संपादकीय
16 सितंबर 2013
आसाराम के किस्से पहले पन्ने से खिसककर भीतर चले गए हैं, क्योंकि अडवानी की मेहरबानी से नरेन्द्र मोदी और बड़ी खबर बन गए। लेकिन अलग-अलग कई प्रदेशों में, कई पार्टियों के कई मुख्यमंत्रियों की मेहरबानी से आसाराम को आश्रमों के लिए मुफ्त में जमीनें मिलीं, उन पर उसने आश्रम भी बनाए, आसपास की और जमीनों पर कब्जा भी किया, और अवैध निर्माण भी किया। अब जब वे एक पुख्ता मामले में बुरी तरह फंसकर जेल में हैं, तो चारों तरफ से सरकारें भी उनके गलत कामों के खिलाफ कार्रवाई में लगी हुई हैं। जमीन-जायदाद को लेकर अंदाज है कि आसाराम के पास हजारों करोड़ की दौलत है, और इससे अधिक पर उनके अवैध कब्जे हैं।
दरअसल हिन्दुस्तान में धर्म, आध्यात्म, जाति-संगठन, और समाजसेवी संस्थाओं के नाम पर दौलत इक_ा करने, और उसे हड़पने की एक बहुत लंबी परंपरा रही है। जब तक राजाओं का राज था, तब तक वे ही अकेले लुटेरे हुआ करते थे। राज खत्म होने के बाद जब लोकतंत्र आया, तब कानून के प्रति थोड़ी सी जवाबदेही आई, और ट्रस्ट-संस्थाओं को हिसाब-किताब रखने पर मजबूर किया गया। लेकिन यह मजबूरी सिर्फ कागजों पर रही, मंदिरों, वक्फ बोर्डों, और चर्चों के पास की लाखों करोड़ की दौलत लोग लूट खा रहे हैं, और उस पर रोकथाम की सत्ता की कोई नीयत इसलिए नहीं रहती, क्योंकि सत्ता पर काबिज लोग इस लूट में हिस्सेदार भी रहते हैं। मिसाल के लिए अगर हम अपने आसपास के छत्तीसगढ़ को ही देखें, तो चर्च की और ईसाई मिशनों की बड़ी-बड़ी जमीन-जायदाद ताकतवर ईसाई लोग बेच रहे हैं, ताकतवर और दौलतमंद हिन्दू-मुस्लिम खरीद रहे हैं, और सबके ईश्वर बैठे इस लूटमार को चुपचाप देख रहे हैं। यहां तक की बूढ़ी और बेबस, बीमार गायों के लिए लोगों की दी हुई दान की जमीन, योग विद्यालय के लिए दी गई दान की जमीन, अनाथ बच्चों के लिए दी गई अनाथाश्रम की जमीन, इन सब पर छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर लोग काबिज हैं, और इस पूरी दौलत को लूट खा रहे हैं। न कोई कानून इन पर लागू होता, और न ही अदालतों में इनके खिलाफ कभी-कभार हो गए कुछ फैसलों पर कोई कार्रवाई हो पाती है। कुल मिलाकर जो काम आसाराम ने जगह-जगह किया है, वही काम धर्म-आध्यात्म और समाज सेवा के निरासाराम देश भर में कर रहे हैं, हर धर्म में कर रहे हैं।
हमारा मानना है कि ऐसे ताकतवर तबके के किए गए ऐसे जुर्म के लिए बहुत बड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए क्योंकि यह लूटमार लोगों के दान और आस्था की हो रही है, सरकार की संपत्ति की हो रही है। और ऐसे मुजरिम जिंदा रहने के लिए ऐसे जुर्म नहीं करते, सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं। और ऐसी बढ़ी हुई ताकत से उनका बाहुबल इतना बढ़ जाता है कि वे कानून के सिलसिले की बांह मरोड़़कर रख देते हैं। हमारा यह भी मानना है कि ऐसा लूटमार करने वाले लोगों के खिलाफ समाज के बीच से एक आंदोलन उठना चाहिए, और सड़कों पर ऐसे लोगों का विरोध होना चाहिए। अगर कोई अरबपति अनाथ बच्चों के लिए दान में किसी संस्था को मिली जमीन पर अपनी दौलत की फसल उगाता है, काटता है, और इस डकैती के साथ अनाथ बच्चों को, तो कहीं और भूखी गायों को मरने के लिए छोड़ देता है, तो पड़ोस के चीन में ऐसे कामों के लिए मौत की सजा है। हिन्दुस्तान में हम मौत की सजा के तो खिलाफ हैं, लेकिन ऐसी सार्वजनिक संपत्ति लूटने वालों की, उनके परिवार की पूरी निजी संपत्ति नीलाम करके जनता के इस्तेमाल में लाने का कानून बनना चाहिए।

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