हादसों के बाद मुआवजों के बजाय बचाव की सोचें

14 मई 2014
संपादकीय
देश में अलग-अलग जगहों पर हुए सड़क हादसों, दूसरे किस्म के हादसों पर केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा तरह-तरह के मुआवजे की घोषणा होती है। कहीं बीमारी में या दंगे में मरने वाले लोगों के लिए, तो कहीं खदान हादसे में, तो कहीं नक्सल हिंसा में मारे जाने वाले लोगों की खबरें आने पर शायद उन खबरों के समाचार-महत्व के हिसाब से, या फिर उनसे कितने वोट प्रभावित हो सकते हैं, इस हिसाब से सरकारें मुआवजा देती हैं। किसी बड़े नेता के इलाके में ऐसा होने पर ऐसा मुआवजा बढ़ जाता है, और अगर कोई मौत खबरों में नहीं आई, तो कफन-दफन में ही घर के बर्तन बिक जाते हैं। नेताओं से विवेक का ऐसा अधिकार ले लेना चाहिए, और पूरे देश में मुआवजे की नौबत की किस्में तय कर लेनी चाहिए, और उन्हीं के हिसाब से मरने वालों के परिवारों को मदद दी जानी चाहिए। इसका दूसरा तरीका यह हो सकता है कि ऐसी तमाम नौबतों के लिए सरकार किसी बीमा योजना का सहारा ले, और सरकार के पास से मुआवजा देने, या न देने का हक भी खत्म हो जाए, और अलग-अलग किस्म की मौतों पर बीमे के पैमाने तय हो जाएं। 
लेकिन इस छोटे से एक पहलू पर आज की बात को हम और आगे बढ़ाने के बजाय यह चर्चा करना चाहते हैं कि ऐसी मौतों के पीछे की जो वजहें रहती हैं, उनमें गए बिना, उन नौबतों का विश्लेषण किए बिना, आगे के बचाव की तरकीबें निकाले बिना सिर्फ मुआवजा बांट देना बहुत ही नाकाफी है। हम अपने आसपास ही देखते हैं तो सड़कों पर इस छोटे से छत्तीसगढ़ में ही रोजाना दर्जनभर मौतें दिख रही हैं। अब किस तरह की स्थितियों में किनकी गलतियों से ऐसे सड़क हादसे होते हैं, इसका कोई विश्लेषण सरकार नहीं कर रही है। सरकार सिर्फ मुआवजा बांटकर अपना जिम्मा पूरा समझ रही है, और अगर मौतों की गिनती अधिक होती है तो राज्यपाल और मुख्यमंत्री की तरफ से शोक संदेश भी आ जाते हैं। लेकिन इससे आगे के हादसों के खतरे कम नहीं होते। हमारा मानना है कि राज्य में लगातार विश्लेषण का एक ऐसा इंतजाम रखना चाहिए जिससे कि यह समझ आए कि किस तरह की वजहों से हादसे अधिक होते हैं, किन जगहों पर अधिक होते हैं, किस वक्त पर अधिक होते हैं, किस तरह की गाडिय़ों से अधिक होते हैं, और ऐसे विश्लेषण के बाद ही बचाव के रास्ते निकल सकते हैं। 
लगे हाथों हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि सड़कें बेहतर होने के बाद, गाडिय़ां बड़ी-बड़ी और तेज रफ्तार आ जाने के बाद, सड़कों पर ट्रैफिक बढ़ जाने के बाद अब हादसों का खतरा तो बढऩा ही था। लेकिन ऐसे में सरकार के जो विभाग सड़कों पर ट्रैफिक के लिए जिम्मेदार हैं, वैसे परिवहन विभाग, और यातायात पुलिस का काम सुधारने की जरूरत है। आज इन दोनों विभागों में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है, और वैसे में किसी तरह के बचाव की बात नहीं की जा सकती। जो बात हम सुझा रहे हैं, वह मौतों पर मुआवजे के मुकाबले बहुत कम खर्चीली रहेगी, हादसों में घायल लोगों के सरकारी इलाज के मुकाबले भी बहुत कम खर्चीली रहेगी, और यही एक तरीका है कि लोग मरने से बचेंगे, या मरणासन्न जिंदगी जीने से बचेंगे। सरकार को सड़क दुर्घटनाओं के विश्लेषण, और उसके आधार पर बचाव की योजनाओं पर ध्यान देना चाहिए। 

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