हिंदुस्तानी मीडिया के वालमार्ट और पत्रकारों की जगह मैनेजर

2 सितंबर 2013
हिंदी इलाकों में अब तक दिल्ली की दहशत ठीक से पहुंची नहीं है। कुछ टीवी चैनल चलाने वाले टीवी-18 नाम के एक मीडिया समूह ने तीन सौ से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है। इसे लेकर दिल्ली में मीडिया के छोटे-मोटे बचे संगठन ने मीटिंग रखी, और इस कंपनी के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया। ठेके पर या अनुबंध के आधार पर रखे गए कर्मचारियों को हिंदुस्तानी मजदूर कानून बहुत बड़ी हिफाजत देता भी नहीं है, और सफेदपोश पेशों के साथ दिक्कत यह है कि उनमें कारखाना-मजदूरों की तरह लड़ाकू आंदोलन भी नहीं हो सकते। नतीजा यह है कि सैकड़ों लोगों की नौकरी जा चुकी है, और मीडिया के हजारों लोगों की नौकरी दिल्ली में ही खतरे में है। बाकी हिंदुस्तान में भी हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है।
इस मुद्दे पर अधिक बारीकी से देखने के पहले यह देखने की जरूरत है कि देश की आज की हालत कैसी है। ऐसा नहीं कि सिर्फ सरकार की हालत पतली है, रूपये की हालत पतली है। बाजार की हालत भी बहुत खराब है और जितने नए मॉल खुल रहे हैं, उनसे अधिक बंद हो रहे हैं, और जो चल भी रहे हैं उनमें खाली होती जा रही दुकानों के शीशों पर पोस्टर चिपकाकर उन्हें खाली दिखने से बचाने का झांसा दिया जा रहा है। कारखानों की हालत खराब है, ग्राहक की हालत खराब है। 
ऐसे में जाहिर है कि उस मीडिया की हालत बहुत अच्छी शायद न हो जिसने कि पिछले बरसों में बाजार के गलाकाट मुकाबले में अपनी लागत और अपने खर्चे दोनों को अंधाधुंध बढ़ा लिया था। एक कारोबार अपने आपमें बीते कल की तरह कामयाब रहते हुए भी आज बाजार में नए आ खड़े हुए मुकाबले में कामयाबी खो बैठता है। ऐसा ही मीडिया के साथ होता है। हर कुछ महीनों में नए अखबार, नए टीवी चैनल शुरू होते हैं, और वे एक आंधी की तरह पहले के टीवी चैनल और अखबारों के पांव उखाडऩे में लग जाते हैं। जिस तरह समंदर में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, तो आज खबरों में जो टीवी-18 नाम का मीडिया समूह है, उसने हजार करोड़ से अधिक का पूंजीनिवेश करने के बाद मुकेश अंबानी यह तो चाहेगा ही कि वहां से उसे कमाई अधिक से अधिक हो, या वहां पर घाटा कम से कम हो। पत्रकारों और बाकी मीडिया कर्मचारियों को एकमुश्त नौकरी से निकालने के पीछे शायद यही वजह है। 
इसी मौके पर एक दूसरी बात यह उठ रही है कि आज जिस तरह का पैसा मीडिया कारोबार में आ रहा है, उस आंधी के सामने सिर्फ मीडिया कारोबार टिक भी नहीं पाएगा। आज एक-एक मालिक के तहत दर्जनों प्रदेशों में सौ-पचास संस्करण वाले अखबार खड़े होते दिख रहे हैं। आज कम्प्यूटरों और संचार तकनीक के चलते एक जगह बनी खबरें हर संस्करण में, अखबारों की खबरें टीवी पर, टीवी की खबरें अखबारों में, और इन दोनों की खबरें इंटरनेट पर। एक ही मालिक के तहत अब खबरों का इतना बड़ा कारोबार हो चुका है कि आने वाले दिन लोकतंत्र इनके दरवाजे पानी भरते दिखेगा। और देश का आज का उदार-बाजार कानून इन पर कोई रोक भी नहीं लगाता है। 
दूसरा खतरा मीडिया पर यह है कि वह अब अपनी अर्थव्यवस्था पर नहीं चलता। उसमें पैसा किसी दूसरे कारोबार का, किसी दूसरे कारोबार को बढ़ाने के लिए लगता है, और पाठक या दर्शक इस कारोबार से बनता सामान भारी रियायत पर चाहते हैं। दस रूपये से अधिक में तैयार होने वाला अखबार जब दो रूपये में पाठक को चाहिए, तो फिर इसमें उसे आठ रूपये की मिलावट करने वाले बाजार से शिकायत का हक भी नहीं रह जाता। और दरअसल हकीकत तो यह है कि ऐसी कोई शिकायत अधिकतर पाठकों या दर्शकों को है भी नहीं। अधिकतर लोग यह देखना-समझना भी नहीं चाहते कि यह रियायत कहां से आ रही है। जो लोग गरीबों के दाने की रियायत के खिलाफ बौखलाए हुए हैं, उनको खुद इश्तहारी और कारोबारी रियायत की मेहरबानी से मिट्टी के मोल मिलने वाले समाचार-विचार में कोई बुराई नहीं दिखती। 
अखबारों के पाठक अखबार के साथ कुर्सी, बैग, दस दूसरे किस्म की चीजें मुफ्त में पाकर भी खुश रहते हैं। ऐसे बाजार में ऐसे ही अखबार मिल सकते हैं जो कि देश की कुर्सियों तक बैग के आने-जाने के कारोबार में भागीदार हों। इसलिए आज मीडिया के बाजार में जितने किस्म के कारोबारी मुकाबले हैं, उनमें से अधिकतर न तो मीडिया के कारोबार की कमाई से लड़े जा रहे हैं, और न ही इस लड़ाई का मकसद मीडिया के कारोबार में कमाना है। मीडिया के कारोबार में कमाना, और मीडिया के कारोबार से कमाना, ये दो बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं, लेकिन जब जनता के बीच राजनीतिक चेतना कम होती है, तो ऐसी बहुत सी बातों का फर्क खत्म ही हो जाता है। 
जब मीडिया में एक बड़ा पूंजीनिवेश होता है, और जब वह किसी भी दूसरे कारोबार के अंदाज में काम करता है, तो यह जाहिर है कि उसके तौर-तरीके भी किसी भी दूसरे कारखानेदार की तरह बेरहम ही होंगे। इसलिए थोक में बर्खास्तगी कोई हैरान करने वाली बात नहीं है, और दिल्ली की इस बार की सैकड़ों की बर्खास्तगी आखिरी भी नहीं है। इस कारोबार में जिस तरह छोटी-छोटी दुकानों को जोड़कर बड़े-बड़े बाजार बन रहे हैं, तो जाहिर है कि उनको चलाने के लिए कारोबारी को लोग कम लगेंगे, और आज के बाजार में लोगों को कम किए बिना कोई कारोबार चलने का वक्त भी नहीं रह गया है। सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश हो, वहां पर मीडिया में भारी छंटनी चल रही है, और अमरीका में न्यूज वीक जैसी अस्सी बरस पुरानी पत्रिका नए मालिक को एक डॉलर में बेच दी गई, और इसका प्रिंट एडीशन अमरीका में बंद कर दिया गया।
कुछ लोग इस गलतफहमी में भी रहते हैं कि मीडिया का कारोबार बाकी धंधों से कुछ अलग है। यहां फिर एक बारीक फर्क को समझने की जरूरत है। पत्रकारिता या अखबारनवीसी का पेशा दूसरे पेशों से अलग हो सकता है, लेकिन मीडिया का कारोबार पत्रकारिता नहीं है, अखबारनवीसी नहीं है। पेशा पेशा है, और कारोबार कारोबार है। किसी कारोबार से पेशे जैसे बर्ताव की, सिद्धांतों की उम्मीद करना फिजूल की बात है, जिस तरह किसी पेशे में रहते हुए वैसे पेशेवर लोगों से कारोबार न करने की उम्मीद की जाती है। 
आने वाले दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही खतरनाक हैं। बाजार तो ठीक है उसकी मीडिया से अपनी अलग किस्म की उम्मीदें होती हैं, और मीडिया के साथ उसका बर्ताव भी इन उम्मीदों के पूरे होने पर ही टिका होता है, लेकिन आज हिंदुस्तान में सरकारों की सोच भी बाजार की तरह हो गई है, और अच्छे और बुरे मीडिया के बीच सरकारी नजरों में कोई फर्क नहीं रह गया है। जब लोकतांत्रिक सरकारों की नजरों में मीडिया का आकार ही अकेला पैमाना रह जाता है, और जब इन सरकारों के बनाए कानून मीडिया की मिल्कियत के बढ़ते हुए समाचार-विचार पर साम्राज्यवादी एकाधिकार को रोकने की कोई गुंजाइश नहीं रखते, न ही इन सरकारों की इसमें कोई दिलचस्पी दिखती, तो फिर हिंदुस्तानी मीडिया पर कब्जे के लिए विदेशी वालमार्ट की  भी जरूरत नहीं है। देशी वालमार्ट हर किस्म के मीडिया पर देश के हर हिस्से में कब्जा करते दिख रहे हैं, और इस कब्जे के लिए अपने दूसरे धंधों से पूंजी लाकर, उन दूसरे धंधों को बढ़ाने के लिए हथियारों से लैस दिख रहे हैं। 
पूरी दुनिया में वालमार्ट और उसके किस्म के दूसरे कारोबार अपने कर्मचारियों को औजारों की तरह, पुर्जों की तरह इस्तेमाल करने के लिए बदनाम हैं। हिंदुस्तान का मीडिया कानून अगर वालमार्ट खड़े होने दे रहा है, तो उसके पास तो मजदूर कानून नाम की कोई असरदार चीज भी नहीं है जिसका इस्तेमाल करके कर्मचारी बच सकें। और आखिर में एक बात यह भी कि जब सरकार और बाजार मिलकर यह तय करने की ताकत रखते हैं कि मीडिया में क्या छपे, क्या दिखे, तो फिर पत्रकारों की जगह मैनेजर रखना बेहतर है, जिनका पेशा अखबारनवीसी न होकर मैनेज करना रहता है। वे अपने पेशे को ईमानदारी से करते हुए भी मालिक के लिए कोई दिक्कत खड़ी नहीं करते।

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