संपादकीय
18 सितंबर 2013
छत्तीसगढ़ में केन्द्र सरकार और देश कुछ दूसरे राज्यों की तरह इतने बड़े भ्रष्टाचार नहीं हुए हैं, या अधिक सही यह कहना होगा कि अभी तक नहीं पकड़ाए हैं, कि जिनकी वजह से कोई मुख्यमंत्री या मंत्री हटाया जाए, या जेल जाए। लेकिन यहां के अखबारों को उठाकर देखें तो राष्ट्रीय स्तर के चर्चा के लायक न होने वाले, लेकिन स्थानीय खबर बनने वाले भ्रष्टाचार गिनती में तकरीबन उतने दिखते हैं, जितनी कि सरकारी कुर्सियां दिखती हैं। हैरानी की बात यह है कि राज्य के प्रशासन के अफसरों में आज जो सबसे ताकतवर कुछ अफसर हैं, वे अपनी ईमानदारी और काबिलीयत के लिए जाने जाते हैं। वे अपने हौसले के लिए भी मशहूर हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी आंखों के नीचे भी भ्रष्टाचार थम नहीं पा रहा है। जब छोटे-बड़े अफसरों से लेकर छोटे-छोटे कर्मचारियों तक भ्रष्टाचार को रोकने का कोई जरिया नहीं दिखता, तब लगता है कि अगर दुर्लभ होते जा रहे ईमानदार अफसर भी खत्म हो जाएंगे, तो इस राज्य में लूटपाट का क्या हाल होगा?
राज्य के गृहमंत्री आबकारी विभाग पर रिश्वतखोरी की बात विधानसभा के भीतर और बाहर दस बरसों से कहते आए हैं। राज्य का स्वास्थ्य विभाग गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, और लोग अर्जियां लेकर मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर तक पहुंचते हैं, और दिल दहला देने वाला एक नजारा दो-चार दिन पहले देखने मिला जब राजधानी के एक सरकारी अस्पताल का नंबर डली हुई पहियों वाली कुर्सी एक बदहाल मरीज को लेकर मुख्यमंत्री निवास से बाहर निकलते दिखी। अगर सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार न होता, भ्रष्ट लोगों को बचाने में सरकार हांक रहे लोग ओवरटाईम न करते होते, तो अस्पताल के चक्कों पर अपने मरीज को धकेलते हुए गरीब घरवाले मुख्यमंत्री निवास पहुंचते? यही हाल स्कूल शिक्षा का है, तकनीकी शिक्षा का है, दूसरे विभागों में खरीदी का है, सड़क निर्माण का है, मकान निर्माण का है। कदम-कदम पर जनता के पैसे का इतना बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में जा रहा है, कि उसका अंदाज लगाना मुश्किल है। और यह सिलसिला बेधड़क इसलिए चलता है कि पहले जो भ्रष्ट पकड़ाए हुए हैं, वे आज दस-दस बरस बाद भी कुर्सियों पर जमे हैं, और बेधड़क आगे भ्रष्टाचार जारी रखे हुए हैं। जांच हो जाती है, और बरसों तक उन पर कार्रवाई की इजाजत सरकार से नहीं मिलती। ऐसे में ईमानदार लोगों को काम करने का मौका इसलिए नहीं मिलता, क्योंकि काम करने और वहां पर भ्रष्टाचार करने की तमाम कुर्सियां पहले के भ्रष्टाचार से बाहुबली बने हुए अफसर खरीद लेते हैं।
इस राज्य में अभी तक भ्रष्टाचार में इतना बड़ा हिस्सा बर्बाद होने को लेकर जनता के बीच कोई हड़कम्प इसलिए नहीं मचा है कि यहां पर इस भ्रष्टाचार के बाद भी काम करने के लिए पैसों की कमी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह भ्रष्टाचार, और इतना भ्रष्टाचार न हुआ होता, तो सरकार उन पैसों से और कितना अधिक काम करवा सकती थी। अभी कुछ दिनों से अखबारों में पाठ्य पुस्तक निगम के कागज खरीदी घोटाले की चर्चा है। जांच में यह पूरा मामला करोड़ों रूपए के भ्रष्टाचार का दिख रहा है, लेकिन इसमें शामिल लोगों पर कोई कार्रवाई होते नहीं दिख रही है। राज्य में कुर्सियों पर मनोनीत नेताओं, और कमाऊ दफ्तरों में अपनी तैनाती पाने वाले अफसरों ने मिलकर ऐसी गिरोहबंदी कर ली है कि वे खुलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं, क्योंकि यह सबका देखा हुआ है कि जिनका पूरा कार्यकाल, और अब तक की पूरी नौकरी दाग-धब्बों से भरी हुई है, उनको भी आज कमाऊ जगहों पर मौका मिला हुआ है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में आर्थिक अपराध जांच ब्यूरो से लेकर लोकायुक्त या लोक आयोग जैसे दफ्तरों का कोई मतलब नहीं है। जब आंकड़ों को लेकर बैठें तो दिखता है कि सरकार से किसी भ्रष्ट पर कार्रवाई की कोई इजाजत ही नहीं मिलती। इसी राज्य में लंबे समय तक खबरों में बना हुआ आरा मिलों में स्टॉक की जांच के नाम पर किया गया करोड़ों का मजदूरी-घोटाला फाइलों में दबा हुआ है, और उन फाइलों के ऊपर बैठकर अफसर और ऊंचे बने हुए हैं।
यह हाल भ्रष्ट लोगों के लिए तो अच्छा है, लेकिन जो लोग ईमानदार हैं, और अपनी ईमानदारी पर फख्र करते हैं, उनके लिए कैसा है, इसे वे ही जानें। यह राज्य चूंकि पिछले तेरह बरसों के अपने अस्तित्व में तरक्की कर गया है, इसलिए यहां की चोरी-डकैती अभी जन आक्रोश का मुद्दा नहीं है, लेकिन इसी राज्य में अफसरों के विदेश दौरे पर पैंतीस-चालीस लाख रूपए खर्च करने की शिकायतें आती हैं, और जनता के पास ऐसी शिकायतों को सही मानने का ठोस अनुभव भी है। यह माहौल भले लोगों को बहुत बुरा लगता है, और जाहिर है कि बुरे लोगों को बहुत भला लगता ही होगा, लगता ही है। सरकार के भीतर के ईमानदार लोगों को ऐसी बेईमानी की अनदेखी करने पर ईमानदार कहलाने का कितना हक है, इस पर उनको सोचना चाहिए।

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