15 मई 2014
संपादकीय
कल इसी वक्त अगले पांच बरस के लिए देश की अगली सरकार के आसार साफ हो जाएंगे। हो सकता है कि नतीजे एकतरफा हों, और इसी वक्त कल तस्वीर साफ हो जाए, या हो सकता है कि कुछ घंटे और लगें। एक नौबत ऐसी भी हो सकती है कि जोड़तोड़ में कुछ दिन लग जाएं। लेकिन हम उस अटकल में लगे बिना आज यह सोच रहे हैं कि आज देश की जनता का मन क्या सोच रहा है?
पिछले दस बरसों की यूपीए-कांगे्रस सरकार के आखिरी के पांच बरस लोगों ने बड़ी तकलीफ से निकाले हैं। और उन तकलीफों के लिए जिम्मेदार मुद्दों को लेकर संसद में भाजपा की अगुवाई वाले विपक्ष में जितना हंगामा किया, उसकी वजह से संसद घिसट-घिसटकर चलती रही, और संसद से देश की जो उम्मीदें थीं वे पूरी नहीं हो पाईं, कानून बनने से रह गए, और लोकसभा ने अपने काम से अधिक वक्त बिना काम किए हुए गुजारा। सरकार तो बहुत स्थिर रही, और पूरे दस बरस सरकार बखूबी जारी रही, लेकिन वह सरकार देश को चला रही थी, या खुद चल भर रही थी, यह देश के लोगों ने खूब देखा हुआ है। इसलिए आज अगर लोगों की उम्मीद यह है कि एक मजबूत सरकार आए, और पांच बरस पूरे वक्त अच्छा काम करे, तो यह उम्मीद महज सरकार से पूरी नहीं हो सकती। इसके लिए विपक्ष की जरूरत भी होती है, जो कि संसद चलने दे, और सरकार की गलतियों पर उसके हाथ भी पकड़े। लेकिन पिछले बरसों में भारतीय संसद में विपक्ष ने वक्त की बर्बादी की जो मिसाल कायम की है, वह मिसाल कुछ दिन बाद कांगे्रस के काम आएगी, और कई किस्म के जरूरी या गैरजरूरी मुद्दों पर संसद का वक्त खत्म करना जायज करार दिया जाएगा।
हम लगातार यह बात लिखते हैं कि संसद का वक्त देश की जनता के खून-पसीने से दिया हुआ होता है, और उसे बर्बाद करने का मतलब न सिर्फ जनता के पैसों की बर्बादी है, बल्कि जनता की तकलीफों को उठाने के मौकों को नकारना भी है। ऐसे में एक बार फिर हम नई लोकसभा को लेकर यह बात कहना चाहेंगे कि भारतीय संसदीय व्यवस्था में एक जिम्मेदार रूख की जरूरत है, और गलत मिसालों को लेकर फिर दुबारा गलत काम करने के बजाय नई और अच्छी मिसालें कायम करना जरूरी है।
ब्रिटिश संसद की कार्रवाई को अगर टीवी पर देखें, तो यह समझ आता है कि किस तरह वहां जरूरी मुद्दों पर बहस चलते हुए पूरी तैयारी के साथ सांसद एक-एक पल का इस्तेमाल करते हैं, और अपने पक्ष की ताकत को साबित करने के लिए तथ्यों और तर्कों का सहारा लेते हैं, न कि गले की ऊंची आवाज और कागज फाडऩे, माईक तोडऩे वाले हाथ-पैर का। भारतीय संसद में बहुत से ऐसे अच्छे सांसद हमेशा रहते आए हैं जो कि गंभीरता से अपनी बात कहें, तो उसे सुनकर देश की जनता का एक बहुत अच्छा राजनीतिक शिक्षण होता है। और जनता के ऐसे शिक्षण के यह जरूरी है कि संसद में हंगामा खत्म हो, वहां पर सांसद गंभीरता से काम करें, और विपक्ष भी हंगामे के बजाय मुद्दों को उठाने में भरोसा रखे। हंगामा करने के लिए तो सड़क और फुटपाथ भी बहुत है। और आजकल तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मेहरबानी से हर शाम दर्जन भर समाचार चैनलों के स्टूडियो में भी हंगामा करने का मौका बढ़ गया है। ऐसे में संसद को एक बहुत गंभीर बहस के लिए, तर्क-वितर्क के लिए, और संसदीय कामकाज के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। आज ऐसा न होने पर एक सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि बड़े-बड़े ऐसे कानून बन रहे हैं, या ऐसे बड़े-बड़े संशोधन हो रहे हैं, जिन पर पर्याप्त चर्चा भी नहीं हो पाती। पूरा का पूरा संसद सत्र हंगामे में निकल जाने के बाद आखिर के कुछ दिनों में घंटे-घंटे में एक-एक कानून बन जाता है, और जो जनता इस संसद के हाथीपांव जैसे स्तंभों को अपने सीने पर ढोती है, उसकी फिक्र ऐसे कानून में रह नहीं जाती।
इसलिए अगली सरकार चाहे किसी की भी बने, अगली संसद एक बेहतर संसद बननी चाहिए, क्योंकि अगर संसद अपना नहीं करती, तो वह सरकार के लिए एक बड़ी सहूलियत की बात हो जाती है। और जिम्मेदार विपक्ष को किसी सरकार को ऐसी सहूलियत नहीं देनी चाहिए।

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