01 सितंबर 2013
संपादकीय
भारत में चारों तरफ से छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर बूढ़ी महिलाओं तक पर बलात्कार की इतनी खबरें आ रही हैं, कि उन सबको छापने से लोग अखबार पढऩा बंद ही कर देंगे। अखबार के अलावा इंटरनेट इन बातों से पटा हुआ है कि बलात्कार के जो नाबालिग आरोपी हैं, उनको कितनी सजा दी जाए। बलात्कार के जो आसाराम जैसे आरोपी हैं, उनको कितनी सजा दी जाए। संसद के भीतर लोग छांट-छांटकर अपनी नापसंदगी को बलात्कारियों के लिए फांसी मांग रहे हैं, और अपनी पसंद के बलात्कारियों पर चुप्पी साधे हुए हैं। लेकिन इन बातों से परे आज यह सोचने की जरूरत है कि जो परिवार अपने बच्चों को, और अपने बड़ों को भी, बलात्कार के आरोप में जेल में देखना नहीं चाहते, उनको क्या करना चाहिए। यहां से लेकर दूसरे सिरे तक सोचने की जरूरत है कि जिन परिवारों में बच्चे, लड़कियां, और महिलाएं हैं वे बलात्कारियों से कैसे बचें। क्योंकि लगातार यह बात भी खबरों में आती हैं कि बलात्कार के अनगिनत मामलों में घर के भीतर के ही करीबी रिश्तेदारों से लेकर पारिवारिक दोस्त तक शामिल रहते हैं। और ऐसे मामलों का किसी शहर या गांव की कानून-व्यवस्था से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता, और पुलिस ऐसे जुर्म रोक भी नहीं सकती।
आज हिंदुस्तानी समाज में एक बड़ी जरूरत यह है कि हर परिवार अपने भीतर बैठकर अपनी हिफाजत की जिम्मेदारी से लेकर, दूसरों की हिफाजत की जिम्मेदारी तक सबको ठीक से समझाए, और सिखाए। आज भी जितनी खबरें मीडिया में आ रही हैं, हमारा मानना है कि वे सौ में से एक भी नहीं हैं। अधिकतर खबरें तो कभी पुलिस तक पहुंच भी नहीं पातीं, क्योंकि उनको या तो ले जाने का हौसला बलात्कार के शिकार लोगों में नहीं रहता, या फिर उनको किसी दबाव या समझौते के तहत चुप करा दिया जाता है। तो जब देश में बलात्कार इतने बड़े पैमाने पर हो रहे हैं, और बढ़ते चल रहे हैं, तो एक तरफ बलात्कार से बचने के तरीकों पर हर किसी को सोचना चाहिए, और दूसरी तरफ अपने-अपने बच्चों-बड़ों को यह भी समझाने की जरूरत है कि वे दूसरों का सम्मान कैसे करें, किसी से छेडख़ानी से कैसे बचें, और ऐसा करके खुद अपने परिवार पर वे किस तरह अहसान करें। आज एक बलात्कारी के जेल जाने पर उसका चाहे जो होता हो, उसका पूरा परिवार किस तरह तबाह होता है, यह खबरों में नहीं आता। इसलिए घर-घर में इन दोनों किस्मों के खतरों से बचाव पर चर्चा होना चाहिए। फिर घरों से बाहर निकलें तो अलग-अलग संगठनों में, संस्थाओं में जागरूकता की पहल होनी चाहिए कि इन्हीं दोनों बातों को अपने सदस्यों के बीच सोच-विचार के लिए रखा जाए, और लोगों को सावधान किया जाए। हमारा यह भी मानना है कि परिवार और समाज से ऊपर सरकार की भी एक जिम्मेदारी बनती है कि लोगों को छेडख़ानी या बलात्कार जैसे हिंसक जुर्म से दूर रखने के लिए जागरूकता के अभियान चलाए, दूसरी तरफ बच्चों और लड़कियों के मां-बाप को, महिलाओं को सावधान करे कि वे खतरे से किस तरह बच सकते हैं।
इन सब बातों को करते हुए हम कहीं भी सरकार और अदालत की जिम्मेदारी को कम नहीं कर रहे, अनदेखा नहीं कर रहे। लेकिन पुलिस का सारा काम जुर्म हो जाने के बाद ही शुरू हो पाता है, और उसके बाद ऐसी हिंसा के शिकार लोगों की कोई भरपाई नहीं हो पाती, उनके जख्म जिंदगी भर के लिए हो चुके होते हैं। दूसरी तरफ ऐसे हर मामले के पीछे के बलात्कारियों को सजा भी नहीं हो पाती, और अधिकतर लोग छूट जाते हैं। इसलिए अधिक जरूरी यह है कि बचाव को ही सबसे अधिक महत्व दिया जाए। बलात्कार का शिकार होने से बचना, और बलात्कारी होने से बचना। इन दो बातों को अगर मेहनत करके सबके दिमाग में बिठाया जाएगा, और एक सुरक्षित माहौल बनाया जाएगा, तो उससे यह देश एक बेहतर समाज बन सकता है।

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