फौज की मनमानी को लेकर आई खबरें, जनता को जानने का हक

संपादकीय
20 सितंबर 2013
दिल्ली में आज एक प्रमुख अखबार इंडियन एक्सप्रेस में यह रिपोर्ट छपी है कि पिछले थलसेनाध्यक्ष वी.के. सिंह ने सेना की खुफिया यूनिट का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर में सरकार पलटने की कोशिश की थी। इस यूनिट को जनरल सिंह ने ही खड़ा किया था, और इसके बारे में कई आरोप सामने आए हैं कि किस तरह इसने गड़बडिय़ां कीं, और सिंह के बाद थलसेनाध्यक्ष बनने की संभावना रखने वाले जनरल बिक्रम सिंह को रोकने की कोशिश की। यह खबर इसलिए बहुत गंभीर है कि भारत के लोकतंत्र में सेना की जगह निर्वाचित राजनीतिक प्रक्रिया के मातहत, उसके कहे मुताबिक ही काम करने की है, न कि अपनी मर्जी से कुछ करने की। भारत का लोकतंत्र इसी आधार पर गढ़ा गया है, और चल रहा है कि यहां सेना की कोई राजनीतिक महत्वाकाक्षाएं न रहें। 
दरअसल इस खबर के आने का वक्त कुछ ऐसा है कि लोगों को यह शक होता है कि केन्द्र की यूपीए सरकार ने भाजपा के नरेन्द्र मोदी के साथ अभी आमसभा में मंच पर जाने वाले जनरल वी.के.सिंह के खिलाफ किसी साजिश के तहत ऐसी कोई खबर लीक की हैं, या ऐसी कोई जांच बैठाई है जिससे कि मोदी के इस फौजी साथी को नीचा देखना पड़े। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले भी एक बार इंडियन एक्सप्रेस ने ही जनरल सिंह के खिलाफ एक बड़ी रिपोर्ट इसी तरह की छापी थी कि कैसे वे सेना में एक बगावती बेचैनी के पीछे थे, और किस तरह उनके उकसावे पर फौज की एक टुकड़ी दिल्ली की तरफ बढ़ भी गई थी। वह वक्त शायद जनरल सिंह का अन्ना हजारे के साथ जाने का था, और शायद उसी वक्त वे अपने बाद आने वाले थलसेनाध्यक्ष को लेकर कुछ असहमति भी रख रहे थे। 
भारतीय राजनीति में आज मीडिया का इस्तेमाल आम बात हो गई है, और इसके चलते मीडिया के अच्छे हिस्से ही ईमानदार मेहनत भी शक की नजर से देखी जाती है। इंडियन एक्सप्रेस ने पिछले एक-दो बरस में कुछ नाजुक मौकों पर ऐसी बड़ी धमाकेदार रिपोर्ट छापी हैं, जिनसे उस वक्त केन्द्र की यूपीए सरकार को मदद मिलते, या यूपीए के विरोधी लोगों को नुकसान पहुंचते दिखता था। अभी हम इस अखबार की नीयत पर शक नहीं कर रहे, क्योंकि आपातकाल के वक्त इसी अखबार ने इसी कांग्रेस पार्टी की प्रताडऩा सबसे अधिक झेली थी। रामनाथ गोयनका के वक्त से यह अखबार लड़ाकू तेवरों के साथ चलने वाला बना हुआ था, लेकिन हाल के बरसों में इसका रूख कभी-कभी लोगों को समझ नहीं भी आया। जिस तरह सरकार, विपक्ष, और राजनीति के फैसलों, और फैसलों के वक्त को लेकर लोगों के मन में शक होते हैं, उसी तरह मीडिया को लेकर भी शक नाजायज नहीं है। मीडिया का एक हिस्सा हमेशा से राजनीति का औजार या हथियार बनने में फख्र हासिल करते आया है, और भुगतान भी। इसलिए मीडिया के किसी अभियान के पीछे उसकी अपनी साख भी जरूरी होती है। 
जो लोग मीडिया के कामकाज के जानकार हैं, वे इस बात को समझते हैं कि जब ऐसी कोई बहुत बड़ी रिपोर्ट आती है, बहुत बड़ा सनसनीखेज भांडा फूटता है, तो उसके बाद बहुत से और खुलासे सामने आने की उम्मीद भी की जाती है। किसी एक मौके पर धमाकेदार खुलासे के बाद, उसे हवा में छोड़कर मीडिया अगर आगे बढ़ जाए, तो उसकी साख कमजोर भी पड़ती है, और उस ब्रांड के अलावा मीडिया के पूरे पेशे और कारोबार की साख भी मार खाती है। इसलिए जनरल वी.के. सिंह के बारे में आई हुई इस रिपोर्ट की और जानकारियां सामने आना जरूरी है। यह सरकार के लिए भी जरूरी है, और मीडिया के लिए भी जरूरी है। जनरल सिंह के लिए तो जरूरी है ही। देश के लिए किसी पार्टी के नफे-नुकसान से ऊपर यह बात है कि फौज सरकार से परे अपनी मर्जी के काम तो नहीं करने लगी है? हिन्दुस्तान में पाकिस्तान की जमीन से होने वाली किसी भी साजिश के पीछे वहां की फौज की खुफिया एजेंसी आईएसआई का नाम उसी तरह लिया जाता है, जिस तरह घर के किसी शरारती बच्चे का नाम किसी भी गलत काम के लिए जोड़ दिया जाता है। अब अगर हिन्दुस्तानी फौज के भीतर भी उसके जनरल की साजिश या मनमानी से, खुफिया यूनिट लोकतंत्र के खिलाफ काम करती है, तो यह मुद्दा मोदी या भाजपा की संभावनाओं से कहीं अधिक अहमियत रखता है, और खतरनाक है। इस देश को कुछ महीने पहले के सेना के बगावती रूख और कार्रवाई का दावा करने वाली रिपोर्ट पर भी आज तक सफाई नहीं मिली है, और यह दूसरी खतरनाक बात सामने आ गई है। लोकतंत्र ऐसी खतरनाक बातों पर जवाब के बिना नहीं चल सकता, इसलिए बेहतर यह होगा कि यूपीए सरकार इन दोनों घटनाओं को लेकर एक श्वेत पत्र सामने रखे। 

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