मोदी के आने से देश में आशंकाएं और उम्मीदें...

13 मई 2014
संपादकीय
कल शाम से हिंदुस्तान के तमाम टीवी समाचार चैनलों पर चुनाव विश्लेषण आ रहा है कि किस तरह मतदान खत्म होने के बाद वोटरों का रूझान एनडीए और भाजपा की तरफ दिख रहा है। ये अंदाज हैरान करने वाले नहीं हैं, और कई हफ्तों से ऐसे ही नतीजों की उम्मीद की जा रही थी, इसलिए अधिकतर एक्जिट पोल एक से दिख रहे हैं, और पिछले दो चुनावों की तरह अगर एक्जिट पोल पूरी तरह, और बुरी तरह गलत साबित नहीं होते हैं, तो नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में अगली सरकार बनने के आसार हैं। 
आज लिखने को कुछ और नहीं है, इसलिए हम इसी मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि मोदी के जो विरोधी हैं, उनको एकदम से हताश और निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत के लोकतंत्र ने ऐसे कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनावों में किसने सोचा था कि नेहरू का कुनबा निपट जाएगा, और कुछ बरस पहले जो इंदिरा गांधी दुर्गा का अवतार दिख रही थीं, वे भी घर बैठने को मजबूर हो जाएंगी। फिर 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद किसने यह सोचा था कि देश के वैसे कांगे्रस विरोधी माहौल में बनी हुई पहली कांगे्रस विरोधी सरकार कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाएगी, और ढाई बरस में ही चल बसेगी। इसके बाद यह किसने सोचा था कि राजीव गांधी पर बोफोर्स की तोहमत के साथ देश में भारी माहौल बनाकर ईमानदारी के प्रतीक बनकर आए वीपी सिंह भी वक्त के पहले सत्ता खो बैठेंगे। और यह किसने सोचा था कि देवेगौड़ा और गुजराल जैसे लोग इस विशाल लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बनेंगे और यह भी किसने सोचा था कि जो चंद्रशेखर इंदिरा को गिराने में एक मुखिया के, वे चंद्रशेखर एक दिन कांगे्रस की मदद से प्रधानमंत्री बन जाएंगे। लगे हाथों यह कहना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि 2004 में जब भाजपा का भारत शाईन कर रहा था, तब इंडिया शाईनिंग के इश्तहारों को खारिज करते हुए, देश ने यूपीए को चुना था, और सारे चुनावी सर्वे, एक्जिट पोल, गलत साबित हुए थे। ऐसा ही हाल 2009 के एक्जिट पोल का था, इसलिए देश की जनता को कल शाम से चल रहे टीवी प्रसारणों को लेकर हड़बड़ाने की जरूरत नहीं है। 
अगर मोदी हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वह इस देश में न तो लोकतंत्र का अंत रहेगा, न ही यह पूरा देश साम्प्रदायिक हो जाएगा। सत्ता की अपनी मजबूरियां होती हैं, और किसने यह सोचा था कि यूपीए-1 वामपंथी समर्थन की वजह से आर्थिक उदारीकरण पर सहम जाने को बेबस होगा। हो सकता है कि एनडीए और बाहरी समर्थन के चलते नरेन्द्र मोदी इन पांच बरसों में न तो राम मंदिर बनवा पाएं, और न ही धारा 370 खत्म कर पाएं, या कॉमन सिविल कोड लागू न कर पाएं। सत्ता चलाने की अपनी बेबसी होती है, और भाजपा के कुछ नेता पाकिस्तान के खिलाफ चाहे जितना कहते हों, इतिहास गवाह है कि भाजपा वाली अटल सरकार के चलते पाकिस्तान ने भारत पर चढ़ाई की, कारगिल में युद्ध छेड़ा, न कि भारत की भाजपा अगुवाई वाली सरकार ने पाकिस्तान पर हमला किया। इसलिए यह मानकर चलना चाहिए कि सत्ता के अपने दबाव होते हैं, और नरेन्द्र मोदी का आना, न तो हमेशा के लिए होने जा रहा है, और न ही वे अपनी मर्जी का हर काम कर सकेंगे।
इसलिए देश के जो लोग मोदी के आने के आसार से डरे-सहमे, या हड़बड़ाए हुए हैं, उनको चैन से बैठना चाहिए, और आने वाले महीनों को देखना चाहिए कि मोदी सरकार अगर आती है, तो वह किस राह पर जाती है। अगर यह सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी, तो जनता इसे खारिज करने का हक भी अपने हाथ रखती है। हमने जो ताजा इतिहास गिनाया है, उसमें कई सरकारों ने धमाके के साथ आने के बाद भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया था। इसलिए लोगों को वैचारिक रूप से असहमत होते हुए भी बहुत अधिक डरने की जरूरत नहीं है, और साथ-साथ मोदी के समर्थकों को भी बाकी लोगों के बीच ऐसा एक विश्वास खड़ा करने की जरूरत है। उनको यह याद रखना चाहिए कि मोदी के तमाम करिश्मे और यूपीए के तमाम कुकर्मों के बावजूद संसद के भीतर भाजपा-एनडीए का ऐसा कोई  बहुमत नहीं रहने जा रहा, जैसा कि राजीव गांधी ने देखा था, और उसके बाद अपनी सरकार अगले चुनाव में खो दी थी। इसलिए लोगों को न तो हीन भावना का शिकार होना चाहिए, न ही बददिमाग होना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र उतार-चढ़ाव का इतिहास रहा है, और भविष्य इससे बहुत अधिक अलग साबित होगा, ऐसी कोई गारंटी तो है नहीं।

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