घने अंधेरे में रौशनी के लिए खिड़की तो खोलो

संपादकीय
10 सितंबर 2013
आए दिन हत्या बलात्कार, भ्रष्टाचार, जनता की लाचारी की खबरें पढ़-पढ़कर खिन्न हुए मन को कुछ खबरें बहुत सुकून दे गई। इनमें से एक भारत की एक देवदासी की बेटी श्वेता कट्टी का न्यूयॉर्क के एक कॉलेज में मनोविज्ञान पढऩे के लिए कोई 33 लाख रुपये की छात्रवृत्ति जीतने की खबर थी। कोलकाता में देह व्यापार की मंडी सोनागाछी से एक नशेडी बाप और यौनकर्मी मां के बच्चे के, अमरीका में स्कूली और कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद हॉलीवुड फिल्मों के निर्माण में लग जाने की खबर भी या झारखंड में गरीब परिवार की लड़कियों के तमाम मुश्किलें पार करके किशोरियों का विश्व फुटबॉल मुकाबला जीत लेने की खबर। पंजाब में होजियरी फैक्ट्री में काम करने वाले एक गरीब कामगार गुरनाम सिंह के तीन बच्चों में से एक एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करके डॉक्टर बन गई, जबकि उनकी एक और बेटी और बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके गुडगांव की बड़ी फर्मों में अच्छी नौकरियां कर रहे हैं। पिछले दिनों पंजाब के ही एक दिहाड़ी मजदूर की बेटी के 13 बरस की उम्र में ही एमएससी तक पहुंच जाने की खबर थी, तो बंगलौर में, घरों में सालों तक सुबह का अखबार पहुंचाने वाले युवक के इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके आईआएएम कोलकाता, और चेन्नई में  इडली बेचकर घर चलाने वाली एक महिला के बेटे के आईआईटी मद्रास होते हुए आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ निकलने के किस्से भी सुने हुए हैं। मुश्किलों के बीच कड़ी मेहनत के बूते जिंदगी में कहीं पहुंचने वाले इन बच्चों के अलावा उन लोगों के किस्से भी है, जो इनका हाथ थामकर इन्हें आगे बढऩे में अपनी छोटी-बड़ी भूमिकाएं अदाकर रहे हैं। चाहे वह यौन कर्मियों के बच्चों पर फिल्में बनाने वाले अमरीकी फिल्मकार हो, इन बच्चों के स्कूली शिक्षक हो, या भारतीय, विदेशी उद्यमी, कोच। सबमें एक बात समान है, कि वह किसी मुश्किल के लिए हालात का रोना रोने की बजाए सही दिशा में कड़ी मेहनत करते हंै, और अपनी और दूसरों की जिंदगियां बदल देते हैं।
ऐसे हालात में जब भारत में हर तरफ निराशा का माहौल है, जब युवकों के पास ऊंची पढ़ाई के बाद भी मनमाफिक नौकरियां नहीं है, अपने समाज पर शर्मिन्दा होने के लिए बड़े नेताओं, हस्तियों की काली करतूतें हैं, ऐसे में इस तरह की खबरें ऑक्सीजन की तरह लगती है, और यह भी बताती है कि जिंदगी में अपनी मुश्किलों से उबरने, हालात सुधारने के लिए सुविधाओं से ज्यादा इरादों, और हौसलों, की जरूरत होती है। आज बात-बात पर आरक्षण के कारण अपने हक छिन जाने की बात करने वाले, इन युवाओं की मिसाल ले सकते हैं, जिन्होंने किसी आरक्षण की मदद लिए बिना मिसाले पेश की है। हरियाणा की बहुत सी महिला खिलाडिऩे ऐसी हैं, जो खेतों में अपने माता-पिता के साथ मजदूरी करते हुए अपना अभ्यास जारी रखती है, और राष्ट्रीय स्तर पर खेल रही है। स्कूल की बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे आने पर एक न एक ऐसी मिसाल सामने आ ही जाती है जिसमें किसी बहुत छोटा-मोटा काम करने वाले व्यक्ति के बच्चे के बिना कोई सुविधा, कड़ी मेहनत और अध्यापकों के सहयोग से मेरिट में आने का जिक्र होता है। अफसोस की बात यह है कि इन मु_ीभर लोगों से प्रेरणा बहुत कम लोग लेते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के नतीजे आने पर ही मीडिया इन्हे ढूंढकर लोगों के सामने  इनकी कहनियां पेश करता तो है, लेकिन बहुत जल्द इन्हें भुला दिया जाता है और  अपनी बदतर स्थिति, नाकामियों के लिए बहाने खोजने का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।
हम यह नहीं कहते कि देश के युवाओं की बदहाली के लिए देश चलाने वालों, या कानून बनाने वालों का कोई कुसूर नहीं। लेकिन यह नहीं भूला जा सकता कि इन्हीं हालात से ऊपर उठकर अपने सपने सच करने वाले लोग भी हमारे आसपास ही है। उनके जितनी कड़ी मेहनत नहीं कर पाने वाले उन्हें अपवाद या किस्मतवाला करार देकर अपना रोना जारी रखना चाहे, यह अफसोसनाक है। आगे बढऩे के मौके मिलना जरूरी है, इसमें शक नहीं, लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कड़ी मेनहत से, सबसे श्रेष्ठ , सबसे बेहतर काम करने की लगन हो, और वह ऐसा कर पाए। वरना मौका मिलने पर भी कोई कुछ नहीं कर सकता। ऐसा करने वालों को अपवाद कहकर परे रख देने की बजाए, उनकी कहानियां प्रचारित करने की जरूरत है, क्योंकि इनसे प्रेरणा लेकर आगे बढऩे वाले किसी एक में दूसरे सैकड़ों लोगों की जिंदगियां संवार देने की संभावना छिपी हो सकती है। इन दुर्लभ लोगों में कोई अब्राहम जॉर्ज भी हो सकता है जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बूते नाम और दौलत कमाने के बाद देश के गरीब दलित  बच्चों की जिंदगियां संवारने का मौका उठाया है, या हजारों गरीब आदिवासी बच्चों को गरीबी अशिक्षा से उबार रहे अच्युत सामंता भी। समाज से जो पाया उसमें से कुछ वापस देने और प्रतिभा, और कड़ी मेहनत की कद्र करने के साथ ही सबसे बेहतर तरीके से काम करने की ललक को भी हासिल करने लायक खासियत के रूप में प्रचरित करना जरूरी है। तभी देश में दोयम दर्जे की जगह बेहतरीन दर्जे के काम करने वाले पनप सकेंगे।  
हमारा मानना है कि स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में ऐसे प्रेरित करने वाले किस्सों को जगह मिलनी चाहिए बच्चों के साथ काम करते एनजीओ, या स्कूल भी अपने स्तर पर इस दिशा में बहुत कुछ कर सकते हंै- जैसे स्थानीय स्तर पर ऐसी कोई मिसाल बच्चों के आगे पेश करना, उसका सम्मान करना महिलाओं के लिए काम करती संस्था सेवा में ऐसी महिलाओं की जीवनियों का दस्तावेजीकरण करके उन्हें एक किताब की शक्ल में पेश किया भी है, जिन्होंने भयंकर गरीबी और पिछड़ेपन से, केवल अपने पक्के इरादे, हौसले, कड़ी मेहनत और सूझबूझ के बूते अपनी ही नहीं, अपने परिवारों की आने वाली पीढिय़ों तक का भविष्य बदल डाला। अमूमन ऐसी कहानियां एनजीओ केवल अपने दानदाताओं को रिझाने, या अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इनमें देश में बदलाव लाने का माद्दा है। इनकी ताकत को पहचान कर इनसे प्रेरणा लेने, और देने, दोनों की जरूरत है। स्कूलों, एनजीओ के अलावा महिला क्लब भी अपने रोजाना के ढर्रे से अलग ऐसे कोई काम हाथ में ले सकते हंै। यह आज निराशा भरे माहौल में सुबह की उजली किरण की तरह, भ्रष्टाचार, अपराधों से खदबदाते देश की सडांध में ताजा हवा के झोंके से है, जिनमें बहुत कुछ करने की ताकत है। इस औजार को आजमाने की जरूरत है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें