सोने की चिडिय़ा के पैरों और पंखों पर तनाव-कुंठा की जंजीरें

संपादकीय
17 सितंबर 2013
लोगों के बीच निजी जिंदगी के तनाव से लेकर सार्वजनिक मुद्दों पर तनाव तक, बहुत से ऐसे मामले होते हैं जो कि बड़ी-बड़ी हिंसा में तब्दील हो जाते हैं। हिन्दुस्तान में हर बरस पुलिस और सुरक्षा बलों में, सेना में सैकड़ों वर्दीधारी आत्महत्या करते हैं। इसमें सबसे बड़ी गिनती सीआरपीएफ के जवानों की है जो कि परिवार से दूर बहुत ही खराब हालत में देश भर में तैनात रहते हैं, और हिंसाग्रस्त इलाकों में स्थानीय लोगों का तनाव भी झेलते हैं। छत्तीसगढ़ में ही ऐसी बहुत सी आत्महत्याएं हुई हैं। ऐसे तनाव के मामले दुनिया के अधिकतर देशों में होते हैं और कल अमरीका में एक भूतपूर्व नौसैनिक ने जिस तरह नौसेना के एक बड़े ठिकाने पर गोलीबारी करके एक दर्जन से अधिक लोगों को मार डाला, वह वहां के समाज में चल रहे तनाव का एक सुबूत है। इसके पहले भी वहां के स्कूलों और कॉलेजों में, अलग-अलग उम्र के हमलावरों ने बहुत बड़ी-बड़ी संख्या में लोगों को भून डाला है। 
हिन्दुस्तान से अमरीका की हालत अलग इसलिए है कि वहां पर हथियार रखना न सिर्फ हर नागरिक का अधिकार है, बल्कि एक-एक नागरिक हमलावर किस्म के बहुत से हथियार रखने का हक रखते हैं। इसलिए वहां पर जब कोई घर के भीतर नाराज होता है तो भी कहीं और जाकर अनगिनत लोगों को भून डालता है। इस मामले पर आज यहां लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि कल ही एक खबर आई थी कि अमरीका के मुकाबले भारत में मनोचिकित्सकों का अनुपात कितना कम है। और हमारा तो अनुभव यह है कि भारत में मनोचिकित्सक और मनोपरामर्शदाता हैं ही गिनती के, और उसके ऊपर बुरी नौबत यह कि उनका वक्त गिने-चुने शहरी और संपन्न लोगों पर ही खर्च हो जाता है। नतीजा यह रहता है कि देश की अधिकतर आबादी बाबा, औघड़, काला जादू, तांत्रिक, मजार, ऐसी जगहों पर अपना इलाज ढूंढती है। यही नतीजा रहता है कि कई किस्म के चोलाधारी लोग मानसिक रूप से परेशान लड़कियों और महिलाओं से, बच्चों से, बलात्कार की नौबत तक पहुंच पाती हैं। 
हम पहले भी कई बार इस बात को यहां उठा चुके हैं कि भारत में मनोचिकित्सकों और मनोपरामर्शदाताओं की पढ़ाई की क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। आज इम्तिहान में फेल होने पर छोटे-छोटे बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं। घरों में बच्चे पसंद का मोबाइल फोन न मिलने पर फांसी लगा लेते हैं, प्रेमी जोड़े हर प्रदेश में एक साथ आत्महत्या करते दिखते हैं, दो दिन पहले की ही खबर है कि देश में सबसे अधिक हत्याएं प्रेम और सेक्स संबंधों को लेकर होती हैं। अभी भारत का सामाजिक तनाव हमला करके आसपास के लोगों को मार डालने तक तो नहीं पहुंचा है, लेकिन पिछले हफ्ते ही इंदौर के एक किसी डॉक्टर की खबर थी जिसने अपने पूरे परिवार को मार डाला था। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में भी जगह-जगह तनाव को लेकर अपने ही कुनबे को मार डालने की कितनी ही घटनाएं हुई हैं। अमरीका और भारत में तनाव की वजहें, और उनकी वजह से होने वाली हिंसा के मामलों में फर्क हो सकता है लेकिन यह समझने की जरूरत है कि समाज के भीतर, परिवार के भीतर तनाव को कम करना जरूरी क्यों है, और कितना जरूरी है।
भारत में सरकारी दफ्तरों और अदालतों में जिनकी पूरी जिंदगी खप जाती है, जिन परिवारों की लड़कियां छेडख़ानी से परेशान होकर आग लगाकर जान दे रही हैं, जिनकी पेंशन नहीं मिल पा रही है, जिनको अपने आपको जिंदा साबित करने में बरसों लग रहे हैं, जिनको हक का इलाज नहीं मिल पा रहा है, जिनके बच्चे रिश्वत न देने पर नौकरी नहीं पा सक रहे हैं, जो अपनी मर्जी के लड़के-लड़कियों से दोस्ती नहीं कर पा रहे हैं, शादी नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे तमाम मामले एक परले दर्जे का सामाजिक तनाव खड़ा कर रहे हैं। यहां पर दो तरफ से सामाजिक तनाव से निपटने की जरूरत है। एक तो जो लोकतांत्रिक और सामाजिक बेइंसाफी चल रही है, उसे खत्म करना होगा, वरना शहरों में भी नक्सलियों की तरह कोई दूसरी ताकतें बेइंसाफी के खिलाफ खड़ी होने लगेंगी। दूसरी तरफ व्यक्तिगत तनाव को कम करने के लिए मानसिक विशेषज्ञों की गिनती बढ़ानी होगी, और उस इलाज या सलाह-मशविरे की सहूलियत भी जनता तक पहुंचानी होगी। अगर हिन्दुस्तान में अमरीका की तरह थोक में हत्याओं से ऐसे तनाव सामने नहीं आ रहे हैं, तो उसे अच्छी नौबत मानना ठीक नहीं होगा। यह समझने की जरूरत है कि तनाव, कुंठा, और भड़ास के साथ जीने वाला समाज कभी भी अपनी पूरी संभावनाओं को छू नहीं सकता, अपने देश को अपनी पूरी उत्पादकता दे नहीं सकता। भारत आज वैसा ही एक समाज है, सोने की चिडिय़ा के पैरों और पंखों पर तनाव और कुंठा की जंजीरें कसी हुई हैं। 

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