11 नवंबर 11
संपादकीय
सट्टेबाजों का तो काम ही होता है लोगों से दांव लगवाने का, लेकिन उनसे परे जो लोग महूरतों और नंबरों पर टिके भविष्य पर भरोसा रखते हैं उनके लिए भी आज का यह दिन कई दिनों से खबरों में बना हुआ था। हर बरस कुछ तारीखें अंगे्रजी कलेंडर की और कुछ तारीखें हिन्दी कलेंडर की ऐसी आ जाती हैं जिनको लेकर बहुत सी खबरें बनती हैं कि ऐसा मौका कितने बरसों के बाद आ रहा है या कितनी सदियों के बाद दुबारा आएगा। बाजार ऐसे मौकों पर अपने हिसाब से इन तारीखों को भुनाने की कोशिश करता है और कुछ सिरफिरे लोग ऐसे मौके पर ऑपरेशन से उन बच्चों को पैदा करवाने की कोशिश करते हैं जो कि एक-दो दिन आगे-पीछे पैदा होने वाले हों। लेकिन नंबर या महूरत ही ऐसा असर रखते होते तो किसी खास महूरत पर पैदा होने वाले लोगों में दुनिया के सबसे भयानक अपराधी और दुनिया के सबसे महान लोग, दोनों ही क्यों होते?
इस मुद्दे पर आज लिखने की वजह यह भी है कि गुजरात के जिस सरदारपुरा में बड़ी संख्या में मुसलमानों को जला देने के जुर्म में ढाई दर्जन से अधिक जिन हिंदुओं को उम्रकैद की सजा मिली है, उनके नाम अगर देखें तो बहुत सारे नाम बहुत प्रभावित करने वाले हैं। रमेश, चतुर, जयंती, अमृत, मंगल, सुरेश, तुलसी, रमन, राकेश, विष्णु, राजेंद्र, प्रहलाद, पुरूषोत्तम, अश्विन, अंबालाल, जैसे लोग हत्यारे साबित हुए हैं। देवी-देवताओं के नाम पर रखे गए इन नामों का कोई असर अगर होता तो ये लोग ऐसे हत्यारे क्यों होते? और यह बात महज हिंदू हत्यारों की हो, ऐसा भी नहीं है। इसी गुजरात के गोधरा में जिन लोगों को अयोध्या से लौटते हिंदू कार सेवकों के रेल डिब्बे को जलाकर बड़ी संख्या में लोगों को मार डालने के लिए उम्रकैद मिली थी उसमें भी बहुत से नाम ऐसे रहे होंगे जो कि इस्लाम के मजहब से जुड़े हुए और ईश्वर के नाम पर रखे गए नाम रहे होंगे।
नाम और तारीखों में क्या रखा है? भारत और पाकिस्तान एक ही वक्त आजाद हुए और इन दोनों का आधी-पौन सदी के बाद का हाल कितना अलग-अलग है? इसलिए लोगों को इस तरह के टोटकों में पड़े बिना, अपने-आप पर, अपने सिद्धांतों पर, अपनी रीति-नीति पर भरोसा होना चाहिए और किसी भी किस्म की भविष्यवाणी से परे कुदरत पर भरोसा करना चाहिए कि अगर मीठे फल का बीज बोया जाएगा तो आगे-पीछे मीठे फल ही मिलेंगे और कांटों के बीज बोए जाएंगे तो कांटे ही मिलेंगे। हम कुदरत की बनाई इन दो चीजों के बीच अच्छे और बुरे के फर्क के आधार पर इनकी यहां चर्चा नहीं कर रहे हैं क्योंकि इन दोनों का दुनिया में अलग-अलग इस्तेमाल हो सकता है, हम महज दो अलग-अलग चीजों के लिए ये मिसालें यहां दे रहे हैं। भविष्यवाणी और अंधविश्वास के खिलाफ यहां लिखना जरूरी इसलिए है क्योंकि बहुत से लोग अपनी जिंदगी को ऐसे अंधविश्वासों के आधार पर ढाल लेते हैं कि इनसे परे वे अपनी खुद की ताकत, काबिलीयत और मेहनत पर भी भरोसा छोड़ देते हैं। इस किस्म के अंधविश्वास लोगों की सोच से वैज्ञानिक तर्क और तथ्य उठाकर फेंक देते हैं और लोग या तो हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं कि किस्मत में जो कुछ होगा वह मिलेगा ही, अभी जब सितारे गर्दिश में हैं तो फिर कोई भी कोशिश क्यों की जाए? या फिर वे लगातार गलत काम किए चले जाते हैं कि अभी तो दिन अच्छे चल रहे हैं, सितारे बुलंद हैं और कोई क्या बिगाड़ लेगा? कई बार लोगों के मुंह से यह भी सुनने मिलता है कि वक्त के पहले और किस्मत से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता।
ऐसी तमाम फिजूल की बातें सिर्फ कूड़ेदान के लायक हैं। यही वजह है कि इस अखबार में हमने बहुत से भविष्यवक्ताओं के अनुरोध के बाद भी कभी भविष्यफल छापना शुरू नहीं किया। इस पूरे सिलसिले को हम एक फ्रॉड मानते हैं और पत्र-पत्रिकाओं के जानकार लोग यह जानते भी हैं कि अंधविश्वासी लोगों के बीच लोकप्रियता पाने के लिए किस तरह पाखंडी लोग भविष्यवाणियों का ऐसा धंधा करते हैं। हम लोगों को यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि कुछ महीने पहले हिंदी के एक टीवी समाचार चैनल ने किस तरह भविष्यवाणी वाले टीवी पाखंडियों का स्टिंग ऑपरेशन करके पूरी रिपोर्ट प्रसारित की थी कि वे किस तरह ठगने का काम करते हैं। सरदारपुरा में सजा पाने वाले हत्यारों के नाम भगवान के नाम पर जैसे हैं उसे लेकर आज हमें यह लिखने का मौका मिला है और लोगों को हमारी नसीहत है कि नाम के बजाय काम पर ध्यान दें और किसी भी किस्म के अवैज्ञानिक टोटकों पर भरोसा न करें।
संपादकीय
सट्टेबाजों का तो काम ही होता है लोगों से दांव लगवाने का, लेकिन उनसे परे जो लोग महूरतों और नंबरों पर टिके भविष्य पर भरोसा रखते हैं उनके लिए भी आज का यह दिन कई दिनों से खबरों में बना हुआ था। हर बरस कुछ तारीखें अंगे्रजी कलेंडर की और कुछ तारीखें हिन्दी कलेंडर की ऐसी आ जाती हैं जिनको लेकर बहुत सी खबरें बनती हैं कि ऐसा मौका कितने बरसों के बाद आ रहा है या कितनी सदियों के बाद दुबारा आएगा। बाजार ऐसे मौकों पर अपने हिसाब से इन तारीखों को भुनाने की कोशिश करता है और कुछ सिरफिरे लोग ऐसे मौके पर ऑपरेशन से उन बच्चों को पैदा करवाने की कोशिश करते हैं जो कि एक-दो दिन आगे-पीछे पैदा होने वाले हों। लेकिन नंबर या महूरत ही ऐसा असर रखते होते तो किसी खास महूरत पर पैदा होने वाले लोगों में दुनिया के सबसे भयानक अपराधी और दुनिया के सबसे महान लोग, दोनों ही क्यों होते?
इस मुद्दे पर आज लिखने की वजह यह भी है कि गुजरात के जिस सरदारपुरा में बड़ी संख्या में मुसलमानों को जला देने के जुर्म में ढाई दर्जन से अधिक जिन हिंदुओं को उम्रकैद की सजा मिली है, उनके नाम अगर देखें तो बहुत सारे नाम बहुत प्रभावित करने वाले हैं। रमेश, चतुर, जयंती, अमृत, मंगल, सुरेश, तुलसी, रमन, राकेश, विष्णु, राजेंद्र, प्रहलाद, पुरूषोत्तम, अश्विन, अंबालाल, जैसे लोग हत्यारे साबित हुए हैं। देवी-देवताओं के नाम पर रखे गए इन नामों का कोई असर अगर होता तो ये लोग ऐसे हत्यारे क्यों होते? और यह बात महज हिंदू हत्यारों की हो, ऐसा भी नहीं है। इसी गुजरात के गोधरा में जिन लोगों को अयोध्या से लौटते हिंदू कार सेवकों के रेल डिब्बे को जलाकर बड़ी संख्या में लोगों को मार डालने के लिए उम्रकैद मिली थी उसमें भी बहुत से नाम ऐसे रहे होंगे जो कि इस्लाम के मजहब से जुड़े हुए और ईश्वर के नाम पर रखे गए नाम रहे होंगे।
नाम और तारीखों में क्या रखा है? भारत और पाकिस्तान एक ही वक्त आजाद हुए और इन दोनों का आधी-पौन सदी के बाद का हाल कितना अलग-अलग है? इसलिए लोगों को इस तरह के टोटकों में पड़े बिना, अपने-आप पर, अपने सिद्धांतों पर, अपनी रीति-नीति पर भरोसा होना चाहिए और किसी भी किस्म की भविष्यवाणी से परे कुदरत पर भरोसा करना चाहिए कि अगर मीठे फल का बीज बोया जाएगा तो आगे-पीछे मीठे फल ही मिलेंगे और कांटों के बीज बोए जाएंगे तो कांटे ही मिलेंगे। हम कुदरत की बनाई इन दो चीजों के बीच अच्छे और बुरे के फर्क के आधार पर इनकी यहां चर्चा नहीं कर रहे हैं क्योंकि इन दोनों का दुनिया में अलग-अलग इस्तेमाल हो सकता है, हम महज दो अलग-अलग चीजों के लिए ये मिसालें यहां दे रहे हैं। भविष्यवाणी और अंधविश्वास के खिलाफ यहां लिखना जरूरी इसलिए है क्योंकि बहुत से लोग अपनी जिंदगी को ऐसे अंधविश्वासों के आधार पर ढाल लेते हैं कि इनसे परे वे अपनी खुद की ताकत, काबिलीयत और मेहनत पर भी भरोसा छोड़ देते हैं। इस किस्म के अंधविश्वास लोगों की सोच से वैज्ञानिक तर्क और तथ्य उठाकर फेंक देते हैं और लोग या तो हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं कि किस्मत में जो कुछ होगा वह मिलेगा ही, अभी जब सितारे गर्दिश में हैं तो फिर कोई भी कोशिश क्यों की जाए? या फिर वे लगातार गलत काम किए चले जाते हैं कि अभी तो दिन अच्छे चल रहे हैं, सितारे बुलंद हैं और कोई क्या बिगाड़ लेगा? कई बार लोगों के मुंह से यह भी सुनने मिलता है कि वक्त के पहले और किस्मत से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता।
ऐसी तमाम फिजूल की बातें सिर्फ कूड़ेदान के लायक हैं। यही वजह है कि इस अखबार में हमने बहुत से भविष्यवक्ताओं के अनुरोध के बाद भी कभी भविष्यफल छापना शुरू नहीं किया। इस पूरे सिलसिले को हम एक फ्रॉड मानते हैं और पत्र-पत्रिकाओं के जानकार लोग यह जानते भी हैं कि अंधविश्वासी लोगों के बीच लोकप्रियता पाने के लिए किस तरह पाखंडी लोग भविष्यवाणियों का ऐसा धंधा करते हैं। हम लोगों को यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि कुछ महीने पहले हिंदी के एक टीवी समाचार चैनल ने किस तरह भविष्यवाणी वाले टीवी पाखंडियों का स्टिंग ऑपरेशन करके पूरी रिपोर्ट प्रसारित की थी कि वे किस तरह ठगने का काम करते हैं। सरदारपुरा में सजा पाने वाले हत्यारों के नाम भगवान के नाम पर जैसे हैं उसे लेकर आज हमें यह लिखने का मौका मिला है और लोगों को हमारी नसीहत है कि नाम के बजाय काम पर ध्यान दें और किसी भी किस्म के अवैज्ञानिक टोटकों पर भरोसा न करें।
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