चुनाव आयोग मतदाता की राय बचाए,या अपनी साख

संपादकीय
2 मई 2014

गांधीनगर में मतदान करके निकले नरेन्द्र मोदी का, भाजपा के चुनाव चिन्ह के साथ सेल्फी लेना, और मीडिया से बात करना, उन पर एफआईआर दर्ज करने की वजह बन गया।  कांग्रेस ने शिकायत की कि, मोदी ने चुनाव नियम तोड़े हंै,इसलिए उन पर मामला दर्ज किया जाए, वडोदरा और वारणसी से उनका नामांकन खारिज कर दिया जाए, और उन्हें गिरफ्तार किया जाए। गुजरात पुलिस ने मामले की शुरुआती जांच में कहा है कि मोदी ने मतदान केन्द्र के 100 मीटर के दायरे से बाहर जाकर यह सब किया, इससे जनप्रतिनिधि कानून नहीं टूटता है। भाजपा भी उनके बचाव में कह रही है कि मतदान देकर निकलते दूसरे नेताओं ने भी राजनीतिक बयान दिए हैं। उसका यह भी कहना है कि वोट डाल कर जनता की तरफ हाथ हिलाती मशहूर हस्तियों को क्या कांग्रेस का प्रचार करता माना जाना चाहिए? चुनाव आयोग द्वारा इस मामले में मीडिया पर भी आरोप लगाया गया है कि उसने मतदाताओं की राय प्रभावित करने की कोशिश की।
इस मामले में जहां कानून अपना काम करेगा, वहीं बहुत सी दूसरी बातों पर भी सोचना जरूरी है। एक तरफ चुनाव आयोग की चुस्ती और पारदर्शिता से जहां पिछले सालों में उसका कद और  दलों, और नेताओं के बीच उसका डर बढ़ा है, वहीं जनता का चुनावी प्रक्रिया में भरोसा भी बढ़ा है। इसका श्रेय चुनाव आयोग को  दिया जाना चाहिए, लेकिन चुनावी नियमों के पालन के लिए उसका नेताओं, मीडिया, राजनीतिक दलों,और जनता से टकराना भी जरूरी नहीं है। क्या उसे यह सोचने की जरूरत नहीं है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव थोड़ा बहुत लचीलापन, और व्यवहारिकता बरतकर भी करवाए जा सकते हैं?
इस व्यवहारिकता में यह सोचना भी आता है कि ऐसे समय में, जब चुनाव सवा महीने खिंच रहे हो, अपने चुनाव प्रचार का दमखम  बनाए रखना दलों की मजबूरी है, तो उसे जनता  के सामने रखना मीडिया का फर्ज, और व्यापार की मजबूरी, दोनों है। चौबीसों घंटे चलते इलेक्ट्रानिक मीडिया, इंटरनेट के अलावा सोशल मीडिया का राजनीतिक दल जैसा इस्तेमाल कर रहे हंै, उन्हें जिसमें तरह भुना रहे हंै, उस तेज तर्रार अंदाज के सामने, चुनाव आयोग की यह दलील अजीब नहीं लगती कि मतदान केन्द्र के सामने चुनाव चिन्ह लहराने, मीडिया से बात करने से मतदाता की चुनाव की आज़ादी प्रभावित हो जाएगी? क्या चुनाव आयोग यह सोचता है कि मतदाता ट्विटर, फेसबुक, वॉट्सएप, यू ट्यूब, टी वी चैनल इन सबसे अनछुआ, इतनी मासूमियत के साथ मतदान केन्द्र पहुंच रहा है कि किसी दल का चुनाव चिन्ह, या नेता की दो बातें सुनकर अपनी राय बदल देगा? क्या जनप्रतिनिधि कानूनों को इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर सूचनाओं, जानकरियों के विस्फोट से अलग करके लागू करना ठीक है?
चुनाव आयोग ने मतदाताओं की जागरुकता के लिए काफी मेहनत की है, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए उसका आग्रह वाजिब है, लेकिन इसके लिए जड़ता नहीं, व्यवहारिकता बरतने की जरूरत है। ऐसे समय, जब वह स्थानीय तंत्र के भरोसे , खासकर केंद्र में काबिज सरकार के विरोधी दल से शासित राज्य में काम कर रहा होता है, उसे अपनी खुद की साख, और अपने में जन सामान्य का भरोसा बनाए रखने के लिए ज्यादा समझदारी और चौकन्नेपन, और इससे भी  ज्यादा व्यवहारिक हो कर काम करने की जरूरत है। अगर वह ऐसी बातों में अपना समय बर्बाद करता है, जहां उसका फैसला गलत साबित होने का खतरा है, तो इससे उसकी साख तो कमजोर होती ही है, राजनीतिक दलों की डोर भी उसके  हाथ में ढीली पड़ती है, और चुनावी प्रक्रिया में जनता  का भरोसा भी टूटता है। मतदाता की स्वतंत्र राय और उसका भरोसा दोनों कितना, किस तरह बचाया जाए, यह तय करना एक मुश्किल काम हो सकता है, लेकिन चुनाव आयोग को इस मुश्किल से जूझना ही पड़ेगा। 

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