संपादकीय
23 सितंबर 2013
एक ही दिन में दो खबरें दिल दहला रही थीं। अफ्रीका के कीनिया में इस्लामी आतंकी एक मॉल में घुसकर गैरमुस्लिमों को छांट-छांटकर मार रहे थे, और अब तक शायद पौन सौ लोग मारे जा चुके हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान के पेशावर में कल एक ईसाई चर्च पर हुए इस्लामी आतंकी हमले में भी पौन सौ से अधिक लोग अब तक खत्म करार दिए गए हैं। ये दोनों ही मामले इस्लामी आतंकी संगठनों के हैं। बहस के लिए यहां पर कोई कह सकता है कि ये इस्लाम की नसीहत और सीख पर बने हुए संगठन नहीं हैं, और मजहब का सिर्फ नाम लेते हैं। लेकिन जब मजहब के नाम पर चारों तरफ ऐसे बहुत से हमले होते हैं, ऐसे बहुत से आतंकी संगठन खड़े हो जाते हैं, तो उनको पूरा मजहब न मानते हुए भी, उस मजहब से जुड़े हुए लोगों के बनाए हुए संगठन तो मानना ही पड़ता है। यह भी सोचना पड़ता है कि किसी एक मजहब, या किसी भी धर्म का नाम लेकर लोग कितने हमलावर हो सकते हैं, कितने हत्यारे हो सकते हैं। और उस मजहब के तहत ऐसे कातिलों के बने रहने की कितनी गुंजाइश मजहब के बाकी लोग दे सकते हैं, उन देशों का कानून उन्हें कितना बर्दाश्त कर सकता है, कब तक खुला रख सकता है।
यह बात सिर्फ इस्लाम का नाम लेकर जिहाद छेडऩे वालों की नहीं है, दूसरे धर्मों में भी कम या अधिक पैमाने पर इस तरह की बातें होती हैं, और हो सकता है कि उनमें लहू कम बहता हो या अधिक बहता हो, तबाही कम होती हो, या अधिक होती हो, लेकिन ऐसे धर्म कम नहीं है जो अपने आपको किसी देश या दुनिया के कानूनों से ऊपर मानते हों, और लोकतंत्र को नकार देते हों। आज न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि दुनिया के बहुत से लोकतांत्रिक देश धर्मान्धता की हिंसा के खतरे से गुजर रहे हैं। इसमें पश्चिम के बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर लोकतांत्रिक-सामाजिक उदारता के साथ धार्मिक कट्टरता का टकराव चले आ रहा है, और भारत सहित ऐसे कई देश अपने लोकतंत्र के भीतर ऐसी कट्टरता से निपटना मुश्किल पा रहे हैं।
कुछ लोग इसे संस्कृतियों का टकराव कहते हैं, लेकिन बात संस्कृतियों और पीछे तक जाती है, और ऐसी धार्मिक मान्यताओं पर पहुंच जाती है, जिनके साथ लोकतंत्र का सहअस्तित्व खासा मुश्किल है, असंभव भी है। जब धार्मिक मान्यताओं के आधार पर लोग अपने अलग और खास लोकतांत्रिक अधिकारों का दावा करने लगते हैं और अपने अधिकारों को दूसरों के अधिकारों से ऊपर करार देने लगते हैं, तब जो टकराव होता है, उसे सिर्फ संस्कृतियों का टकराव कहना ठीक नहीं होगा। भारत में हमने गांधी को मारने से लेकर, बाबरी मस्जिद गिराने तक, शाहबानो को मारने तक, स्वर्ण मंदिर में भिंडरावाले के डेरे तक, इंदिरा गांधी की हत्या तक, गुजरात के दंगों तक, बहुत से ऐसे मामले देखे हैं, जिनमें लोगों ने अपने धार्मिक अधिकारों को न सिर्फ दूसरों के धार्मिक अधिकारों के ऊपर माना, बल्कि देश के लोकतंत्र के, और संविधान के भी ऊपर माना। ऐसे में धार्मिक टकराव और साम्प्रदायिक तनाव को रोकना खासा मुश्किल हो जाता है।
आज कीनिया और पाकिस्तान में हुए इन हमलों को भारत के पुराने हादसों से जोड़कर भी समझने की जरूरत है। कश्मीर से जिस तरह कश्मीरी पंडितों को भगाया गया, और जो आज भी शरणार्थियों की तरह दिल्ली में रह रहे हैं, अपनी जमीन पर लौट नहीं पा रहे हैं। जिस तरह पंजाब के आतंक के दिनों में बसों और रेलगाडिय़ों से हिन्दुओं को उतारकर कतार में खड़ा करके एक साथ भून दिया जाता था, उसके सबक को आज याद रखने की जरूरत है। ऐसे और भी मामले जगह-जगह हिन्दुस्तान में हुए हैं, और हो रहे हैं। आज जरूरत दुनिया और इस देश में एक ऐसी वैज्ञानिक-लोकतांत्रिक सोच की है जो कि लोगों को लोकतंत्र के भीतर अपनी धार्मिक आस्था के साथ बिना हिंसा के जीना सिखा सके। धार्मिक-आतंकियों को यह भी समझना चाहिए कि वे अपनी ऐसी हरकतों से अपने देश पर दुनिया के ताकतवर गुंडा-देशों को कब्जे का न्यौता भी देते हैं। इनको यह भी समझना चाहिए कि अपने धर्म के नाम पर हिंसा करके वे अपने धर्म की बेइज्जती भी करवाते हैं, और उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती।
कीनिया और पाकिस्तान के हमलों को उन देशों का मामला मानकर हिन्दुस्तान अगर उनकी अनदेखी करेगा, तो यह सबक से परहेज के बराबर होगा। हमने अभी-अभी उत्तरप्रदेश में धार्मिक आधार पर बड़े पैमाने पर न सिर्फ हिंसा और कत्ल देखे हैं, बल्कि हैवानियत कहा जाने वाला वह दर्जा भी हिंसा का देखा है, जिसे लोग इंसान का मानने से ही मना कर देते हैं। उत्तरप्रदेश में जिस तरह लोगों ने दूसरे धर्म के लोगों को मारा है, वह खूंखार तौर-तरीका तो कीनिया और पाकिस्तान के इन बड़े दिखते और लगते हमलों में भी सामने नहीं आया है। जब लोग अड़ोस-पड़ोस के बच्चों को भी टुकड़े-टुकड़े कर दें, तो उसे सिर्फ मौत के आंकड़ों में गिनना खतरनाक हकीकत की अनदेखी होगी। आज हिन्दुस्तान अपने मौजूदा चुनावी-राजनीतिक माहौल के चलते कई किस्म के अनदेखे और अनसुने खतरों की तरफ भी बढ़ रहा है। आने वाले दिन कई किस्म की नई नफरत की फसलों के हो सकते हैं। इसलिए कीनिया और पाकिस्तान के खतरों को वहीं के मौत के आंकड़े मानकर खबरों के अगले दिन भुला देना ठीक नहीं होगा। और भारत अलग-अलग कई धर्मों, बोलियों, सम्प्रदायों और क्षेत्रीयता से भरा हुआ है, यहां पर सांस्कृतिक विविधता भी इतनी अधिक है कि उन्हें कोई टकराव मानना चाहे, तो कदम-कदम पर टकराव ही टकराव हो सकते हैं। और यह नौबत किसी राष्ट्रीय एकता परिषद में सुलझाने की नहीं है, इसके लिए ऐसी किसी बैठक के बाहर की हवा में घुले हुए, और घोले जा रहे जहर से निपटना पड़ेगा, और इसके लिए देश की धर्मनिरपेक्ष और सुधारवादी ताकतों को साथ आना पड़ेगा। यह ऐसा वक्त है जब वोटरों के बाहुबल के बिना भी वामपंथी दल अगुवाई करने की एक समझ रखते हैं, हक रखते हैं। अगर वामपंथियों द्वारा हमेशा से अमल में लाई जा रही धार्मिक उदारता और बराबरी की अहमियत आज नहीं समझी गई, तो हिन्दुस्तान कई कीनिया और कई पाकिस्तान देखेगा।

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