पे्रम, सेक्स, और हत्याएं

15 सितंबर 2013
संपादकीय
भारत के जुर्म के आंकड़ों को देखें, तो सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि प्यार और यौन-संबंधों में होने वाली हत्याएं, देश में हत्याओं की तीसरी सबसे बड़ी वजह है। पिछले बरस हुई साढ़े तेरह हजार हत्याओं में से ढाई हजार से अधिक हत्याएं इसी वजह से हुई हैं। और ये मामले बाकी मामलों से कुछ अलग इसलिए भी होते हैं कि  ऐसी हत्याओं को रोक पाना पुलिस के बस में नहीं होता। जहां पर पति-पत्नी को मार रहा हो, या मां-बाप पे्रम विवाह करने वाली लड़की को मार रहे हों, वहां पर पुलिस किस तरह अपराध को रोक सकती है? इसलिए आज समय इस बात का है कि भारतीय समाज में किस तरह ऐसे सामाजिक तनाव को कम किया जाए जिससे कि ऐसी मौतें रूकें। यहां यह भी समझने की जरूरत है कि पे्रम और सेक्स संबंधों की वजह से अगर हत्याएं होती हैं, तो पे्रम और सेक्स को भारतीय लोगों की जिंदगी में एक स्वाभाविक छूट मिलने की जरूरत है। इसके बिना तनाव के चलते, झूठी शान के चलते ऐसी हत्याएं होती हैं। 
कल ही दिल्ली में निर्भया बलात्कार कांड के मुजरिमों के वकील ने बहुत ही गंदी जुबान में यह कहा कि उसकी लड़की अगर पे्रम करती, या रात में अपने लड़के-दोस्त के साथ बाहर निकलती तो वह अपनी बेटी को जलाकर मार डालता। एक वकील जब ऐसे नाजुक मौके पर ऐसा भयानक हिंसा सार्वजनिक बयान देता है, तो उससे देश के मां-बाप के एक तबके की सोच तो दिखती ही है। इसके अलावा हम हर कुछ हफ्तों में देखते हैं कि किस तरह कहीं खाप पंचायतें, तो कहीं कोई और जाति संगठन किस तरह बलात्कार से लेकर कत्ल तक की हिमायत करते हैं, और सामाजिक सजा सुनाते हुए किसी को मौत देते हैं, तो किसी को बलात्कारी से शादी की सजा देते हैं। यह देश एक बहुत दकियानूसी सोच का शिकार है, और जिन लोगों को भारतीय संस्कृति पर बहुत गर्व है, वे लोग भी कृष्ण की पे्रम-लीलाओं के हजारों लाखों बरस बाद भी उससे कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं, न रास लीला उन्हें सुहाती, और न ही गंधर्व विवाह। 
हम अधिक फिक्रमंद इसलिए हैं कि पे्रम और सेक्स को लेकर अगर देश में हर बरस ढाई हजार से अधिक कत्ल हो रहे हैं, तो इससे दसियों हजार गुना अधिक, यानी करोड़ों लोग पे्रम और सेक्स को लेकर भड़ास में जी रहे होंगे। जहां समाज लोगों को अपनी मर्जी के रिश्तों की इजाजत नहीं देता, धर्म और जाति के बाहर जाकर पे्रम और शादी करने की इजाजत नहीं देता, वैसा हिंसक रूख इस देश में जाति-व्यवस्था को तोडऩे भी नहीं देता, और उसे बनाए रखने का काम करता है। दिक्कत यह है कि जिन राजनीतिक दलों का सत्ता पर कब्जा होता है, और सत्ता के साथ-साथ विपक्ष पर कब्जा होता है, उन सबको कट्टरपंथी लोग अधिक सुहाते हैं, क्योंकि वे भीड़ को एक जुट करके किसी गड्ढे की तरह ले जाने की ताकत रखते हैं। उनके मुकाबले उदारवादी लोग, खुली समझ वाले प्रगतिशील लोग कम असर रखते हैं, कम सक्रिय होते हैं, और वोटों के लिए काम के नहीं होते हैं। 
भारत में लोगों की जरूरत पे्रम और सेक्स को लेकर जैसी है, वैसी उनकी जरूरत पूरी होने की सामाजिक संभावनाएं नहीं हैं। लोग वयस्क मनोरंजन नहीं पा सकते, देश के अधिकांश हिस्से में पे्रमी-जोड़े बाग-बगीचों में बैठ नहीं सकते, पैसे देकर देह पाना इस देश में गैरकानूनी है, नतीजा यह होता है कि पे्रम से लेकर सेक्स तक की जरूरत के लिए सामाजिक या कानूनी अपराध करना एक किस्म से जरूरी हो जाता है। यह तस्वीर बदलने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं है, इसके लिए राजनीतिक दलों में एक सुधारवादी इच्छाशक्ति भी होना जरूरी है। इस बारे में अगर सोचा नहीं गया, तो हो सकता है कि अगले कुछ बरसों में पे्रम और सेक्स की वजह से होने वाली हत्याएं देश में सबसे अधिक हत्याएं गिनी जाएंगी।

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