मोदी को किफायत और सादगी बढ़ानी चाहिए

29 मई 2014
संपादकीय

नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरकारी नियम-कायदों से परे दो बातें जो अपने साथी मंत्रियों को कही हैं, वे लोकतंत्र में जरूरी थीं, और उनके लिए देश-प्रदेश के सरकारों में खासी हिकारत रहती है। उन्होंने मंत्रियों से कहा कि वे अपने निजी स्टाफ में न तो रिश्तेदारों को रखें, और न ही गैरसरकारी कर्मचारियों को। इसके साथ-साथ उन्होंने दफ्तर और बंगलों पर फिजूलखर्ची न करने को भी कहा है। नरेन्द्र मोदी गुजरात छोड़कर दिल्ली आते वक्त अपने निजी पैसों में से 21 लाख रूपए छोटे कर्मचारियों के बच्चों की पढ़ाई के लिए देकर आए थे, और वे एक सादगी की जिंदगी के लिए जाने जाते हैं, इसलिए उनको ऐसी मसीहाई नसीहत देने का हक भी है। इसके साथ-साथ उन्होंने आज मंत्रिमंडल में दस सूत्रों का एक एजेंडा भी सामने रखा है, नई सरकार की अगले पांच बरस के लिए सामने रखी गई ऐसी सोच पर सोचने की जरूरत भी है। लेकिन ये बातें सरकारी कामकाज से जुड़ी हुई हैं, इसलिए आज यहां पर हम कुछ निजी बातों पर ही चर्चा सीमित रखना चाहते हैं, कि मोदी सरकार को अपना चाल-चलन कैसा रखना चाहिए।
दरअसल यूपीए सरकार की ऐतिहासिक हार को देखते हुए हमने इसी जगह उन तमाम बातों को लिखा था जिनकी वजह से यूपीए और कांग्रेस की हार इतनी बड़ी हुई थी। जब सत्ता यह सोच लेती है कि वह जनता के साथ, जनता के सामने, जनता के पैसों से, जैसा चाहे वैसा सुलूक कर ले, और जनता उस पर कुछ भी नहीं कर सकती, तो वैसी सरकार के दिन गिने-चुने बचते हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने आरएसएस के दिनों से सादगी पर चलने की बात करती थी, लेकिन हाल के दशकों में बार-बार सत्ता पर आने के बाद इस पार्टी की सरकारों से भी सादगी चली गई थी। लालबत्ती, एयर कंडीशनर, और फिजूलखर्ची, दौलत का दिखावा, इन तमाम बातों में भाजपा के लोग कांग्रेस के लोगों से कहीं भी पीछे नहीं रह गए थे, नहीं रह गए हैं। इस बार के आम चुनावों के नतीजों से सबक लेकर भाजपा को अपनी पार्टी के भीतर सार्वजनिक संस्कृति की रीति-नीति को दुबारा तय करना चाहिए, और इसमें हम गांधीवादी सादगी, और किफायत की सिफारिश करते हैं।
आज यह जाहिर है कि नरेन्द्र मोदी न सिर्फ भाजपा-एनडीए के मुखिया हैं, देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति हैं, बल्कि भाजपा संगठन के भीतर भी उनकी बात का सबसे अधिक वजन है, और उसका इस्तेमाल करके वे अपनी पार्टी की लकीर, कांग्रेस जैसी पार्टियों के मुकाबले अधिक बड़ी कर सकते हैं, और ऐसी नई संस्कृति पांच बरस बाद के चुनाव में, या फिर आने वाले महीनों-बरसों में होने वाले किसी भी राज्य के चुनाव में, स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में, उनकी पार्टी के काम आ सकती है। सरकार में किफायत की सोच को लाना इसलिए भी जरूरी है कि जनता बहुत गरीबी में बहुत मुश्किल से जी रही है, और जब वह सत्ता की फिजूलखर्ची को देखती है, तो कांग्रेस या भाजपा पर से ही नहीं, पूरे के पूरे लोकतंत्र से ही उसका भरोसा उठ जाता है, राजनीति के लिए उसके मन में नफरत हो जाती है।
किफायत को लेकर हम मोदी सरकार को, और भाजपा-कांग्रेस या किसी भी पार्टी की दूसरी सरकार को एक छोटी सी सलाह दे सकते हैं। जिस देश में हर दिन दस-बारह घंटे की बिजली कटौती बहुत से राज्यों में आम बात हो, वहां पर गरीब बच्चों के सौ-सौ घरों जितनी बिजली जब एक-एक सरकारी कमरा एयर कंडीशनर में खर्च करता है, तो वह लोकतंत्र नहीं रह जाता। इस माहौल को अगर नरेन्द्र मोदी बदल सकते हैं, तो यह एक बड़ी कामयाबी होगी। सत्ता के लोग मोटे-मोटे कोट और जैकेट पहनकर जब कमरों को भारी ठंडा करते हुए काम करते हैं, तो सामान्य वैज्ञानिक समझबूझ यह कहती है कि उनको कपड़े साधारण पहनने चाहिए, ताकि कमरों को उतना ठंडा रखने की जरूरत न हो। इसी के साथ-साथ कमरों के आकार को सीमित करना चाहिए, ताकि बिजली बचे। और बात महज बिजली बचाने की नहीं है, किफायत एक सोच होती है, और जब वह बिजली बचाने की तरफ मुड़ेगी, तो उस राह पर और दूसरे किस्म की फिजूलखर्चियों में भी कटौती करती चलेगी। नरेन्द्र मोदी को जनता के पैसों की ऐसी बर्बादी खत्म करके जनता का दिल जीतने का एक बड़ा मौका और मिल सकता है। जो अच्छा काम करे उसे अगर ऐसी शोहरत मिलती है, तो उसमें क्या बुराई है?

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