जुर्म के शक के बीच भी निजी जीवन का हक

12 नवंबर 11
 संपादकीय
राजस्थान में एक नर्स के लापता होने के बाद वहां के एक बड़े मंत्री और कुछ दूसरे नेताओं के नाम उसके साथ जुड़े हुए सामने आ रहे हैं और मीडिया को एक दिलचस्प खबर हर कुछ घंटों में मिल जा रही है। राजस्थान का यह मंत्री अभी सार्वजनिक जीवन में या मीडिया में अपने-आपको बचाने की हालत में नहीं है क्योंकि उसके इर्दगिर्द शक की धुंध बहुत गहरी है और एक शादीशुदा, मंत्री रहते हुए एक पराई शादीशुदा और बहुत छोटी सरकारी कर्मचारी से निजी संबंधों की चर्चा ने सार्वजनिक जीवन में इस व्यक्ति को बड़ा खराब साबित किया है। लेकिन ऐसे ही मौके होते हैं जब मीडिया और बाकी समाज को यह तय करना होता है कि सच और झूठ के साबित होने के पहले तक किस तरह की चर्चा, किस तरह के आरोप सार्वजनिक जीवन में सही और गलत होते हैं।
पिछले कुछ दिनों से खबरों में घंटे-घंटे यह आ रहा है कि सीबीआई की पूछताछ में इस मंत्री ने क्या-क्या कहा? एक-एक करके तमाम टीवी चैनलों ने यह बताना शुरू किया कि सीबीआई से इस मंत्री ने माना कि इस नर्स से उसके संबंध थे। अभी हम इतनी सी बात का विश्लेषण करें, कि जांच के दायरे में आए हुए एक मर्द के, एक लापता औरत के साथ संबंध थे, तो यह बात हमारी सामान्य समझ से परे है कि ऐसे संबंध किस तरह से अपराध माने जा सकते हैं? एक वयस्क, तेज-तर्रार शादीशुदा महिला के अगर एक वयस्क पुरूष से संबंध हैं, और सीबीआई की पूछताछ में इस आदमी ने यह बात मानी है, तो इस जवाब का प्रचार इस व्यक्ति के निजी जीवन के हक को कुचलने वाला नहीं है? बहुत से लोगों को आज इस पहलू पर चर्चा और इस बात का विश्लेषण अटपटा लगेगा क्योंकि जब चौराहे पर किसी को पत्थर मारे जाते हैं तो आसान बात खुद भी एक पत्थर उठा लेना होता है, न कि पत्थर मारने के सही या गलत होने, मारने वालों को इसका हक होने या न होने पर बहस करना। लेकिन हम यह सोचते हैं कि सीबीआई की पूछताछ के बंद कमरे के भीतर जब सवाल-जवाब जारी ही हैं, तब बाहर इस खबर का चारों तरफ फैल जाना कि मंत्री ने नर्स से संबंध कुबूल कर लिए हैं, क्या यह एक जवाब का बेजा इस्तेमाल नहीं है? क्योंकि पूछताछ में मिले एक जवाब को अदालत में सुबूत की तरह इस्तेमाल करके किसी को सजा दिलाना बरसों का काम हो सकता है, वह भी अगर सीबीआई या कोई दूसरी जांच एजेंसी कामयाब हो जाती है तो। यही सीबीआई दिल्ली के एक चर्चित, और देश भर को बुरी तरह विचलित कर देने वाले आयुषी हत्याकांड में बरसों की जांच के बाद भी अब तक यह साबित नहीं कर पाई है कि वह हत्या उस बच्ची के मां-बाप ने ही की थी, या करवाई थी। इस खबर से बहुत से बच्चों के विचलित हो जाने, और मानसिक चिकित्सा की जरूरत तक पहुंच जाने के मामले जरूर सामने आए हैं। ऐसे में हमारे मन में एक सवाल यह उठता है कि भारत का जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खुद होकर यह तय करता है कि अमिताभ बच्चन के परिवार में होने वाले एक जन्म की खबर से वह अपने-आपको दूर और काबू में रखेगा, न अस्पताल न उनके घर छतरी लगी गाडिय़ां भेजेगा, और भी कई तरह के आत्मनियंत्रण की मुनादी हुई है। ऐसे में यही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और उसके बाद प्रिंट मीडिया भी, कैसे दो वयस्क लोगों के बीच के संबंधों के बारे में हवा में तैरती हुई एक खबर को लपककर उसे एक अपराध की तरह सामने पेश करता है, पूरी तरह यह जानते-बूझते कि ऐसा कोई संबंध अगर सचमुच है, तो भी वह अपराध तो नहीं है।
इन दिनों चूंकि मीडिया के आत्मनियंत्रण, उसके लिए कोई आचार संहिता या उसे किसी संवैधानिक संस्था की निगरानी में लाने के बारे में तरह-तरह की बातें चल रही हैं, इसलिए हम इस मौके पर यह चर्चा छेडऩा चाहते हैं कि क्या सीबीआई के लिए बंद कमरे के बयान को अदालत तक पहुंचने के पहले भी, उससे अपराध का कोई रिश्ता जुडऩे के पहले भी उसे इस तरह से प्रचारित करना, या अगर सीबीआई ने यह लीक नहीं किया है तो मीडिया द्वारा खुद इसे निकालकर, गढ़कर या कुछ और करके इसे इस तरह फैलाने को क्या सही कहा जा सकता है? इससे एक तो दो लोगों, दो परिवारों की साख चौपट होती है, और यह बात तो जाहिर है कि लापता महिला तो कम से कम अपने लापता होने या अपनी हत्या हो जाने की अपराधी तो है नहीं। ऐसे में अपराध बताने वाला जब तक कोई तथ्य न हो तब तक वह पूछताछ के बीच से निकलकर या हवा में पैदा करके लोगों तक पहुंचाना कैसे सही कहा जा सकता है? कल को गर यही साबित होगा कि इस मंत्री के इस नर्स से किसी किस्म के वयस्क संबंध थे, लेकिन इसका उस नर्स के लापता होने (या शायद उसके खत्म हो जाने) से  कोई लेना-देना नहीं था, तो सीबीआई जांच के दौरान मिली हुई इस निजी जानकारी के सार्वजनिक हो जाने को कैसे सही ठहराएगी? कानून की हमारी जितनी सीमित समझ है, उसके मुताबिक जांच के दौरान ऐसी कोई निजी बात अगर जांच एजेंसी को मिलती है और उसका अगर जुर्म से कोई रिश्ता बनता है, तो ही वह बात सार्वजनिक करना कुछ हद तक ठीक माना जा सकता है, वैसे बेहतर तो यही है कि जब ऐसी जानकारी अदालती कार्रवाई का हिस्सा हो जाए, तो ही वह उजागर हो। लेकिन हम जांच की पहली पूछताछ के चलते हुए ही बंद कमरे की खिड़कियों से छनकर बाहर आई ऐसी जानकारी के खिलाफ हैं जिससे कि जुर्म का कोई रिश्ता कायम होना अभी बाकी है। हम किसी आरोपी या अभियुक्त के बारे में भी ऐसी जानकारी के प्रचार के खिलाफ हैं जिसका जांच में कोई दर्जा तय हुआ ही नहीं है, जो अपने-आपमें जुर्म नहीं है, लेकिन फिर भी खुलकर प्रचारित की जा रही है और जिससे परिवारों की इज्जत खराब हो रही है। इस बारे में भी भारत के मीडिया को खुद भी सोचना होगा और जांच एजेंसियां से भी यह सवाल होना चाहिए कि क्या ऐसा सामाजिक दबाव खड़ा करके, ऐसी सार्वजनिक बदनामी करके वे किसी संदिग्ध व्यक्ति पर दबाव बढ़ाने का काम करती हैं? यह सिलसिला आज इसलिए चल रहा है क्योंकि आज कटघरे या शक के घेरे में या तो मीडिया का कोई व्यक्ति नहीं है, या इतना ताकतवर कोई नहीं है कि ऐसी बदनामी के बाद जांच एजेंसी और मीडिया को कटघरे तक खींच सके। लेकिन हम शक के बीच भी लोगों के निजी जीवन के हक, और सही और गलत के बीच फर्क करने की वकालत करते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें