13 सितंबर 2013
संपादकीय
भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी में होती देर से एक बात साफ है कि इस पार्टी में इस मुद्दे पर महीनों की सोच के बाद अब भी कुछ घंटों या दिनों की सोच बाकी है। ऐसा किसी पार्टी में ही हो सकता है। सोनिया की कांगे्रस, लालू की राजद, पासवान की लोजपा, मुलायम की सपा, फारूख की नेशनल कांफे्रंस, ममता की तृणमूल कांगे्रस, पवार की एनसीपी, करूणानिधि की डीएमके, जया की एडीएमके, ठाकरों की शिवसेना, पटनायक की बीजू जनता दल, बादलों का अकाली दल, चौटालाओं के आईएनएलडी जैसे दलों में कोई कल्पना कर सकता है कि उनके मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री प्रत्याशियों के लिए पार्टी में कोई चर्चा भी हो सकती है?
ऊपर की फेहरिस्त के अलावा और भी ऐसी कुछ पार्टियां हो सकती हैं, हैं, जैसे जगन मोहन रेड्डी की पार्टी। इनमें से एक भी ऐसी पार्टी है जिसमें मुखिया या उसके कुनबे से परे किसी और नाम की चर्चा भी गद्दारी नहीं मान ली जाएगी? आज मोदी के अलावा जिस दूसरी ताजपोशी की चर्चा है, वह है राहुल गांधी की। राहुल के अलावा किसी और नाम की चर्चा भी करके कांगे्रस में कोई जिंदा रह सकता है? भाजपा में कम से कम महीनों तक अडवानी-सुषमा को मनाने का काम चल रहा है। कांगे्रस में तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जिंदा रहते, कुर्सी पर रहते, चापलूसों ने राहुल की ताजपोशी शुरू कर दी थी। आज भी पार्टी के किसी औपचारिक फैसलों के बिना राहुल गांधी को पार्टी का अगला प्रधानमंत्री मान लिया गया है, ठीक वैसे ही जैसे इंदिराजी की हत्या के बाद बिना संसदीय दल के किसी फैसले के राष्ट्रपति जैलसिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी थी।
मतलब यह कि अगर कोई अच्छी या बुरी पार्टी, किसी अच्छे या बुरे को अपना उम्मीदवार बनाने में महीनों की मेहनत करती है, तो वह कांगे्रस के लिए मखौल का सामान हो जाती है? लोकतंत्र के भीतर एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाना कहां तक जायज है? मोदी का इतिहास दागदार है लेकिन वे अभी तक मुलायम की तरह अनुपातहीन सम्पत्ति के केस में नहीं फंसे हैं, वे जयललिता, माया, लालू की तरह भ्रष्टाचार में कटघरों में नहीं हैं, वे कुनबापरस्त नहीं हैं, वे बादलों की तरह फिजूलखर्च नहीं हैं, राज्य को दीवालिया बनाने की कीमत पर। वे चौटाला भी नहीं हैं कि जेल जाने के बाद भी वे पार्टी के मुखिया बने रहें, वे खरबपति जगन मोहन भी नहीं हैं, जो कि कांगे्रसी-मुख्यमंत्री बाप की संदिग्ध दौलत के साथ जेल में हैं।
मोदी को कोसने के पहले इसे भी देखना चाहिए कि वे डीएनए से मुख्यमंत्री नहीं बने, और न ही अपने डीएनए की वजह से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बन रहे, न ही वे अपने बाद अपने डीएनए को वारिस बनाकर जाने वाले। इसलिए वे कांगे्रस के लिए मखौल बन गए?
मोदी की हजार दूसरी खामियां हो सकती हैं, लेकिन उन पर अलग से बात होनी चाहिए, उनकी उम्मीदवारी से उन बातों का आज क्या लेना-देना? जिन खामियों के बावजूद आज तक जो कटघरों के बाहर हैं, उनकी उम्मीदवारी पर कटघरों के भीतर से लोग किस नैतिक ताकत से बोल सकते हैं? आज तो जब अदालतों से सजा पाए लोगों को संसद के भीतर लाने के लिए पार्टियां सुप्रीम कोर्ट को संसद के भीतर लात मार रही हैं, वहां पर मोदी तो अब तक कटघरे में भी नहीं हैं। आज जब सिखों के खिलाफ 1984 के दंगों को लेकर सोनिया के नाम भी एक अमरीकी अदालत से समन्स जारी हो गया है, तब तक मोदी तो 2002 के दंगों में किसी समन्स से भी बचे हुए हैं। ऐसे में मोदी की उम्मीदवारी को खारिज करने का हक भाजपा के भीतर है, एनडीए के भीतर है, एनडीए के बाहर नहीं। उम्मीदवार मोदी को खारिज करने का हक जनता को हो सकता है, खानदानी चिरागों के चापलूसों को नहीं।
मोदी की खामियों को अलग मुद्दों पर उठाने की जरूरत है और भारत के इतिहास में मोदी सबसे अधिक कोसे गए इंसान हैं। जब फर्जी या सतही मुद्दों को लेकर मोदी के खिलाफ अभियान चलता है, तो उससे उनकी असल खामियां दब ही जाती हैं। हिंदुस्तान में शायद वामपंथी दलों के अलावा अकेली जदयू अभी दिखाई पड़ती है जो रक्त-परंपरा के बिना काम कर रही है।

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