21 सितंबर 2013
संपादकीय
भारत से ब्रिटेन पहुंचे बाबा रामदेव को वहां पर अफसरों ने कई घंटों तक पूछताछ के लिए रोका, उनकी तलाशी ली, और पहली खबरों में यह आया है कि उनको आज भी जांच के लिए बुलाया गया है। इस बारे में रामदेव का पहला ही बयान यह था कि उन्हें क्यों रोका गया इस बारे में सोनिया गांधी से पूछा जाए, उन्हीं को मालूम होगा। अभी तक ऐसा आरोप सोनिया गांधी पर नरेन्द्र मोदी ने भी नहीं लगाया था, जिनको 2002 के दंगों के बाद से अब तक अमरीका का वीजा नहीं मिला है। उन्होंने भी, या उनकी पार्टी ने भी इसकी तोहमत सोनिया गांधी पर नहीं लगाई। और कल आई एक राजनीतिक खबर अगर सही है, तो नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी की एक दिग्गज नेता, लोकसभा में विपक्ष की नेता, सुषमा स्वराज के उस बयान पर नाराजगी जाहिर की है, जिसमें सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा फिर उठाया गया है।
पाठकों को याद होगा कि कुछ दिन पहले जब मध्यप्रदेश में आसाराम को गिरफ्तार करने की कार्रवाई चल रही थी तो उसने खुलकर मीडिया से यह कहा था कि इसके पीछे मां-बेटे हैं। इसके पहले बहुत से मौकों पर रामदेव और आसाराम सोनिया गांधी का नाम ले-लेकर आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन जो मीडिया इनके रूबरू हो पाता है, वह इनसे सिर्फ इस सनसनीखेज लाईन को लेकर संतुष्ट हो जाता है, और उनसे यह बहुत जरूरी और जायज सवाल किए बिना लौट आता है कि ऐसे निजी और गंभीर आरोप को लेकर उनके पास क्या सुबूत हैं? मीडिया अपने काम को किसी कूरियर एजेंसी के काम जैसा मान बैठा है कि किसी एक के दिए लिफाफे को दूसरे तक पहुंचाना। इसी अंदाज में मीडिया एक बयान को अपनी अक्ल का इस्तेमाल किए बिना पाठकों तक पहुंचा देता है, और फिर उसका जवाब दूसरी ओर से आने पर उसे भी लोगों तक पहुंचा देता है। इसे मीडिया के कुछ लोग अपनी निष्पक्षता मान लेते हैं, और करार देते हैं। हकीकत यह है कि अक्ल को किनारे रखकर एक कलम या माईक्रोफोन, या कैमरा, किसी तरह से पत्रकारिता नहीं कर सकते। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए अपनी अक्ल और अपने सामाजिक सरोकार का इस्तेमाल भी करना पड़ेगा, इसके बिना वह सिर्फ हरकारे जैसा हो जाएगा, हो चुका है।
अब वक्त आ गया है कि मीडिया के पाठक और दर्शक यह सवाल करें कि तथ्यों को पेश करते हुए भी, पाठक और दर्शक की बहुत अस्वाभाविक जिज्ञासा को मीडिया जरूरत की जानकारी क्यों नहीं देता? क्यों बाबा-बापू-अन्ना-केजरीवाल से यह पूछता कि उनके पास आरोपों के समर्थन में कौन से सुबूत हैं, कौन से तथ्य हैं? बेबुनियाद बातों को लेकर अपने खुद के पापी-पेट को चलाना मीडिया ने पहले अपनी बेबसी की तरह पेश किया था, अब यह उसकी आदत हो गई है। मीडिया को करीब-करीब मुफ्त में पाने के शौकीन ग्राहकों को भी यह समझना चाहिए कि अगर वे जिम्मेदार मीडिया चाहते हैं, सच को पढऩा चाहते हैं, शब्दों के बीच छुपी हुई हकीकत को देखना चाहते हैं, तो उनको अच्छे, जिम्मेदार मीडिया, और बुरे, गैरजिम्मेदार मीडिया के बीच फर्क करना होगा। आज भगवा कपड़े पहने हुए एक आदमी रात-दिन गैरजिम्मेदारी की बातें करता है, और मीडिया उसे तश्तरी में पेश कर देता है, बेच देता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और मीडिया से भी उसके काम को लेकर सवाल होने चाहिए।

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