सुप्रीम कोर्ट को लात मारकर..., मुजरिमों का नागरिक अभिनंदन

25 सितंबर 2013
संपादकीय
केंद्र की यूपीए सरकार ने कल एक शर्मनाक काम किया है, दागी और मुजरिम करार दिए जा चुके सांसदों और विधायकों की सदस्यता खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए वह एक अध्यादेश ले आई है। अध्यादेश उन कानूनों के लिए लाया जाता है जिन पर किसी वजह से संसद के भीतर चर्चा न हो सकी हो, न हो पा रही हो, और जिन कानूनों को लाने की बहुत ही जरूरत हो। संसद का कानून बनाने का, उनमें संशोधन का विशेष अधिकार जब सरकार अपने इस संवैधानिक हक का इस्तेमाल करके छीनती है, तो यह माना जाता है कि वैसी किसी हड़बड़ी की जरूरत थी। आज जिस तरह मुजरिम सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया है, उससे दो बातें साबित होती हैं। एक तो यह कि अपने-आपको बचाने के लिए यूपीए सरकार को मुजरिम पार्टियों के मुजरिमों को बचाना जरूरी हो गया था, दूसरा यह कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लात मारने के लिए यूपीए सरकार के पास मुजरिम पार्टियों का जरूरत जितना साथ संसद के भीतर है। अगर ऐसा नहीं है, तो यह यूपीए के इस जुर्म को और भी परले दर्जे का जुर्म साबित करता है। 
इस देश में राजनीति की गंदगी को दूर करने के लिए, चुनावों से मुजरिमों को दूर रखने के लिए, जुर्म करने और कानून बनाने, दोनों का हक एक ही हाथों में रखने के मौजूदा इंतजाम को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वह पहल की थी जो कि इस देश में सरकारों और संसद को खुद करनी थी। लेकिन खरीद-फरोख्त पर जिंदा रहने वाली सरकारों को अब नगद भुगतान के बजाय जुर्म करते हुए कानून बनाने की रियायत का भुगतान यूपीए ने किया है, और उसके दाएं-बाएं जो बैसाखियां हैं, वैसे लालू-मुलायम, माया-डीएमके, इन सबको इस यूपीए-रहम की जरूरत थी। इसलिए अब झारखंड मुक्ति मोर्चा या अमर सिंह से नगद-सौदों के बजाय यह मुफ्त का सौदा यूपीए ने किया है। आज का दिन इस अध्यादेश के साथ निकला है, और यह हिंदुस्तान की राजनीति के लिए एक काला दिन है। एक वक्त इसी यूपीए की आज की मुखिया कांगे्रस पार्टी ने संसद में शाहबानो का अपने ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल से कत्ल किया था, और आज राजनीति में किसी भी तरह की ईमानदारी की किसी भी तरह की संभावना का कत्ल इस अध्यादेश से कर दिया है। उस वक्त शाहबानो को मारने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा गया था, और आज मुजरिमों को बचाने के लिए फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा गया है। 
हम ऐसे किसी मामले में अध्यादेश लाने को भी एक बहुत बड़ा जुर्म मानते हैं, क्योंकि ऐसे मामले में संसद के भीतर चर्चा होनी चाहिए थी, और हमारे हिसाब से ऐसी चर्चा के बाद इस प्रस्तावित कानून को बुरी तरह निंदा करके पूरी तरह खारिज कर देना था। लेकिन अब सरकार में और उसके समर्थक-साथी दलों में शर्म और हिचक पूरी तरह खत्म दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट देश के संविधान के हिसाब से अगर सरकार और नेताओं को, संसद और विधानसभाओं को अगर एक सही राह दिखा रहा था, तो उसकी उंगली को इस अध्यादेश से मरोड़कर तोड़ दिया गया है। 
यह अध्यादेश इस देश के ईमानदार लोगों के मुंह पर थूकने के बराबर है। और इससे यह भी पता लगता है कि यूपीए और उसका साथ देने वाली पार्टियों में ईमानदारी का दीवाला निकल गया है, क्योंकि अब उनको मुजरिम साबित हुए लोगों को जारी रखने के लिए संविधान संशोधन की बेशर्मी भी जरूरी लग रही है। यूपीए में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित जिन लोगों के बारे में भी लोगों के मन में यह खुशफहमी थी कि उनमें शराफत है, उनकी खुशफहमी इस अध्यादेश के साथ खत्म हो जानी चाहिए। भारत की राजनीति के लिए यह फैसला गंदगी को बढ़ाने वाला है, और संसद की ताकत को मुजरिम गिरोह के बाहुबल सरीखा बताने वाला है। यह अध्यादेश संसद की कसौटी पर होकर ही आगे चलेगा, या खारिज हो जाएगा, लेकिन आज तो संसद के भीतर की अग्निपरीक्षा से बचकर यूपीए ने अपने प्यारे मुजरिमों को यह तोहफा दे ही दिया है। इस पर जनता को दो मिनट मौन रखकर लोकतंत्र के एक हिस्से की मौत पर श्रद्धांजलि देनी चाहिए।

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