मोदी के कुछ मायने (बाकी बाद में)

14 सितंबर 2013
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी के साथ अब भाजपा में अटल-अडवानी युग खत्म हुआ और एक नया जमाना शुरू हुआ। इस पार्टी के इतिहास के दो सबसे बड़े नेता आज अपनी बुजुर्गियत के साथ दिल्ली में अपने घरों में रहेंगे, और आने वाले कल के लिए उम्मीद जगाने वाले नरेन्द्र मोदी देश को जीतने की कोशिश करेंगे। लालकृष्ण अडवानी की असहमति के पीछे उनकी कोई वैचारिक हिचक थी या प्रधानमंत्री बनने की आखिरी संभावना हाथ से निकल जाने का दर्द, यह राज शायद उन्हीं के साथ चला जाएगा। लेकिन ऐसी व्यक्तिगत बात बहुत मायने भी नहीं रखती, जब एक बड़ी पार्टी तकरीबन एक राय से ऐसा फैसला लेती है।
दरअसल वक्त की रफ्तार और हवा के रूख का अंदाज लोगों को लग नहीं पाता। कुछ लोग उम्रदराज होने के साथ भी मरने तक रोज दौडऩा जारी रखते हैं, बहुत से लोग नौकरी से रिटायर होने के बाद महज अखबारी पन्नों पर ही दौड़ते हैं। ऐसे में किसी पार्टी, सरकार, या संगठन, किसी को भी नई पीढ़ी की जरूरत पड़ती है। आज इसी नजारे में कांगे्रस पार्टी भी अपने सैकड़ों और सफल लोगों को छोड़कर एक नौजवान राहुल गांधी को झंडा थमा चुकी है। हालांकि राहुल गांधी को अपने कुनबे की इस पीढ़ी के राजनीति में अकेले मेम्बर होने से यह मौका मिला है, लेकिन वंशवाद के बारे में अलग से हमने कल ही लिखा है, इसलिए यहां पर आज उस पहलू पर कुछ और नहीं। और मोदी को तो आज किसी वंश की रियायत भी नहीं मिली है।
नरेन्द्र मोदी एक ऐसे वक्त भारत की राष्ट्रीय राजनीति में आए हैं जब दिल्ली से पिछले दस बरसों में उड़ी कोयले की गर्द तले लोगों को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है। इन लोगों में दक्षिण, पूर्व, और उत्तर-पूर्व सहित कश्मीर जैसे सरहदी इलाकों के लोग भी शामिल हैं, जो शायद मोदी के साथ न हों, लेकिन दस बरसों का अंधेरा जिनको थका चुका है। ऐसे लोगों के बीच गर मोदी का जादू काम नहीं करेगा तो यूपीए का राहुल गांधी का जादू भी काम नहीं करेगा। और बीच के हिस्से का भारत, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, बिहार, वगैरह, मोदी और राहुल के बीच सीधे मुकाबले वाले इलाके होंगे, सहयोगी दलों के साथ मिलकर।
मोदी के बाकी पहलुओं को आगे की चर्चा के लिए छोड़ दें लेकिन आज भारतीय चुनावी राजनीति में एक नए धु्रवीकरण का मौका आया है। आज जो पार्टियां देश में जाहिर तौर पर भाजपा की विरोधी हैं, उनको 2014 के चुनाव के समीकरणों को फिर तौलना होगा। जो पार्टियां एनडीए में नहीं हैं, और यूपीए को धर्मनिरपेक्ष कहती हैं, उनको तय करना होगा कि वे मोदी के हमले का मुकाबला कैसी धर्मनिरपेक्षता से, किस तरह करेंगे? यूपीए के साथ किसी अधिक व्यापक तालमेल की गुंजाइश भी लोगों को देखनी पड़ेगी। ऐसा ही कुछ एनडीए भी अपने इर्द-गिर्द सोचेगा। पार्टियों के बीच एक बड़े गठबंधन के भीतर आकर साथ चुनाव लडऩे से लेकर तालमेल तक, और चुनाव के बाद के तालमेल तक, कई तरह की बातें अभी होंगी। और यह सब मोदी की दहशत में होगा।
नरेन्द्र मोदी की चर्चा ने ही भारतीय राजनीति को अमरीका की व्यक्ति-केन्द्रित राष्ट्रपति प्रणाली जैसा कर दिया है, और देश की चुनावी लहर ऐसी ही शुरू हो रही है क्योंकि मीडिया को यह फार्मूला बेहतर बैठता है। लेकिन संसदीय सीटों के स्तर पर होने वाले फैसले इस लहर से कुछ अलग भी हो सकते हैं।
जो भी हो, नरेन्द्र मोदी एक साधारण चाय ठेले से उठकर गुजरात के बार-बार मुख्यमंत्री बनकर अब इस उम्मीदवारी तक पहुंचे हैं, और बिना किसी राजनीतिक कुनबे के पहुंच हैं, यह कम बड़ी बात नहीं है। 

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