सुरक्षा ,सियासी मुकाबले का मुद्दा नहीं

संपादकीय
3 मई 2014
गर्मियों के दिनों में, भीड़ भरी रेल यात्राओं के मौसम में बंगलौर-गौहाटी एक्सप्रेस में,चेन्नई में रेल्वे स्टेशन पर हुए दोहरे धमाकों ने बहुत सी बातों पर गौर करने को मजबूर कर दिया है। पुलिस को देर रात डेढ़ से दो बजे ट्रेन में बम रखे जाने का अंदेशा है। धमाके की शिकार बोगी में दो सीटें बुक करवाने वाले एक यात्री का पता फर्जी दिया होने के कारण, उसका पता नहीं लग रहा है। जांच दल को अंदेशा है कि यह शख्स बम रखकर इस बोगी से चला गया होगा, लेकिन इन डब्बों में जांच के लिए आए टिकिट निरीक्षकों का कहना है कि उन्हें यहां कोई संदिग्ध बात नजर नहीं आई। बताया जा रहा है कि बंगलौर स्टेशन पर, जहां बम रखना माना जा रहा है, वहां से चेन्नई आते बीच में 6 बड़े स्टेशन पड़ते हंै। इस बीच 7 टिकिट निरीक्षक इस गाड़ी में मौजूद थे, लेकिन जांच में उनसे कोई मदद मिलने की उम्मीद एजेंसियों को नहीं दिख रही है।
हालांकि यात्राओं के सीजन में रेल के डिब्बों के भीतर रहती भारी गहमागहमी एक बीच टीटी से  इतना चौकन्ना होने की उम्मीद नहीं की जा सकती, कि वह संदिग्ध आतंकियों की मौजूदगी भी सूंघ ले, लेकिन यात्रियों के बीच सरकारी एजेंसी की तरफ से वही एक मौजूद होते हंै। इसलिए ऐसे हादसे होने पर जांच अफसरों का ,किसी सुराग के लिए उनकी तरफ देखना लाजिमी है। क्या इन हालात में उनकी तालीम में इस हिसाब से किसी सुधार की जरूरत है?
इस मामले में दूसरा मुद्दा मुख्यमंत्री जे जयललिता का पहले एनआईए से जांच करवाने से इंकार करके, जांच राज्य की सीबी-सीआईडी को देना, और बाद में एनएसजी, और फिर एनआईए से जांच करवाने को राजी हो जाने से जुड़ी बातें भी हैं। चुनावों, और यात्रा के सीजन के बीच हुए बम धमाकों से घबराई जनता की परवाह नहीं करके, जे जय ललिता, और केंद्र सरकार के बीच चेन्नई धमाकों की जांच पर थोड़े समय के लिए ही सही, जो तनाव हुआ वह बेवजह था। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी देश के टेलीविजन पर जयललिता के एनआईए की मदद लेने से इंकार करने पर केंद्र की लाचारी जताने में जो जल्दबाजी दिखाई, वह आतंक के खतरे में जी रही जनता का भरोसा तोडऩे वाली थी।
आतंक और सुरक्षा के मामलों को अगर राजनीतिक दल आपसी खींचतान से अलग रख सके ,तो जनता के लिए अपनी परिपक्वता ही दिखाएंगे। ऐसा नहीं करके, राजनीतिक दल, धर्म, तक्नालॉजी, और देश के सामाजिक आर्थिक बंटवारे तक, हर बात का चालाकी से फायदा उठा रहे आतंकियों के मंसूबे ही पूरे करते हैं। राजनीतिक सौदेबाजी के लिए क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने के लिए राज्यों की सुरक्षा जैसे मामले में भी केंद्र से खुद को बेहतर दिखाने के लिए ऐसे फैसले लेना गलत है, जैसे चेन्नई धमाकों के मामले में जयललिता लेती दिखी। उसी तरह, सुरक्षा जैसे मामलों में राज्यों को अपने विश्वास में लेने में अपनी नाकामी ढांकने के लिये केंद्रीय गृहमंत्री का मीडिया के सामने राज्यों के असहयोग का रोना रोना भी गलत है। शुक्र है तमिलनाडु सरकार ने जांच में एनआईए के शामिल होने का बयान जारी कर दिया है, लेकिन इस वाकये से आतंकवाद से निपटने के लिए केंद्रीय स्तर पर एनसीटीसी के गठन, और इसमें केन्द्र और राज्यों के रुख पर एक बार फिर से गौर करने का मौका देश को मिला है।
रेल या अंतरराज्यीय विमानसेवाओं में एक से दूसरे राज्यों में आते जाते लोगों की जान माल की हिफाजत के लिए राज्यों, और केन्द्र सरकार के बीच बेहतर तालमेल, और माहौल की जरूरत है। इसमें कौन किससे कितना तगड़ा है यह दिखाने की कोशिश फिजूल है। खुफिया सूचनाओं के लेनदेन के लिए राष्ट्रीय स्तर का तालमेल जरूरी है। इसके रास्ते में आ रही सारी रुकावटें दूर की जानी चाहिए। अगर राज्यों को एनसीटीसी को लेकर अपने अधिकार क्षेत्र में केंद्र की घुसपैठ का डर है, तो केन्द्र सरकार को उसे दूर करना चाहिए, और राज्यों को भी, केवल केंद्र को नीचा दिखाने के लिए एनसीटीसी का गठन लटकाने की बजाय, उसके गठन के रास्ते केंद्र को सुझाने चाहिए। सुरक्षा के मुद्दे को राजनीतिक सौदेबाजी और मुकाबले से परे रखा जाना चाहिए।

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