तेज रफ्तार इंसाफ की राह पर तख्तियां लगेंगी...

11 सितंबर 2013
संपादकीय
दिल्ली में एक चर्चित बलात्कार पर बहुत इंतजार के बाद कल फैसला आया, और आज कुछ घंटों में सजा आ जाएगी। इसमें नौ महीनों का वक्त लगा, और इतने में यह फैसला इसलिए आ पाया क्योंकि निर्भया से बलात्कार ने पूरे देश को हिला दिया था, और पुलिस से लेकर अदालत तक ने इसे तेज रफ्तार से नतीजे तक पहुंचाया। लेकिन देश की जनता के बड़े हिस्से से आवाज आ रही है कि सजा फांसी से कम नहीं होनी चाहिए, और सुनवाई में इतना वक्त नहीं लगना चाहिए। लोगों की भावना ठीक है कि ऐसे अपराधियों के मारे जाने से उनके फिर जुर्म करने का खतरा खत्म हो जाएगा। दूसरी बात भी सही है कि मुजरिम को सजा जल्द होनी चाहिए।
लेकिन इन दोनों को तौलने की जरूरत है। फांसी की सजा से अगर यह माना जा रहा है कि उसकी दहशत से और लोग भी वैसे जुर्म से बिदकेंगे, तो यह भी समझना चाहिए कि अगर ऐसा कोई डर होगा भी, तो लोग खतरे को खत्म करने के लिए बलात्कार की शिकार को भी खत्म कर देंगे। इससे जितने बलात्कारी मारे जाएंगे, उससे कई गुना अधिक हत्याएं बढ़ जाएंगी। आधा दर्जन बलात्कारी अपनी फांसी टालने के लिए बलात्कार की शिकार महिला को मार ही डालेंगे। दूसरी बात यह कि सभ्य समाज अब मौत की सजा से दूर जा रहा है। दुनिया में किसी को भी दूसरों को मारने का हक नहीं होना चाहिए, अदालत को भी नहीं। अब दूसरी बात पर आएं कि अदालती फैसला तेज रफ्तार से होना चाहिए। तेज रफ्तार से जितने किस्म के खतरों की तख्तियां खतरनाक सड़कों पर लगी रहती हैं, उतनी ही तख्तियां इंसाफ की राह के किनारे भी लगाई जा सकती हैं। अदालत तो इंसाफ का चेहरा है। लेकिन इंसाफ तक पहुंचने के पहले किसी मामले का ढांचा गवाहों, बयानों, सुबूतों, जिरह, जांच, किस्म की जितनी बातों से होकर गुजरता है, उन पर अदालत का कोई बस नहीं चलता। ऐसे में सिर्फ अदालत से रफ्तार की उम्मीद वैसी ही होगी जैसी कि किसी पुरानी, फटीचर, फटफटी से तय समय में मंजिल पर पहुंचने की हो, जिसके पुर्जे-पुर्जे गड़बड़ हों, जिसमें मिलावटी पेट्रोल भरा हो, हवा कम हो, बे्रक कमजोर हो, बत्ती बंद हो। ऐसी मंजिलें तय करने का कोई मतलब नहीं हो सकता। इससे हादसा ही होगा। बेकसूर फांसी पर चढ़ाए जाएंगे, और असल मुजरिम इस आपाधापी के बीच बचने की राह खरीद लेंगे।
इसी देश में उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर में सरकारी जवानों के लिए बलात्कारों पर बरसों से कोई सजा नहीं हो पाई है। उत्तर-पूर्व की महिलाएं इस नौबत के खिलाफ पूरे कपड़े उतारकर सड़कों पर, सैनिक-अहातों के सामने प्रदर्शन करती आ रही हैं, लेकिन बाकी का भारत इन खबरों को शायद पढ़ भी नहीं रहा। इस देश में किसी जुर्म से तब तक देश नहीं हिलता जब तक कि वह महानगरों के करीब न हुआ हो, टीवी कैमरों के करीब न हुआ हो। दूर क्यों जाएं, छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षा बलों और सलवा जुडूम के लोगों पर बलात्कार के आरोप लगते आए हैं, जो किसी अदालती किनारे तक नहीं पहुंचे हैं। ऐसे में नौ महीने से कम में इंसाफ पैदा होने की उम्मीद बादलों पर बनी इमारत सरीखी होगी।
किसी हादसे से उत्तेजित या विचलित होकर तत्काल-इंसाफ की उम्मीद करना ठीक नहीं है। जब जनता का बड़ा हिस्सा ऐसे विचलित हो, तो सरकार, संसद, और कई बार अदालतें भी, एक दबाव के तहत काम करते हैं, ऐसे काम हमेशा ही अच्छे नहीं होते, ऐसे में गलत फैसले भी होते हैं।
जरूरत देश की पूरी व्यवस्था को सुधारने की है। समाज के माहौल को, पुलिस के काम को, जांच को, कानून को, अदालती कार्रवाई को। तब जाकर इंसाफ ठीक होगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें