संपादकीय
29 सितंबर 2013
इंटरनेट पर अभी एक बहस छिड़ी हुई है कि एक हिंदुस्तानी टीवी पत्रकार बरखा दत्त से पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मनमोहन सिंह के बारे में क्या ऐसा कुछ कहा जिसे बरखा दत्त ने अपने दर्शकों को नहीं बताया? एक पाक पत्रकार ने यह लिखा कि नवाज शरीफ ने उनकी मौजूदगी में बरखा से कहा कि मनमोहन सिंह अमरीकी राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान एक देहाती औरत की तरह पाकिस्तान की शिकायत करने लगे, जबकि आपसी मुद्दे आपसी बातचीत से निपटाने चाहिए थे।
बात जब पत्रकारों की होती है तो फिर बोलने वाले कई हो जाते हैं। किसी ने लिखा कि आपसी बातचीत को लिखना या दिखाना नहीं चाहिए। किसी और ने कहा कि प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों का कहा हुआ कुछ भी ऑफ द रिकॉर्ड नहीं होता, इसलिए वह बातचीत बतानी चाहिए थी। लेकिन क्या लिखना या दिखाना है इसकी बारीक बहस में वह मोटी बात धरी रह जाएगी कि अमरीका से बात करते हुए भारत को पाकिस्तान की शिकायत करनी चाहिए थी, या नहीं। इस महत्वपूर्ण पहलू पर बात करते हुए अभी हम नवाज शरीफ की कही बताई जा रही उस बात को भी अनदेखा कर रहे हैं जो उन्होंने एक देहाती महिला के लिए हिकारत के साथ कही, अगर कही तो। एक तो देहाती, फिर औरत, यानी दोहरी हिकारत की हकदार।
खैर, इन तीन देशों के रिश्तों पर आएं, भारत को गर पाकिस्तान से आतंकी और फौजी हमलों की शिकायत है तो उसे इसकी बात उन देशों से भी करनी ही चाहिए थी जिनकी पाकिस्तान पर पकड़ है, जो पाकिस्तान के हिमायती हैं। दुनिया के किन्हीं भी दो देशों के मामले आज आपसी नहीं हो सकते, दुनिया के अंतरराष्ट्रीय जटिल संबंधों की एक भूमि हर कहीं होती है। पाकिस्तान के साथ अमरीका के इतने किस्म के तनाव हैं, इतने किस्म के मदद के रिश्ते हैं, ऐसी फौजी जरूरतें हैं, कि पाकिस्तान की बांह मरोडऩे के लिए अमरीकी-बाहुबल का इस्तेमाल एक सहज तरीका ही माना जाएगा। पाकिस्तानी घरेलू मामलों में अमरीका की दखल, और उसकी पकड़, इतनी अधिक है, कि भारत-पाक सरहद पर निपटने से पहले भारत को अमरीका से इस बारे में बात करनी ही चाहिए थी। इसकी एक वजह यह भी है कि पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता, आतंकी हिंसा और फौजी मनमानी की हालत ऐसी है, कि अकेले पाक प्रधानमंत्री से बात करके कोई भी बाहरी देश अधिक कुछ नहीं पा सकता। अमरीका की बात अलग है जो पाकिस्तान को जब जैसा चाहे इस्तेमाल करता है, जो वहां घुसकर लोगों को मारता है, ड्रोन बरसाकर बेकसूरों को थोक में मारता है। ऐसे ताकतवर देश से अगर भारत अपने पर होते हमलों को रूकवाने की बात करता है तो यह एक बहुत जायज अंतरराष्ट्रीय तरीका है। पाकिस्तान पर जिस अमरीका का जायज-नाजायज, घोषित-अघोषित, दबदबा है, कब्जा है, उसकी मदद मांगना, उससे पाकिस्तान की शिकायत करना, तीसरे देश की दखल को न्यौता नहीं है। यह अमरीकी मदद पर चलने वाले पाकिस्तान को अमरीकी फौजी-गैर फौजी मदद रोकने की कोशिश है।
हम नवाज शरीफ की एक पत्रकार को कही बात को महत्व नहीं दे रहे, लेकिन तीन देशों के इस त्रिकोण की बात कर रहे हैं। यह रिश्ता अमरीका के बिना पूरा नहीं होता। दरअसल आज दुनिया का कोई भी मामला अमरीका की दखल के बिना पूरा नहीं होता। अमरीकी इजाजत के बिना हिंदुस्तान परमाणु बिजली भी नहीं बना सकता। जिस तरह एक वक्त दाऊद की मर्जी के बिना मुंबई में कोई कारोबार नहीं चल सकता था, उसी तरह आज अमरीकी मर्जी के बिना दुनिया में कोई आदमी अपनी बीवी को पीट भी नहीं सकता वरना उसके मुहल्ले पर ड्रोन बरसाए जा सकते हैं। इसलिए आज कोई यह सोचे कि अमरीकी मदद पर चलते, उसकी जकड़ वाले पाकिस्तान के हमलों को बिना जंग रोकने की एक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक कोशिश भी भारत को नहीं करनी चाहिए तो यह गलत सोच है। फिर पाकिस्तान के बारे में तो आज यह धारणा भी है कि वहां के कुछ ताकतवर तबके ऐसे हैं जो कि वहां की सरकार के भी काबू में नहीं हैं, लेकिन शायद अमरीका का उन पर असर हो।
कुल मिलाकर भारत की यह पहल सही है कि फौजी टकराव के बजाय वह पाकिस्तान के हिमायतियों को बताए कि पाकिस्तान उनसे मिलने वाली मदद का कैसे आतंकी इस्तेमाल कर रहा है। दुनिया के दादा के दरबार में रहम की अपील के सिवाय दुनिया में आज और कोई रिवाज रह भी कहां गया है।

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