22 सितंबर 2013
संपादकीय
भारत के महाधिवक्ता मोहन पाराशरण ने सुप्रीम कोर्ट में रामसेतु को लेकर सरकार की ओर से खड़े होने से इंकार कर दिया है। उन्होंने अदालत को यह बतला दिया है कि उनकी आस्था भगवान राम में है, और उन्होंने इस पुल का उपयोग किया था इसलिए वे इस मामले में इसके खिलाफ सरकार की तरह से पैरवी नहीं करेंगे। ऐसी खबर है कि सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक दूसरे बड़े वकील राजीव धवन को खड़े होने के लिए कहा है।
अदालती पेशे को लेकर आज यहां चर्चा की जरूरत इसलिए है कि आसाराम का मुकदमा लडऩे की वजह से देश के सबसे बड़े वकीलों में से एक राम जेठमलानी की चारों तरफ आलोचना हो रही है। उनकी अधिक आलोचना इस वजह से हो रही है क्योंकि उन्होंने आसाराम पर आरोप लगाने वाली नाबालिग लड़की के बारे में बहुत ही अपमानजनक और आपत्तिजनक बातें कही हैं। लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब राम जेठमलानी ने बहुत ही खराब किस्म के अपराधी समझे जाने वाले लोगों का मामला लिया हो। इंदिरा-राजीव के हत्यारों से लेकर, कई तरह के बलात्कारियों, दंगाईयों, और तस्करों के मामले वे लड़ते आए हैं। ऐसे में वे जिस भाजपा में लंबे समय तक रहे, उसे भी कई बार दिक्कत झेलनी पड़ी।
हमारा यह मानना है कि एक वकील को अपने काम के सिलसिले में जितने किस्म की तिकड़म करनी पड़ती है, वह वकालत के लिए तो बुरी नहीं होती, लेकिन अगर वकील किसी राजनीतिक दल से जुड़ा है, तो उस पार्टी को दिक्कत हो सकती है। इसे हम वकालत के पेशे की बेईमानी या उसमें कुछ गलत काम करना नहीं गिनते, लेकिन वकालत से परे का जो पहलू किसी व्यक्ति से जुड़ा हुआ है, उसके हिसाब से वह काम गलत कहा जा सकता है। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान पर हमला करने वाला आतंकी अजमल कसाब भी अच्छी पैरवी का हकदार था, और कुछ वकीलों ने अगर अपनी निजी विचारधारा और सिद्धांतों के चलते उसका केस नहीं लिया था, तो भी कुछ दूसरे वकील उसके लिए तैयार थे। यह मामला कुछ उसी तरह का है कि गोलियों से जख्मी होकर कोई मुजरिम भी अगर किसी डॉक्टर के पास पहुंचे तो उसे इलाज का हक रहता है, और उसका इलाज करना डॉक्टर की जिम्मेदारी रहती है। इसलिए जेठमलानी के केस लडऩे में हमको कोई बुराई नहीं लगती, और वे अगर अपने मुवक्किल आसाराम को बचाने के लिए नाबालिग आरोपी लड़की के खिलाफ सौ किस्म की बातें करते हैं, तो यह भी उनकी वकालत का हिस्सा है, और इसी वजह से इस पेशे को कुछ लोग खराब भी मानते हैं।
आज जिस बात से इस पर लिखना शुरू किया, उसे देखें, तो राम और रामसेतु पर आस्था रखने वाले वकील ने सरकार का केस लडऩे से अगर इंकार कर दिया है, तो यह ईमानदारी की बात है। अपनी खुद की आस्था के खिलाफ कोई काम करना भी नहीं चाहिए। कुछ महीने पहले कर्नाटक में एक जैन मंत्री ने मछली पालन विभाग का काम संभालने से मना कर दिया था कि वह काम उनकी निजी धार्मिक आस्था के खिलाफ है। लोगों को यह समझना चाहिए कि अगर सरकारी या संवैधानिक जिम्मेदारी किसी को ऐसी जगह बिठाती है कि वहां पर उसे ही अपनी आस्था के खिलाफ भी काम करना जरूरी हो, तो एक अलग बात है। लेकिन जहां आस्था के खिलाफ काम करने की नौबत आए, और दूसरे लोग उसके लिए मौजूद हों, वहां पर लोगों को पीछे हट जाना चाहिए। न सिर्फ वकील को, बल्कि जज को भी ऐसे मामले से अपने को अलग कर लेना चाहिए जिसमें उनकी आस्था उनके विवेक पर हावी हो, और उनके फैसले को प्रभावित करने की हालत में हो। लोगों को अपनी निजी आस्था के खिलाफ जाकर आधे-अधूरे मन से कुछ करना भी नहीं चाहिए। कल ही यह खबर भी आई हैै कि पोप ने कैथोलिक डॉक्टरों से यह कहा है कि वे गर्भपात न करवाएं। हमारा मानना है कि अगर जान बचाने के लिए ऐसा करना किसी समय जरूरी हो, और वही एक डॉक्टर मौजूद हो, तो उसे धर्म के बजाय पेशे के सिद्धांतों को अधिक मानना चाहिए, और अगर ऐसी नौबत न हो, तो डॉक्टर अपने को ऐसे काम से अलग भी कर सकते हैं।
और इसी के साथ-साथ राम जेठमलानी जैसे लोगों को देखकर यह भी समझना चाहिए कि किस तरह लोग अपने पेशे को किसी भी नीति-सिद्धांत से अलग रखकर सिर्फ अपने काम को करने में जुट जाते हैं, फिर चाहे वह काम किसी हैवान दिखते इंसान को बचाने के लिए किसी घायल के जख्मों पर नमक छिड़कने का ही क्यों न हो। पेशे की जरूरत, और इंसानियत की जरूरत कभी-कभी अलग भी हो सकती है, और कुछ लोग इन दोनों को अलग-अलग करके अपनी पसंद का रास्ता तय कर सकते हैं। आज की यहां की बात किसी एक राह को सुझाने वाली नहीं है, यह बात सोचने का सामान छोड़कर खत्म हो रही है।

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