिला ही दे देती। लेकिन उसके बाद उनके महान या महात्मा बनने की गुंजाइश खत्म हो जाती। डॉ. कलाम ने इस बात को मुद्दा ही क्यों बनने दिया है यह हमारी समझ से परे है।

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