सुनो मनमोहन सिंहजी, अभी नहीं, तो कभी नहीं...

संपादकीय
28 सितंबर 2013
एक अच्छा-भला प्रोफेसर आज इस जगह पहुंच गया है जिस जगह आपातकाल में संजय गांधी की चप्पलों को उठाने वाले राज्यपाल-मुख्यमंत्री पहुंच गए थे। फर्क महज इतना है कि राहुल गांधी, संजय गांधी नहीं हैं, इसलिए वे हिंसक हरकतें नहीं करते, वे जुबानी हिंसा करके कल रूक गए। अपनी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के लाए एक अध्यादेश को कूड़ेदान में फेंकने का उनका गुस्सा दरअसल मनमोहन सिंह को कचरे की टोकरी में फेंकता है, यूपीए सरकार को बकवास कहता है, इस अध्यादेश को लाने का फैसला करने वाली कांगे्रस कोर कमेटी को खारिज करता है, और यूपीए के भागीदार दलों को बेइज्जत करता है। राहुल का गुस्सा यह भी साबित करता है कि वे अपनी ही पार्टी से ऊपर हैं, अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री से ऊपर हैं। उनका गुस्सा यह भी साबित करता है कि वह महीनों लेट भी आ सकता हैं, और महीनों देर से टूटी अपनी इस नींद के दौरान पार्टी और सरकार के फैसले को वे कभी भी कचरे की टोकरी में फेंक सकते हैं।
राहुल की असहमति और उनके गुस्से से यह भी साबित होता है कि यूपीए और कांगे्रस के भीतर चाहे जो भी हो जाए, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह उसे इस्तीफा देने के लायक नहीं मानेंगे। यह पक्का इरादा मनमोहन सिंह से रही-सही इज्जत भी छीन ले गया है और वे एक घरेलू नौकर की तरह हो गए हैं जिसके साथ परिवार कैसा भी सुलूक कर सकता है।
अपराधियों को बचाने और संसद-विधानसभा में बनाए रखने के शर्मनाक अध्यादेश का राहुल गांधी का विरोध पहली नजर में भला लगता है, लेकिन यह अध्यादेश तो कांगे्रस की ही पहल पर सर्वदलीय बैठक के रास्ते होकर हफ्तों की चर्चा बाद राष्ट्रपति भवन पहुंचा था। इस पूरे दौर में राहुल गांधी कहां थे? उनकी अच्छी नीयत उस दिन अच्छी लगती जिस दिन वे प्रधानमंत्री को बेइज्जत किए बिना इसे पार्टी के भीतर रोकते। सब कुछ हो जाने के हफ्तों बाद अब उनकी नाटकीय दखल प्रधानमंत्री के अलावा कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी नीचा दिखाती है।
लेकिन जिन लोगों की पूरी काबिलीयत महज राजनीति है, उनके बारे में हम कुछ नहीं कहते। मनमोहन सिंह तो एक वक्त जाने-पहचाने अर्थशास्त्री थे। उनको पढ़ाने के लिए बुलाया जाता था। यूपीए के अंतहीन अपराधों में वे एक चुप बैठे सरगना की तरह अपनी पूरी इज्जत खो बैठे हैं। अब इस कुर्सी पर बने रहने के लिए वे और भी अधिक अपमान बर्दाश्त किए चले जा रहे हैं, यह एक तकलीफ की बात है। इस विशाल लोकतंत्र के मुखिया का स्वाभिमान ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह हिंदी फिल्मों में किसी घर में सेवा करने वाला रामू काका हो, जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी सब बर्दाश्त करते हुए भी काम पर बना रहे। इस देश के प्रधानमंत्री की जगह अगर कूड़ादान तय किया जाए, तो उससे उसकी बेइज्जती हो या न हो, देश की बेइज्जती तो हो ही रही है। किसी भी लोकतंत्र के साथ ऐसा सुलूक कुनबातंत्र ही कर सकता है, जो कि कल किया गया है।
वक्त निकल जाने के बाद अपने-आपको बागी तेवरों वाला यंग एंग्री मैन साबित करने का कल का राहुल का काम कांगे्रस पार्टी के ढांचे की कमजोरी भी बताता है। पार्टी के भीतर अधिकारों और जिम्मेदारियों का ऐसा अस्थिर और मनमानी बंटवारा कांगे्रस के लिए भी घातक है, और वह जिस देश में सत्ता या विपक्ष में रहे, उस देश के लिए भी घातक है। बिना जिम्मेदारी और जवाबदेही के सिर्फ अधिकार और अधिकार, महज खतरनाक और खतरनाक होते हैं।
कांगे्रस के भीतर राहुल गांधी का दर्जा अगली पीढ़ी का हो सकता है लेकिन प्रधानमंत्री के पद से दो-चार कदम दूर रहने वाले किसी व्यक्ति का दर्जा समय पर जागने, समय पर सही काम करने वाले का होना चाहिए। अपने प्रधानमंत्री, पार्टी, और सरकार, सहयोगी-भागीदार दल, सबको नीचा दिखाकर खुद ढाई मिनट में वाहवाही पाना, गंभीरता और परिपक्वता का सुबूत नहीं है। उन्होंने एक अच्छे काम को बहुत बुरी तरह करके एक सुर्खी तो बटोरी है, लेकिन मनमोहन सिंह में अब शायद एक सुर्खी बटोरने का भी हौसला नहीं है। क्या एक अर्थशास्त्री-प्राध्यापक कितनी ही बेइज्जती और कितनी ही तोहमतें झेलकर गांधी-नेहरू परिवार के लिए सीट गरम रखने को जिंदगी का मकसद बना चुका है?
यह अध्यादेश तो कूड़े की टोकरी में जा ही चुका है, अब मनमोहन सिंह अपनी थोड़ी सी बची-खुची इज्जत को कूड़ेदान में जाने से बचा लें।

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