12 सितंबर 2013
संपादकीय
भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी की घोषणा आखिरी दौर में दिखती है। पार्टी से छनकर बाहर आने वाली खबरें अगर सही मानकर उस पर लिखें, तो लगता है कि भाजपा के आज के सबसे बड़े, और चलते-फिरते नेता लालकृष्ण अडवानी पूरी तरह, और बुरी तरह अकेले हो गए हैं। उनकी बातें पार्टी के हित की और देश के हित की हो सकती हैं, लेकिन वे नदी के बहाव के खिलाफ तैर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी ने पिछले बरसों में जिस तरह अपने-आपको इस पार्टी का, आक्रामक हिंदुत्व का, सबसे कामयाब नेता साबित किया है, उस अंधड़ के सामने अडवानी ही नहीं, भाजपा के मोदी से बड़े कई दूसरे दिग्गजों के पांव भी पूरी तरह से उखड़ चुके हैं। आज की भाजपा न तो पार्टी के व्यापक हित पर किसी बहस के लिए तैयार है, और न ही एनडीए के भविष्य पर। इन दोनों को एक खतरे में डालने की कीमत पर भी आज भाजपा के बहुमत को, सिर्फ मोदी की चाह है। और भाजपा के बाहर जो लोग हिंदुत्व की विचारधारा वाले हैं, कांगे्रस और यूपीए से थके हुए हैं, भारत के बीच के हिंदीभाषी हिस्से में रहते हैं, जिनको धर्मनिरपेक्षता के मुकाबले अर्थव्यवस्था अकेले ही लोकतंत्र के लिए काफी लगती है, जिनके मन में पड़ोसियों को लेकर युद्धोन्माद है, ऐसे सारे लोगों को अकेले मोदी में उम्मीद का सूरज दिखता है। ऐसी चकाचौंध रौशनी के बीच भाजपा के भीतर अडवानी तकरीबन अकेले रह गए हैं, और शायद वक्त के सैलाब के खिलाफ उनका यह रूख आने वाले दिनों में उनके पांव पूरी तरह उखाड़ देगा। जिंदगी की कड़वी हकीकत में सही और गलत अगर वोटों की गिनती से तय होते हैं, तो भाजपा के भीतर अडवानी की जमानत जब्त हो चुकी है।
मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने से भाजपा और एनडीए के अलग-अलग चुनावी नतीजों पर किस तरह का फर्क पड़ेगा, इसकी चर्चा का माहौल भाजपा के भीतर नहीं रह गया है। और एनडीए के भीतर बाकी पार्टियों का इतना वजन नहीं है कि वे मोदी का विरोध करते हुए एनडीए के बाहर जाएं, और अपनी कोई दूसरी जगह तलाश लें। इसलिए एनडीए गठबंधन की सबसे बड़ी भागीदार भाजपा के फैसले को नामंजूर करने वाले नीतीश जैसे लोग अब गठबंधन में नहीं बचे हैं, और बाकी साथी की इसी बेबस चुप्पी, या सहमति, को गिनते हुए भाजपा मोदी को कंधे पर चढ़ा चुकी है। वंशवाद पर आधारित पार्टियों को छोड़कर बाकी हर पार्टी की जिंदगी में एक वक्त ऐसा आता है जब उसे बुजुर्गियत की सफेदी को सम्मान सहित विसर्जित करना पड़ता है। आज भाजपा ऐसे ही कगार पर आ खड़ी है। इतनी बड़ी यह पार्टी अपने भले और बुरे को बेहतर समझती है, इसलिए उसके इस फैसले पर हम यहां कुछ कहना नहीं चाहते। अधिक से अधिक राजनीतिक विश्लेषण के किसी कॉलम में शायद इस बारे में कुछ लिखा जाए, लेकिन मोदी अब भाजपा की नियति बन चुके थे, इसलिए उनकी अपनी नीयत चाहे जो हो, उनके अलावा भाजपा के पास इस दौर में अगुवाई करने वाले दूसरे कोई नेता बचे नहीं थे, या कम से कम पार्टी को पूरे देश में मतदाताओं का धु्रवीकरण करने के लिए मोदी के टक्कर का कोई दूसरा नेता पार्टी के भीतर दिख नहीं रहा था। इसलिए राष्ट्रीय मामलों की सबसे अधिक समझ रखने वाले कई नेताओं को छोड़कर भाजपा ने मोदी को अपना चुनाव चिन्ह बनाया है।
देश में मोदी के भावी प्रधानमंत्री बनने को लेकर एक हड़कंप मचा हुआ है। साम्प्रदायिकता से नफरत करने वाले लोग मोदी की शक्ल में पूरे हिंदुस्तान में मुजफ्फरनगर बनते देख रहे हैं। लोगों की नजरों का यह खतरा सही साबित होगा, या गलत, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन पकते हुए चावल की हांडी का एक दाना, अमित शाह की शक्ल में उत्तरप्रदेश में एक मुजफ्फरनगर के पीछे खड़ा हुआ दिख तो रहा है। लेकिन लोकतंत्र अदालती सजा के पहले तक हर किसी को जनता की अदालत में जोर-आजमाईश का हक देता है, और मोदी हों या अमित शाह, किसी का यह हक छीना तो नहीं जा सकता। इसलिए एक वक्त अटल-अडवानी में से अधिक कट्टर समझे जाते लालकृष्ण अडवानी आज मोदी के मुकाबले नरम माने जाकर कांगे्रस तक की जुबानी हमदर्दी पा रहे हैं। आगे-आगे देखें, होता है क्या...

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