26 मई 2014
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में आज भारत की एक नई सरकार देश की पिछली किसी भी सरकार के मुकाबले कई मायनों में अलग होगी। जाहिर है कि पिछली करीब पौन सदी में बनी सरकारों के मुखिया उम्र में नरेन्द्र मोदी से बड़े तो रहे ही होंगे, लेकिन मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो कि आजाद भारत में पैदा हुए हैं। और अपने ठीक पहले के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुकाबले वे खासी कमउम्र के भी हैं। प्रधानमंत्री के दफ्तर में एक पूरी पीढ़ी का फासला आज शाम स्थापित होने जा रहा है।
नरेन्द्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो कि गैरकांग्रेसी हैं, और एक अकेली गैरकांग्रेसी पार्टी के दम पर भी जिनको बहुमत हासिल है। हालांकि यह एक अलग बात है कि मोदी की पार्टी का गठबंधन खासा बड़ा है, और आधा दर्जन से अधिक राज्यों में फैला हुआ भी है। जनसंघ के जमाने से अब तक भाजपा बहुत से मुद्दों पर अपनी बेबसी इस बात को लेकर बताती थी कि वह गठबंधन की सरकार में है, और अपनी पार्टी की घोषित नीतियों पर वह अकेले काम नहीं कर सकती। आज दिल्ली में सरकार एनडीए की जरूर बन रही है, लेकिन नरेन्द्र मोदी उसके एक ऐसे मुखिया हैं जो कि पार्टी की हर घोषित नीति को लेकर खासे आक्रामक समर्थक रहे हैं, और आज सरकार के भीतर वे अपनी पार्टी के बहुमत के मुखिया हैं, और हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री बनने वालों में सबसे अधिक तपकर इस ओहदे तक पहुंचने वाले नेता हैं। इसलिए आज जनसंघ-भाजपा के पसंदीदा और घोषित मुद्दों पर काम करने की सबसे बड़ी उम्मीद नरेन्द्र मोदी से की जा रही है।
नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तान के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो कि एक क्षेत्रीय भाषा गुजराती और फिर हिन्दी से उठकर, बिना अंग्रेजी के बढ़कर यहां तक पहुंचे हैं। उनके पहले चरण सिंह, चन्द्रशेखर और देवेगौड़ा जैसे लोग क्षेत्रीय बोली और भाषा से उठे हुए जरूर थे, लेकिन वे पूरे कार्यकाल के लिए, बहुमत से चुने गए प्रधानमंत्री न होकर वे कार्यकाल के आखिर में कुछ वक्त के लिए आए थे, उनके साथ कोई जनसमर्थन नहीं था, और वे सत्ता की उलट-पलट का नतीजा थे। इसलिए अब तक पूरे वक्त के प्रधानमंत्री इंडिया के प्रधानमंत्री रहते आए थे, यह पहली बार हो रहा है कि कार्यकाल की शुरुआत से ही कोई पहली बार भारत का प्रधानमंत्री बन रहा है। ऐसा हम इसलिए भी लिख रहे हैं कि अपने पहले के कई प्रधानमंत्रियों से अलग, नरेन्द्र मोदी अंग्रेज और अंग्रेजी की गुलामी से आजाद हैं, और वे ठेठ देहाती और देसी हिन्दुस्तानी तौर-तरीकों वाले हैं।
नरेन्द्र मोदी पिछले कई प्रधानमंत्रियों से अलग, केन्द्र सरकार के किसी भी अनुभव के बिना सीधे प्रधानमंत्री बन रहे हैं, तजुर्बे की कमी भी उनके साथ है, और इसके साथ-साथ वे तजुर्बों के बोझ से आजाद रहकर एक नई सोच की संभावना रखते हैं। दूसरी तरफ पिछले कई प्रधानमंत्रियों से अलग, नरेन्द्र मोदी एक राज्य की बड़ी कामयाब अर्थव्यवस्था चलाने का तजुर्बा और साख लेकर आए हैं। उनकी साख एक बेहतर सरकार को चलाने की है, और अब यह साख दांव पर है। केन्द्र सरकार का कोई सीधा काबू राज्य सरकारों पर वैसा नहीं रहता जैसा कि गुजरात के मुख्यमंत्री का गुजरात पर रहता है, इसलिए केन्द्र सरकार के कामकाज की कामयाबी, किसी एक राज्य की कामयाबी के पैमाने पर नापना गलत होगा, लेकिन मोदी जैसी उम्मीदें जगाकर आए हैं, उनको गुजरात के पैमाने पर नापा ही जाएगा। इस नाते नरेन्द्र मोदी आज शायद देश के इतिहास में सबसे अधिक उम्मीदें जगाकर आने वाले प्रधानमंत्री भी हैं, और इस नाते वे सबसे अधिक कड़ी चुनौती के सामने भी खड़े हैं।
नरेन्द्र मोदी पिछले बारह बरसों से गुजरात दंगों की तोहमत झेलते आए हैं, इन्हीं तोहमतों के चलते वे बार-बार गुजरात में चुनाव जीतकर अपने आपको साबित कर चुके हैं, देश की कोई अदालत अब तक नरेन्द्र मोदी को कटघरे में भी नहीं ला पाई है, और इस चुनाव में उनको मिले ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बहुमत के बाद अब गुजरात दंगों की बात शायद अलग रख दी जाएगी। लेकिन नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तान के इतिहास के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिनके धार्मिक रूझान को लेकर, जिनकी अल्पसंख्यक नीतियों को लेकर, देश और दुनिया सबसे अधिक चौकन्नी नजरें लगाए हुए हैं। अपने इतिहास से जुड़ी तोहमतों के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी इन पांच बरसों में अपने रूझान से कैसा नया इतिहास गढ़ सकते हैं, इसको लेकर लोगों में बहुत उत्सुकता है, अटकलों से हवा भारी है।
नरेन्द्र मोदी की शक्ल में हिन्दुस्तान को पहली बार एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जिसे देश और दुनिया की कारोबारी दुनिया सबसे अधिक पसंद कर रही है। अब ऐसे में कुछ हजार बड़े कारोबारियों, और देश की आधी से अधिक गरीब आबादी के बीच वे खुशियों को किस तरह बांट सकते हैं, ऐसी चुनौती हिन्दुस्तान के इतिहास में आज सबसे ऊंचे कद की है। नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तान की राजनीति में वंशवाद, परिवारवाद, कुनबापरस्ती, जैसी निजी दिक्कतों से परे हैं। वे पूरी तरह पार्टी, सरकार, और शायद अपनी निजी आस्था के केन्द्र आरएसएस के लिए समर्पित हैं, और सार्वजनिक जीवन से परिवार को परे रखने की इतनी बड़ी, अपने किस्म की अकेली और अनोखी मिसाल प्रधानमंत्री की कुर्सी तक शायद पहली बार पहुंची है। गैरशादीशुदा अटल बिहारी वाजपेयी भी प्रधानमंत्री रहते हुए अपने दत्तक परिवार से परे नहीं थे, और यह बात छुपी हुई नहीं है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करवाए गए उनके दत्तक दामाद का नाम कई किस्म के सौदों के लिए चर्चा में आता था। अभी चार दिन पहले तक ही सोनिया गांधी के परिवार, और उनके दामाद को लेकर अप्रिय चर्चाएं चलती आई हैं, जो कि आज मोदी की आंधी में खबरों से परे हो गई हैं। ऐसे माहौल में अपने भाई-बहनों और मां, पत्नी, इन सबसे लगभग पूरी जिंदगी अलग और अकेले रहते आए नरेन्द्र मोदी एक बिल्कुल ही अलग किस्म के हैं, और बहुत सी अलग-अलग मिसालें लेकर आए हैं।
नरेन्द्र मोदी के साथ एक दिक्कत यह भी है कि वे एक ऐसे गठबंधन और एक ऐसी पार्टी के प्रधानमंत्री बनकर आ रहे हैं, जिनका भ्रष्टाचार से कोई बड़ा परहेज नहीं रहा है। ऐसे में वे सरकार में अपने साथियों, और राज्यों में एनडीए की सरकारों के भ्रष्टाचार पर कितना काबू कर सकते हैं, यह देखने की बात है। देश में एक वक्त वीपी सिंह की सरकार को लोगों ने ईमानदारी की उम्मीद के साथ देखा था, और वीपी सिंह कारोबार की दुनिया के चहेते नहीं थे। आज मोदी बाजार की कारोबारी उम्मीदों, सरकार के साथियों की निजी उम्मीदों, और जनता-मीडिया के ईमानदारी के पैमानों, इन सब पर एक साथ कैसे खरे उतरते हैं, यह देखने की बात है। फिलहाल उनके साथ यह एक सहूलियत है कि वे इस देश में बिना किसी शहादत या हादसे के माहौल में, अकेले अपने दम पर, अभूतपूर्व बहुमत के साथ, इस कुर्सी तक पहुंचे हैं, और खुद उनकी पार्टी के भीतर उनसे अधिक बहस करने की गुंजाइश आज किसी की नहीं दिखती है।
पिछले कई प्रधानमंत्री से अलग, नरेन्द्र मोदी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर किसी भी सरकारी तजुर्बे के बिना वे प्रधानमंत्री बन रहे हैं, और वे भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो दुनिया के बहुत से देशों, बहुत से समुदायों के बहिष्कार को झेलते हुए आए हैं, और आज उनकी चुनावी फतह की वजह से, उनके प्रधानमंत्री बनने की वजह से उन तमाम देशों के उनके बारे में अपनी रीति-नीति को बदलना पड़ रहा है। ऐसे नातजुर्बेकार नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाकर परंपरागत कूटनीति से परे एक हथौड़ा से चला दिया है। खासकर भारत-पाक सरहद पर बिसात बिछने के पहले ही मोदी ने पहली जीत हासिल कर ली है, जिसकी वाहवाही दुनिया में सब जगह हो रही है। ऐसी पहल कोई नातजुर्बेकार ही कर सकता था, तजुर्बों के वजन से लदा हुआ तंगनजरिए वाला नेता नहीं।
मोदी से जुड़ी ऐसी बातों पर चर्चा आने वाले दिनों में और आगे बढ़ेंगी, जारी रहेंगी, क्योंकि उन सबको एक साथ सोच और लिख पाना मुमकिन नहीं है। लेकिन वे दर्जन भर पहलुओं से देखने पर प्रधानमंत्री की कुर्सी के इतिहास से बिल्कुल अलग दिख रहे हैं। यह वर्तमान तो बिल्कुल अलग है ही, भविष्य कैसा होगा, यह मोदी को खुद ही साबित करना होगा।

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