संपादकीय
24 सितंबर 2013
अभी-अभी रिटायर हुए थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह पहले तो सरकार विरोधी आंदोलन में अन्ना हजारे के साथ आए और फिर बीजेपी के साथ आ गए। इस तेज रफ्तार से सेनाध्यक्ष अगर राजनीति में आएंगे, और अगर मुल्क के राज को लेकर उनका हाजमा कमजोर होगा, तो वे तबाही का सैलाब लेकर आएंगे। बाकी बातों को छोड़ भी दें तो पिछले दो दिनों में उनकी कही दो बड़ी खतरनाक बातों पर देश के जिम्मेदार लोगों को बड़ी फिक्र होना जरूरी है। उन्होंने अपनी बनाई हुई एक फौजी-खुफिया यूनिट के बारे में कहा कि उसने देश के बाहर ऑपरेशन किए। दूसरी बात उन्होंने कही कि सेना कश्मीर के अधिकतर मंत्रियों को पैसे देती है जो कि जनहित के कामों के लिए दिए जाते हैं। कश्मीर की सरकार ने वीके सिंह के इस आरोप को गलत ठहराया है। जनरल सिंह ने नाम लेकर एक आंदोलन का कहा कि उसे सेना ने पैसे दिए, चलाया। उन्होंने कश्मीर में स्थिरता के लिए सेना द्वारा खर्च करने की बात कही।
हिंदुस्तान को लोकतांत्रिक इतिहास में देश को इतना नुकसान पहुंचाने वाले रिटायर्ड फौजी कम ही रहे होंगे। ऐसा नहीं है कि थलसेनाध्यक्ष रहने के बाद भी वी.के. सिंह कश्मीर की नाजुक हालत को न जानते हों। उनकी बात को अगर सच भी मान लें, तो सेना खुफिया तरीके से कश्मीर में अमनचैन के लिए खर्च करती आई है। अगर उन्होंने खुद भी ऐसा किया है, तो आज महज भाजपा में आ जाने भर से वे ऐसे खुफिया राज उगलने लगेंगे? नारों से परे की मामूली समझ रखने वाले भी यह समझते हैं कि भारत-पाक की सरहद पर बसे कश्मीर का मामला भारत के बाकी राज्यों से अलग है। वहां तो भारत की सरकारें फौजी जरूरतों के मुताबिक भी कई किस्म की राजनीतिक और नागरिक रियायतें करती आई हैं। विदेश नीति और फौजी जरूरतों के ऐसे बारीक पहलुओं से नरेन्द्र मोदी तो नासमझ हो सकते हैं, लेकिन रिटायर्ड थलेसनाध्यक्ष नहीं। और ऐसा आदमी आज चुनावी राजनीति के चलते अगर देश को नुकसान पहुंचाने वाले राज उजागर कर रहा है, तो भाजपा को अपने इस नए सितारे को राष्ट्रवाद की अपनी कसौटी पर कसना चाहिए। एक चुनाव के पहले केंद्र की सरकार को नीचा दिखाने की जनरल सिंह की कोशिश तो चली ही आ रही थी, अब अस्थिरता और हमलों को झेल रहे कश्मीर पर रिटायर्ड फौजी भी हमला करने लगे तो यह एक घटिया बात है, गद्दारी है।
फौज की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने के बाद कोई भी देश के लिए शर्मिंदगी खड़ी करने वाली ऐसी नौबत ला सकता है। वीके सिंह यही घटिया काम कर रहे हैं। जिन लोगों को पारदर्शिता हर मामले में हर हद तक सुहाती है, वे यह सोचें कि क्या अपनी निजी जिंदगी को वे बिग बॉस टीवी शो की तरह कैमरों और माइक्रोफोन के सामने उजागर कर सकते हैं? क्या वे पारदर्शी पॉलीथीन का तौलिया लपेटकर सड़क पर घूम सकते हैं? दुनिया के हर लोकतंत्र में सरकारों के अपने राज रहते हैं। इनमें से राष्ट्रीय सुरक्षा के राज सरकारों की आवाजाही से उजागर नहीं किए जाते। जनरल सिंह आज न पिछली सरकार में हैं, न अगली सरकार में। इसलिए उनके भांडाफोड़ से भाजपा अलग बैठकर मजा ले रही है। लेकिन कश्मीर के हर मंत्री को पैसे देते आई है तो इस पर जवाब देने के लिए भाजपा भी जिम्मेदार है जो सरकार चला चुकी है। एक बार फिर सरकार पर आने के लिए अगर भाजपा संवेदनशील खुफिया जानकारी का ऐसा चुनावी इस्तेमाल कर रही है, तो इससे उसका राष्ट्रवाद भी हैरान हो रहा होगा कि उसके नामतले यह क्या हो रहा है।
आज यह वक्त भी है कि सेना के आला अफसरों, खुफिया एजेंसियों के बड़े अफसरों के रिटायर होने के बाद राजनीति में आने पर रोक लगाने पर सोचना चाहिए। जनरल सिंह ने सेना के राज उजागर करके या झूठ बोलकर देश के साथ गद्दारी की है, एक घटिया काम किया है। उनकी बातों से देश की शांति और सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। भाजपा के अपने राष्ट्रवाद के साथ जनरल सिंह को एक बार और तौलना चाहिए।

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