29 नवंबर 2011
संपादकीय
संसद के भीतर खुलकर चर्चा ही लोकतंत्र है, बहिष्कार नहीं
भारत की संसद थमी हुई है। भाजपा से लेकर वामपंथी दलों तक बहुत से लोग, और शायद लोकसभा में आधे से अधिक सदस्य, सरकार के एक निहायत बेमौसमी और गैरजरूरी फैसले के चलते काम को रोककर बैठ गए हैं। हो सकता है ये सारे के सारे किसी अविश्वास प्रस्ताव की नौबत आने पर सरकार या एफडीआई के खिलाफ वोट न डालें, लेकिन आज उनकी एकजुटता इतनी तो है ही कि उन्होंने संसद को चलने से रोक दिया। इस बार संसद भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी और कंपनियों को इजाजत देने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ है। खब्रिस्तान की कुछ ताजा कब्रों के नीचे यह भी दिख रहा है कि 2004 में भाजपा खुदरा व्यापार में विदेशी आगमन के पक्ष में थी, 2009 में वह खिलाफ हुई।
केंद्र सरकार ने जब यह विवादभरा फैसला लिया तो उसे भी इस विरोध का अंदाज रहा होगा। हम नहीं जानते कि लोकपाल, भ्रष्टाचार, कालेधन, विदेशी खाते और पेट्रोल महंगाई जैसे कितने मुद्दे सरकार को संसद के इस सत्र में घेर सकते थे और सत्र न चलना विपक्ष का नुकसान अधिक है या सरकार का अधिक। लेकिन यह अंदाज लगे बिना भी हम एक बात कह सकते हैं कि ये भारतीय लोकतंत्र और भारतीय लोगों का नुकसान तो है ही। देश में आज सौ ऐसे मुद्दों की फसल खड़ी हुई है जिस पर संसद में लंबी चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन आज संसद का इस्तेमाल संसदीय चर्चा के बजाय केंद्र सरकार के किसी फैसले को लेकर, महंगाई को लेकर कार्रवाई का बहिष्कार करने में किया जा रहा है। किसी शादी की दावत का इस्तेमाल लोग खुशियां मनाने के बजाय गोलियां चलाकर अपने पुराने झगड़े निपटाने में करें, किसी अंतिम संस्कार के मौके का इस्तेमाल लोग वैराग्य भाव के बजाय जमीनों के सौदे करने में कर लें तो वह अटपटा लगेगा। इसी तरह केंद्र सरकार का कोई सरकारी फैसला इस देश से संसदीय चर्चा को रोक ही दे, तो फिर वह फैसला संसद से भी अधिक ताकतवर हो गया। कभी एक मुद्दे को लेकर तो कभी दूसरे मुद्दे को लेकर अगर संसद में विपक्ष यह तय कर ले कि वह फला मांग पूरी होने के पहले संसद चलने ही नहीं देगा तो विपक्ष संसद के अपने विशेषाधिकारों को पुतला बनाकर जलाकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है। हम संसद की चर्चा का भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी विकल्प नहीं देखते। फिर एक दूसरी बात हमारी समझ से परे यह भी है कि अगर कार्यपालिका के रूप में कोई फैसला लेना सरकार का अधिकार है और विपक्ष ऐसे किसी फैसले से असहमत है, तो उसके सामने संसद में इस पर चर्चा ही अकेला रास्ता है। भारतीय लोकतंत्र की संसदीय व्यवस्था ने सरकार, संसद और अदालत, इन तीनों के अलग-अलग अधिकार तय किए हुए हैं। एक सरकार ने अगर एफडीआई का फैसला लिया है तो संसद के भीतर इस फैसले के मुद्दे पर विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार को उखाड़ फेंके, वह तो लोकतांत्रिक और संसदीय रहेगा। लेकिन संसद को न चलने देना हमें किसी भी हालत में नामंजूर ही रहेगा।
ये बात हम देश की लोकसभा और राज्यसभा को लेकर अधिक फिक्र के साथ इसलिए कर रहे हैं कि भारत के राज्यों की विधानसभाएं मिसालों के लिए संसद की तरफ ही देखती हैं। आज संसद में जो हो रहा है कल राज्यों की विधानसभाओं में उसी अंदाज से हो सकता है या फिर संसद का हिसाब चुकता करने के लिए केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के लोग केंद्र की विपक्षी पार्टियों की सत्ता वाले राज्यों में ऐसा ही कर सकते हैं। दिल्ली के इस तौर-तरीके को अगर हम सही मानते हैं, और इसी की देखा-देखी छत्तीसगढ़ सरकार के किसी फैसले के खिलाफ यहां की विपक्षी कांगे्रस पार्टी इसी तरह विधानसभा नहीं चलने देगी, तो छत्तीसगढ़ की जनता के मुद्दे आखिर कहां चर्चा में आएंगे? देश हो या प्रदेश, बहिष्कार को बहस का विकल्प हम कभी नहीं मान सकते और नारे लगाते सांसदों की भीड़ चाहे संसद के भीतर हो, चाहे राष्ट्रपति भवन की राह पर हो, वह चर्चा और बहस करते सांसदों के मुकाबले कमजोर ही रहेगी। दिल्ली में आज जो चल रहा है उसे देखकर कुछ बातें लगती हैं। वामपंथी सभी जगह सत्ता खोकर अब लंबे विपक्षी भविष्य के लिए तैयार बैठे हैं। दूसरी तरफ भाजपा के भीतर अगले प्रधानमंत्री-प्रत्याशी बनने की हसरत लिए हुए लोगों को अलग-अलग मोर्चों पर अपना अस्तित्व साबित करने की हड़बड़ी है। बुजुर्ग अडवानी रथयात्रा कर दिल्ली मेराथन में आज की तारीख में भाजपा के भीतर सबसे फिट एथलीट बने खड़े हैं। इस रथयात्रा रणनीति में भाजपा के भीतर चूंकि उनका एकाधिकार है और पेटेंट उन्हीं के नाम है, इसलिए सुषमा स्वराज के सामने अब सिर्फ लोकसभा के भीतर शक्तिप्रदर्शन बचता है, और वे अपने इस सीमित मौके का पूरा इस्तेमाल कर रही हैं। फिर यह बात भी है कि भाजपा का परंपरागत समर्थक-तबका जो व्यापारी रहे हैं, उनमें खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को लेकर बहुत दहशत है। दूसरी तरफ कांगे्रस पार्टी को रोजाना एक बार कोई आत्मघाती खुराक लेने का पर्चा उसके किसी फैमिली डॉक्टर ने लिखकर दिया हुआ है, सो उसने आज की झंझट के बीच एफडीआई को और खड़ा कर दिया।
इस चर्चा का आज यहां पर हम कोई अंत नहीं कर रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि कल हमने इसी जगह खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के मुद्दे पर उसके नफे और नुकसान के अपने तर्क खत्म न करके उस पर चर्चा शुरू ही की है। जब भारत में उग्रवादियों और आतंकवादियों से बातचीत होती है, जब पड़ोस के हमलावर देश से बातचीत होती है, तो संसद में पक्ष और विपक्ष बातचीत के समय पर बातचीत क्यों नहीं करते? देश की जनता ने न तो इन बहिष्कारी सांसदों को इस बहिष्कार के लिए चुना था और न ही इन पर होने वाले अंधाधुंध महंगे खर्च का कोई न्यायसंगत आधार बनता अगर इन लोगों को काम ही नहीं करना था। संसद को हम न आज, न कभी और, बहिष्कार की जगह मान सकते। हम विरोध के लिए अधिक काम करने के हिमायती हैं, और भारतीय संसद के विपक्ष को तो आज चाहिए कि वह देर-देर रात तक बहस को खींचे और सरकार के गलत कामों को वहीं उजागर करे। नारों और बैनरों पर लिखी बातें पर जनता अधिक भरोसा नहीं करती है और संसद के भीतर खुलकर चर्चा ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र लोगों को हड़ताल, धरने और जुलूस का हक तो देता है, लेकिन हमारा यह भी मानना है कि संसद के लोगों को देश के हड़ताल, धरने और जुलूस पर चर्चा करने की जिम्मेदारी लोकतंत्र ने दी है, न कि खुद हड़ताल करने की।
संपादकीय
संसद के भीतर खुलकर चर्चा ही लोकतंत्र है, बहिष्कार नहीं
भारत की संसद थमी हुई है। भाजपा से लेकर वामपंथी दलों तक बहुत से लोग, और शायद लोकसभा में आधे से अधिक सदस्य, सरकार के एक निहायत बेमौसमी और गैरजरूरी फैसले के चलते काम को रोककर बैठ गए हैं। हो सकता है ये सारे के सारे किसी अविश्वास प्रस्ताव की नौबत आने पर सरकार या एफडीआई के खिलाफ वोट न डालें, लेकिन आज उनकी एकजुटता इतनी तो है ही कि उन्होंने संसद को चलने से रोक दिया। इस बार संसद भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी और कंपनियों को इजाजत देने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ है। खब्रिस्तान की कुछ ताजा कब्रों के नीचे यह भी दिख रहा है कि 2004 में भाजपा खुदरा व्यापार में विदेशी आगमन के पक्ष में थी, 2009 में वह खिलाफ हुई।
केंद्र सरकार ने जब यह विवादभरा फैसला लिया तो उसे भी इस विरोध का अंदाज रहा होगा। हम नहीं जानते कि लोकपाल, भ्रष्टाचार, कालेधन, विदेशी खाते और पेट्रोल महंगाई जैसे कितने मुद्दे सरकार को संसद के इस सत्र में घेर सकते थे और सत्र न चलना विपक्ष का नुकसान अधिक है या सरकार का अधिक। लेकिन यह अंदाज लगे बिना भी हम एक बात कह सकते हैं कि ये भारतीय लोकतंत्र और भारतीय लोगों का नुकसान तो है ही। देश में आज सौ ऐसे मुद्दों की फसल खड़ी हुई है जिस पर संसद में लंबी चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन आज संसद का इस्तेमाल संसदीय चर्चा के बजाय केंद्र सरकार के किसी फैसले को लेकर, महंगाई को लेकर कार्रवाई का बहिष्कार करने में किया जा रहा है। किसी शादी की दावत का इस्तेमाल लोग खुशियां मनाने के बजाय गोलियां चलाकर अपने पुराने झगड़े निपटाने में करें, किसी अंतिम संस्कार के मौके का इस्तेमाल लोग वैराग्य भाव के बजाय जमीनों के सौदे करने में कर लें तो वह अटपटा लगेगा। इसी तरह केंद्र सरकार का कोई सरकारी फैसला इस देश से संसदीय चर्चा को रोक ही दे, तो फिर वह फैसला संसद से भी अधिक ताकतवर हो गया। कभी एक मुद्दे को लेकर तो कभी दूसरे मुद्दे को लेकर अगर संसद में विपक्ष यह तय कर ले कि वह फला मांग पूरी होने के पहले संसद चलने ही नहीं देगा तो विपक्ष संसद के अपने विशेषाधिकारों को पुतला बनाकर जलाकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है। हम संसद की चर्चा का भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी विकल्प नहीं देखते। फिर एक दूसरी बात हमारी समझ से परे यह भी है कि अगर कार्यपालिका के रूप में कोई फैसला लेना सरकार का अधिकार है और विपक्ष ऐसे किसी फैसले से असहमत है, तो उसके सामने संसद में इस पर चर्चा ही अकेला रास्ता है। भारतीय लोकतंत्र की संसदीय व्यवस्था ने सरकार, संसद और अदालत, इन तीनों के अलग-अलग अधिकार तय किए हुए हैं। एक सरकार ने अगर एफडीआई का फैसला लिया है तो संसद के भीतर इस फैसले के मुद्दे पर विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार को उखाड़ फेंके, वह तो लोकतांत्रिक और संसदीय रहेगा। लेकिन संसद को न चलने देना हमें किसी भी हालत में नामंजूर ही रहेगा।
ये बात हम देश की लोकसभा और राज्यसभा को लेकर अधिक फिक्र के साथ इसलिए कर रहे हैं कि भारत के राज्यों की विधानसभाएं मिसालों के लिए संसद की तरफ ही देखती हैं। आज संसद में जो हो रहा है कल राज्यों की विधानसभाओं में उसी अंदाज से हो सकता है या फिर संसद का हिसाब चुकता करने के लिए केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के लोग केंद्र की विपक्षी पार्टियों की सत्ता वाले राज्यों में ऐसा ही कर सकते हैं। दिल्ली के इस तौर-तरीके को अगर हम सही मानते हैं, और इसी की देखा-देखी छत्तीसगढ़ सरकार के किसी फैसले के खिलाफ यहां की विपक्षी कांगे्रस पार्टी इसी तरह विधानसभा नहीं चलने देगी, तो छत्तीसगढ़ की जनता के मुद्दे आखिर कहां चर्चा में आएंगे? देश हो या प्रदेश, बहिष्कार को बहस का विकल्प हम कभी नहीं मान सकते और नारे लगाते सांसदों की भीड़ चाहे संसद के भीतर हो, चाहे राष्ट्रपति भवन की राह पर हो, वह चर्चा और बहस करते सांसदों के मुकाबले कमजोर ही रहेगी। दिल्ली में आज जो चल रहा है उसे देखकर कुछ बातें लगती हैं। वामपंथी सभी जगह सत्ता खोकर अब लंबे विपक्षी भविष्य के लिए तैयार बैठे हैं। दूसरी तरफ भाजपा के भीतर अगले प्रधानमंत्री-प्रत्याशी बनने की हसरत लिए हुए लोगों को अलग-अलग मोर्चों पर अपना अस्तित्व साबित करने की हड़बड़ी है। बुजुर्ग अडवानी रथयात्रा कर दिल्ली मेराथन में आज की तारीख में भाजपा के भीतर सबसे फिट एथलीट बने खड़े हैं। इस रथयात्रा रणनीति में भाजपा के भीतर चूंकि उनका एकाधिकार है और पेटेंट उन्हीं के नाम है, इसलिए सुषमा स्वराज के सामने अब सिर्फ लोकसभा के भीतर शक्तिप्रदर्शन बचता है, और वे अपने इस सीमित मौके का पूरा इस्तेमाल कर रही हैं। फिर यह बात भी है कि भाजपा का परंपरागत समर्थक-तबका जो व्यापारी रहे हैं, उनमें खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को लेकर बहुत दहशत है। दूसरी तरफ कांगे्रस पार्टी को रोजाना एक बार कोई आत्मघाती खुराक लेने का पर्चा उसके किसी फैमिली डॉक्टर ने लिखकर दिया हुआ है, सो उसने आज की झंझट के बीच एफडीआई को और खड़ा कर दिया।
इस चर्चा का आज यहां पर हम कोई अंत नहीं कर रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि कल हमने इसी जगह खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के मुद्दे पर उसके नफे और नुकसान के अपने तर्क खत्म न करके उस पर चर्चा शुरू ही की है। जब भारत में उग्रवादियों और आतंकवादियों से बातचीत होती है, जब पड़ोस के हमलावर देश से बातचीत होती है, तो संसद में पक्ष और विपक्ष बातचीत के समय पर बातचीत क्यों नहीं करते? देश की जनता ने न तो इन बहिष्कारी सांसदों को इस बहिष्कार के लिए चुना था और न ही इन पर होने वाले अंधाधुंध महंगे खर्च का कोई न्यायसंगत आधार बनता अगर इन लोगों को काम ही नहीं करना था। संसद को हम न आज, न कभी और, बहिष्कार की जगह मान सकते। हम विरोध के लिए अधिक काम करने के हिमायती हैं, और भारतीय संसद के विपक्ष को तो आज चाहिए कि वह देर-देर रात तक बहस को खींचे और सरकार के गलत कामों को वहीं उजागर करे। नारों और बैनरों पर लिखी बातें पर जनता अधिक भरोसा नहीं करती है और संसद के भीतर खुलकर चर्चा ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र लोगों को हड़ताल, धरने और जुलूस का हक तो देता है, लेकिन हमारा यह भी मानना है कि संसद के लोगों को देश के हड़ताल, धरने और जुलूस पर चर्चा करने की जिम्मेदारी लोकतंत्र ने दी है, न कि खुद हड़ताल करने की।
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