बाजार का हमला और इंसानी समझदारी

19 सितंबर 2013
संपादकीय
ट्विटर पर किसी एक धारदार सोच वाले ने लिखा है कि उसने आईफोन का नया मॉडल खरीदना तय कर लिया है, क्योंकि जिंदा तो एक किडनी के सहारे भी रहा जा सकता है। आज बाजार से नए-नए सामान खरीदने की दीवानगी देखने लायक है। जिनके पास अधिक पैसा है, उनके पास सामानों को लेकर एक अंतहीन बेचैनी भी है। और बाजार है कि अपने हमलावर तेवरों के साथ हर सुबह लोगों की जिंदगी में एक नई बेचैनी बो देता है कि उनके पास आज जो सामान हैं, वे अब पुराने पड़ चुके हैं, और उनसे अधिक खूबियों वाले नए सामान आ गए हैं।
इस नौबत के कई पहलू हैं। एक तो यह कि बिना जरूरत सामानों को बदलते चलने से धरती पर कई किस्म का प्रदूषण बढ़ता है और ऐसा कचरा या कबाड़ अगले दस-बीस हजार बरस तक के लिए धरती पर बढ़ जाता है। दूसरा पहलू यह कि लोग अपना बहुत सा वक्त नए सामानों को इंटरनेट पर, या बाजार में देखने में लगाते हैं, और इसकी उनको कोई असल जरूरत नहीं रहती, बाजार की बोई हुई बेचैनी का शिकार होकर लोग लगातार नए सामान देखते चलते हैं। और जो देश जितने अधिक संपन्न हैं, जितने अधिक हमलावर बाजार के शिकार हैं, वहां पर ऐसे नए सामानों के लिए ग्राहकों की कतारें उतनी ही लंबी लगती हैं। 
आज हालत यह है कि लोग अपने मौजूदा कैमरे, मौजूदा मोबाइल फोन, मौजूदा म्यूजिक प्लेयर की क्षमता का पांच फीसदी भी इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं, और उसे बदलने की जरूरत बाजार खड़ी कर देता है। लोगों के ऐसे डिजिटल उपकरणों और कम्प्यूटरों की क्षमता, उनकी खूबियां, ग्राहक ठीक से समझ भी नहीं पाते, और नई खूबियों के साथ, अधिक क्षमता के साथ एक नई बेचैनी पेश कर दी जाती है। नतीजा यह होता है कि लोगों के पास जो है, उसका मजा लेने के बजाय, उसकी खूबियों का फायदा लेने के बजाय, लोग एक स्थाई बेचैनी में जीते हैं, और हासिल की हिकारत करते हुए, सपनों के पीछे दौड़ते हैं। ऐसे हमलावर बाजार का एक यह नुकसान भी लोगों को हो रहा है, किताबें जिंदगी से बाहर हो गई हैं, और पढऩे की डिजिटल स्लेट बढ़ती जा रही हैं। संगीत की समझ खत्म होती जा रही है, और संगीत बजाने की क्वालिटी बढ़ती जा रही है, उसे समाकर रखने की क्षमता बढ़ती जा रही है। जिंदगी में अपने भीतर जिन खूबियों को बढ़ाने पर लोगों का ध्यान होना चाहिए था, उसकी बजाय अब बढ़ी हुई खूबियों वाले सामान खरीदने पर लोगों का ध्यान खींचकर, घसीटकर, धकेलकर बाजार ले जाता है। इसलिए आज जिंदगी में उन बातों की अहमियत बाजार ने बढ़ा दी है जिनको कि खरीदा जा सकता है, और उन इंसानी खूबियों को एक किस्म से गैरजरूरी, या कम जरूरी साबित कर दिया गया है, जिनको पाने के लिए इंसानों को बाजार में कोई भुगतान नहीं करना पड़ता। 
आज ग्राहकों की कई पीढिय़ों को देख लें, तो लोगों को फोटोग्राफी की समझ नहीं है, कैमरों की खूबियों की जानकारी है। समझ की जगह अब जानकारी ने ले ली है। संगीत की समझ गैरजरूरी हो गई है, और संगीत का उपकरण जरूरी हो गया। बाजार को मूर्खों की ऐसी ही बस्ती सुहाती है जो मोटे बटुए वाली हो, और मोटी अक्ल वाली हो। आज ऐसे कितने मां-बाप हैं जो अपने बच्चों को सामानों के दामों के बजाय, जिंदगी के मूल्यों, कला और साहित्य की समझ, संगीत और फोटोग्राफी के पहलुओं की समझ की तरफ मोड़ पाएं? ऐसा करने में उनको खुद को भी अपनी समझ बढ़ानी पड़ेगी, अपने आपको जानकार और समझदार बनाना पड़ेगा। इसके बजाय बच्चों को एटीएम का कार्ड दे देना, या के्रडिट कार्ड दे देना अधिक आसान है, और ताकतवर तबका यही कर भी रहा है। लेकिन किसी भी आर्थिक क्षमता वाले तबके के चारों तरफ उससे कम क्षमता वाला ऐसा एक बड़ा दायरा भी ऐसी बेचैनी में जीता है जो कि अपने ऊपर के सामानों को देखकर खरीद न पाने की बेबसी में कुंठा और भड़ास का शिकार हो जाता है। सामानों की वजह से आज कहीं पर देह खरीदने की नौबत मिलती है, और कुछ लोग देह बेचते भी दिखते हैं। बाजार के इस हमले के मुकाबले इंसानी समझदारी भला कैसे जिंदा रह पाएगी? 

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