कब्र से मुर्दों के निकलने के पहले क्या रस्सी थम सकेगी?

2 सितंबर 2013
संपादकीय
भारतीय संसद में प्रमुख विपक्षी गठबंधन और दल की तरफ से भाजपा ने राष्ट्रपति से मिलकर लोकसभा के चुनाव वक्त के पहले करवाने की मांग की है। उसका तर्क है कि देश में आज जो बदहाली है, उसे देखते हुए इस सरकार की निरंतरता खतरनाक है, और अब अगले चुनाव का वक्त आ गया है। 
इसी राज्य की सरकार को भंग करने के केंद्र सरकार के विशेष संवैधानिक अधिकार जैसा कोई अधिकार राष्ट्रपति को केंद्र सरकार को भंग करने का नहीं है, इसलिए विपक्ष की यह बात मोटे तौर पर एक भावनात्मक और प्रतीकात्मक बात अधिक है। लेकिन इस भावना से परे हटकर आज अगर देखें तो देश की जनता किस बात की राह देख रही है? छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य हैं जहां पर अगले कुछ महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, और वहां पर जनता को राज्यों की प्रमुख पार्टियों, राज्य की सरकारों के अलावा केंद्र की यूपीए सरकार के कामकाज को लेकर भी वोट डालने का, अपनी सोच को बताने का मौका मिलेगा। लेकिन बाकी देश के सामने 2014 के मई महीने तक इंतजार करना ही बाकी है। यह नौबत उस जनता को खासी भारी पड़ रही है जो कि अब थक चुकी है। यूपीए और कांगे्रस के मंत्रियों के भ्रष्टाचार से, देश की अर्थव्यवस्था के हाथ से निकल जाने से, महंगाई से, कांगे्रस नेताओं के बेइज्जत करने वाले बयानों से, और भी कई तरह की चीजों से हिंदुस्तानी जनता सचमुच थक गई है। लेकिन संसदीय व्यवस्था कुछ संवैधानिक संकटों के बिना निर्वाचित सरकारों को हटाने या निर्वाचित सदनों को भंग करने का कोई विकल्प नहीं रखती। एक वक्त था जब इस देश में समाजवाद के संस्थापक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। और आज हकीकत यही आ खड़ी हुई है कि हिंदुस्तानी लोग कब्र के भीतर बेचैनी से करवटें बदलते हुए पांच बरस पूरे होने की राह देख रहे हैं। यह नौबत कुछ-कुछ ऐसी है कि अस्पताल में कोमा में पड़े हुए मरीज की धड़कने वेंटिलेटर की वजह से चल रही हैं, और चाहते हुए या न चाहते हुए घर के लोग, आसपास के लोग यह राह देखते हैं कि यह सिलसिला कब तक चलेगा। आज देश में यूपीए सरकार को लेकर बहुत सी वजहों से लोगों की सोच कुछ इसी तरह की हो गई है। 
यह पूरा दौर न सिर्फ आर्थिक निराशा का है, जिंदा रहने की दिक्कतों और तकलीफों का है, बल्कि लोकतांत्रिक आस्था के खत्म होने का दौर भी है। देश में जब कोई नेता प्रेरणा देने वाले न बच जाएं, तब लोकतंत्र का दिन बड़ा बुरा आ जाता है। आज हिंदुस्तान ऐसी ही हताशा का शिकार है। पिछले नौ बरसों में इसी यूपीए सरकार ने सूचना का अधिकार दिया, पढऩे का अधिकार दिया, अंतहीन रोजगार दिए, और अब आखिरी में खाने का अधिकार दिया, और जैसी कि खबर है, कानून को धता बताकर राजनीतिक दलों और नेताओं को जुर्म और परदे की छूट भी यूपीए देने जा रही है। इस हिसाब से सबको नौ बरसों में मनमोहन सरकार ने कुछ न कुछ दिया ही है। लेकिन इतना सब देने के बावजूद अपनी हरकतों से उसने लोगों का भरोसा छीन लिया। यही वजह है कि आज हमको लोहिया की बात याद पड़ रही है, और जनता सचमुच ही अगले चुनाव की राह देख रही है। आने वाले महीने यह बताएंगे कि यूपीए अपने हाथ से तकरीबन छूट चुकी दिख रही रस्सी को थामने का कोई रास्ता निकाल सकती है, या फिर मुर्दे कब्रों से निकलकर बुलंद इरादों के साथ वोट डालने जाएंगे?

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