17 मई 2014
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की मिलीजुली शानदार जीत, और कांगे्रस की शर्मनाक शिकस्त, इनसे एक मिलाजुला सबक, और मिलीजुली नसीहत सबको लेनी चाहिए। आने वाले दिन यह लिखने के लिए रहेंगे कि मोदी को प्रधानमंत्री की हैसियत से क्या-क्या करना चाहिए, और क्या-क्या नहीं, लेकिन आज हम चुनावी नतीजों की बात करना चाहते हैं कि उससे हमको क्या-क्या सीखने का मौका मिलता है। आजाद हिंदुस्तान में ये नतीजे अपने किस्म के बिल्कुल ही अलग और अनोखे हैं, और इसलिए सीखने के इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए।
2002 के गुजरात दंगों के बाद से वहां के मुख्यमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी जिस तरह उस राज्य को आगे किसी हिंसा से दूर रखा, और लगातार चुनाव जीते, वह बात यह बताती है कि किस तरह हिंदुस्तान की सबसे बड़ी बदनामी से उबरकर दस-बारह बरसों के भीतर देश के एक हीरो की तरह की शोहरत कोई कैसे पा सकता है। इस पूरे दौर में मोदी न सिर्फ अदालती-सुनवाई का खतरा झेलते हुए खड़े रहे, बल्कि वे मीडिया-सुनवाई का सामना भी करते रहे। और जब इस लोकतंत्र की सारी संवैधानिक संस्थाएं मिलकर भी मोदी को गुनहगार नहीं ठहरा पाईं, किसी कटघरे तक नहीं ले पाईं, तो फिर लोकतंत्र में ऐसी अभूतपूर्व, ऐतिहासिक, और जबरदस्त जीत को नकारना अलोकतंात्रिक होगा। लोकतंत्र में कार्रवाई की संभावनाएं आज भी मोदी के खिलाफ खुली हुई हैं, और इसके साथ-साथ लोकतंत्र आरोपों से घिरे लोगों को आगे बढऩे का भी उतना ही मौका देता है। मोदी ने लोकतंत्र के भीतर ही, अपने पर फेंके गए पत्थरों से सीढिय़ां बनाकर यह ऊंचाई हासिल की है। और मोदी की यह कामयाबी लोगों को विपरीत परिस्थितियों में भी उबरने और आगे बढऩे की एक मिसाल देती है।
इसके साथ-साथ दूसरी मिसाल निकलती है यूपीए और कांगे्रस पार्टी की सरकार के लोगों के बर्ताव से, और खासकर कांगे्रस पार्टी के नेताओं के अहंकार से। पिछले दस बरसों की यूपीए सरकार के दौरान खासकर पिछले पांच बरस ऐसे रहे जिन्होंने यह मिसाल सामने रखी कि एक गठबंधन कैसे-कैसे नहीं चलाना चाहिए, एक सरकार कैसे-कैसे नहीं चलानी चाहिए, एक नेता को कैसा-कैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए। कांगे्रस पार्टी के नेता, और प्रवक्ता तक, मुंह खोलते थे, और जनता के बीच हिकारत पैदा करते थे। हम इस भारी-भरकम शब्द को पिछले दो-तीन बरसों में कांगे्रस के संदर्भ में सैकड़ों बार लिख चुके हैं, और अपने अहंकार में डूबी हुई यह पार्टी यह देख भी नहीं पाई कि उससे नफरत करती हुई देश की जनता के सामने मोदी एक मजबूत विकल्प की तरह सामने आकर ऊंचे होते चले गए, और कांगे्रस हाशिए पर जाती रही। हमको जरा भी उम्मीद नहीं है कि हमारे यह लिखने से कांगे्रस पार्टी या उसके नेता किसी तरह का आत्ममंथन और आत्मचिंतन करेंगे, और अपने में सुधार करेंगे, लेकिन यह बात हम बाकी लोगों के लिए एक सबक की तरह लिख रहे हैं कि अपनी जिंदगी के किसी भी दायरे में लोगों को ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए जैसा कि कांगे्रस ने पिछले बरसों में लगातार किया है।
बर्ताव से परे कामकाज को लेकर एक बड़ा सबक यूपीए सरकार से निकलता है कि अपने मातहत होते जुर्म को अनदेखा करके रहने वाले किस तरह उस जुर्म के हिस्सेदार रहते हैं। आज मनमोहन सिंह जेल में नहीं हैं, लेकिन वे अगर जेल में होते तो शायद बाहर रहने के मुकाबले अधिक हमदर्दी के हकदार होते। हमने दर्जनों बार इसी जगह यह लिखा है कि किस तरह मनमोहन सिंह एक गिरोह के मुखिया बनकर रह गए थे, जिसका अपने गिरोह पर कोई काबू नहीं था। हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री की कुर्सी ऐसे बेबस और कमजोर लोगों के लिए नहीं हो सकती जिनके मातहत लोग लूट और डकैती करते रहें, और वे खुद निकम्मे बैठे रहें। ऐसा बेजुबान गवाह बने रहने का काम तो गब्बर सिंह ने भी न किया होता, उसका भी अपनी गिरोह पर बेहतर काबू रहता। जो लोग अपनी जिम्मेदारी को अनदेखा करते हैं, वे लोग मनमोहन सिंह की तरह इतिहास में कालिख के हकदार रहते हैं। जिस प्रधानमंत्री को अपने ओहदे और लोकतंत्र की इतनी भी फिक्र न हो कि उसके विधेयक को एक नौजवान सार्वजनिक रूप से फाड़कर फेंक दे, और उसके बाद भी यह बूढ़ा सयाना कुर्सी से चिपका रहे। मनमोहन सिंह ने देश और दुनिया के सामने यह मिसाल पेश की है कि एक प्रधानमंत्री को, एक नेता को, किस तरह बेशर्म और गैरजिम्मेदार नहीं होना चाहिए।
इन चुनावी नतीजों से यह भी सीखने मिलता है कि किसी मुकाबले में दूसरों की गलतियों, उनके गलत कामों के मुकाबले अपनी लकीर को बड़ा करते चलने का क्या फायदा होता है, किस हद तक उसका फायदा हो सकता है। नरेंद्र मोदी ने पिछले बरसों में लगातार अपनी साख और अपने काम को बेहतर बनाने की कोशिश की, और उन्हें कांगे्रस-यूपीए की साख को मिटाना भी नहीं पड़ा। कांगे्रस और उसके साथी अपनी संभावनाओं को उसी तरह मिटाते चले गए जिस तरह आंगन में डली हुई किसी रांगोली को कोई बच्चा मिटाते जाता है, या कोई मतमस्त घर लौटते हुए उस रांगोली को कुचलते हुए लौटता है। राजनीति से परे भी जिंदगी के बाकी दायरों में समझदार लोगों को क्या-क्या करना चाहिए, और क्या-क्या नहीं करना चाहिए ये दोनों ही सबक इन चुनावी नतीजों से निकलते हैं।
एक भ्रष्ट सरकार के बदनाम, बदमिजाज, और बदजुबान मंत्रियों का क्या हाल होता है, यह इस बार सामने आया है। इसलिए लोगों को अपने ओहदे और कुर्सियों को खानदानी विरासत मानकर नहीं चलना चाहिए, और सत्ता की ताकत को अपने सिर नहीं चढऩे देना चाहिए। आज यहां पर नरेंद्र मोदी की कही हुई एक छोटी सी बात के बड़े सबक को देखना चाहिए। उन्होंने अपने-आपको चौकीदार या नौकर कहते हुए सेवा का मौका मांगा है। भारत की सत्ता की राजनीति में लोग सत्ता का हक चाहते हैं, इन्हीं शब्दों को कहते हैं, और इसी सोच के साथ काम करते हैं। मोदी के जो शब्द हैं, वे अगर सचमुच उनकी सोच बने, और अगर सत्ता के हक वाली बात सेवा की जिम्मेदारी वाली बात में वे बदल सकें, तो न सिर्फ भाजपा और मोदी सरकार, बल्कि देश की पूरी राजनीतिक सोच भी बदल सकती है, देश का पूरा लोकतंत्र बदल सकता है। सत्ता के हक वाली सोच लोकतंत्र को राजतंत्र बना देती है, और उसे सेवा की जिम्मेदारी में बदलना जरूरी है। अब चूंकि भाजपा-एनडीए अगले पांच बरस इसी सत्ता या सेवा के मौके के हकदार हैं, इसलिए सबसे पहले उनको भी इस सबक की जरूरत है। मोदी ने जो बात कही है, उस कथनी को करनी में बदलकर ही वे कामयाब हो सकते हैं, वरना इस देश ने पांच-पांच बरस में बहुत बार सत्ता बदलते देखा है। पिछले पांच बरसों में सोनिया-राहुल सहित कांगे्रस-यूपीए के अनगिनत कुनबे जिस तरह के बदनाम कारोबार की खबरों से घिरे रहे, उससे देश में यह तस्वीर बनी कि सेवा के मौके को यूपीए सरकार के लोगों ने मेवा का मौका बना लिया था। और देश की गरीब जनता के साथ मेवा चबाते लोगों का ऐसा बर्ताव हिंसा से कम कुछ नहीं था। और इस बार के नतीजे उस हिंसा का जवाब भी हैं। इसलिए लोग ऐसी हिंसा करने से बचने की नसीहत भी आज ले सकते हैं। सार्वजनिक जीवन में निजी कुनबों की दखल, और उनकी लूटपाट के दिन अब लद गए दिखते हैं, इसे लोग राजनीति से परे के बाकी दायरों में भी समझ लें।
2014 के चुनावी नतीजों से लोगों के सीखने को बहुत कुछ मिल रहा है, और इसे सिर्फ एक सत्ता-परिवर्तन मानकर चलने के बजाय, हर किसी को इसे सोच-परिवर्तन का एक मौका बनाना चाहिए।

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