पहले सौ करोड़ जमा करो फिर...

16 नवंबर 2011
संपादकीय

हिंदुस्तान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के और इंटरनेट के विस्फोटक विस्तार के बाद प्रिंट मीडिया को भी अपने जिंदा रहने के लिए तरह-तरह की मशक्कत करने की नौबत आ खड़ी हुई है। पिछले दिनों नए आईटी कानून के तहत छत्तीसगढ़ सहित बाकी जगहों पर भी नए किस्म से मुकदमे दर्ज होने लगे हैं। लेकिन आज यहाँ पर चर्चा के लायक एक खबर है जो की मीडिया के बहुत से लोगों का दिल दहला सकती है, और मीडिया के मारे लोगों का हौसला बढ़ा सकती है।
अंग्रेजी के एक बड़े समाचार चैनल टाईम्स नाऊ में कुछ अरसा पहले करोड़ों के प्रोविडेंट फंड घोटाले की एक रिपोर्ट प्रसारित हुई थी। इसमें आरोपी की जगह उसी से मिलते-जुलते नाम वाले एक दूसरे आदमी की फोटो 15 सेकंड तक समाचार बुलेटिन के परदे पर आई। यह तस्वीर थी सुप्रीम कोर्ट में जज रहे पी.बी. सावंत की। नाराज सावंत ने इस चैनल पर मानहानि का मुकदमा कर दिया। पुणे की अदालत ने इस मामले में टाईम्स नाऊ के खिलाफ 100 करोड़ के हर्जाने का आदेश दे दिया। इसके खिलाफ जब यह समाचार चैनल मुंबई हाईकोर्ट गया तो हाईकोर्ट ने सुनवाई करने के पहले ही इस चैनल को नगद और बैंक गारंटी की शक्ल में 100 करोड़ जमा करने का हुक्म दिया। इसके खिलाफ जब चैनल सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां भी हाईकोर्ट का आदेश कायम रहा कि चैनल अपील के पहले इतनी रकम और गारंटी जमा करे। यह ठीक है कि मामला सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके एक व्यक्ति का था और यह चैनल देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाईम्स ऑफ इंडिया का है, इसलिए जुर्माना या हर्जाना उसी पैमाने का रहा, लेकिन यह समझ लेने की जरूरत है कि बिना किसी इरादे के ऐसा अपमान हो जाने के बाद कानून का रूख कैसा हो सकता है। 15 सेकंड गलत तस्वीर दिखाने के बाद इस चैनल ने 5 दिन तक माफी प्रसारित की और अपनी गलती के लिए सावंत से भी माफी माँगी।
आज सुबह जब दिल्ली के टाईम्स ऑफ इंडिया में यह पूरी खबर छपी है, तो इसी अखबार के पहले पन्ने पर फिर एक गलत तस्वीर के लिए माफी छपी है, एक ही नाम वाले दो लोगों की तस्वीर में गलतफहमी से गलत की तस्वीर छप गई। उससे मीडिया के तकरीबन पूरे हिस्से को सबक लेने की जरूरत है। ऐसी गलती कौन नहीं कर बैठता? पल-पल के चैनल की बात बात छोड़ ही दें, दिन में एक बार छपने वाले अखबार भी ऐसी गलती कर बैठते हैं। लेकिन इस किस्म का जुर्माना भला कौन दे सकता है? और हम तो मीडिया के उस हिस्से की सोच रहे हैं जो रात दिन लोगों के खिलाफ दुर्भावना से सच और झूठ छापते रहता है, टीवी पर दिखाते रहता है। उसके खिलाफ अगर लोग हौसला करके और जहमत उठाकर अदालत जाने लगें तो क्या होगा? और जिसके खिलाफ पूरी दुर्भावना से अभियान छेड़ा जाता है, वह अदालत क्यों ना जाए?
हमारा ख्याल है कि जस्टिस सावंत के मामले में अदालत का फैसला बहुत ही कड़ा है और शायद आगे की अदालत में यह ना टिके और खारिज हो जाए बहुत मामूली मुआवजे के साथ। लेकिन आज अगर ऊपर सी अदालत में सुनवाई के भी पहले इस चैनल को 100 करोड़ का इंतजाम करना है, तो यह तो भयानक बात है ही। इस मामले का चाहे जो भी हो, हम बाकी मीडिया के बारे में सोच रहे हैं, कि उसे कितना सावधान रहने की जरूरत है, दूसरी तरफ मीडिया के शिकार लोगों को इससे एक रास्ता भी मिलता है कि वे भी जस्टिस सावंत की राह पर जा सकते हैं। अगर मीडिया के बाकी मारों को भी इसी पैमाने से राहत मिलने लगे तो मीडिया का दीवाला 2-4 मामलों में ही निकल जाएगा। और अगर ऐसे कुछ मामलों से बाकी मीडिया की साजिशें खत्म  हो जाती हैं, तो उसमें क्या बुराई है? याद रखें कि जस्टिस सावंत के साथ तो एक चूक के चलते उनकी फोटो किसी और के जुर्म के समाचार के साथ निहायत ही गलती से कुछ सेकंड के लिए परदे पर चली गई थी। अब जो लोग सोच समझकर किसी के खिलाफ झूठ छापते हैं, उनके बारे में भी अदालतें ऐसी ही कड़क हो जाएं, तो चार मामलों के बाद ही मीडिया की बदनीयत ख़त्म हो जाएगी। और हम इसे बहुत बुरा भी नहीं कहेंगे।

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