चापलूसी के चलते सोनिया को, जनता के गुस्से की खबर नहीं, आलोचना पर गौर की जरूरत

25 मई 2014
संपादकीय
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि पार्टी लोकसभा चुनाव में लोगों के गुस्से को भांपने में असफल रही और अब उसे गहराई से इसके कारणों को समझकर सुधारात्मक उपाय करने होंगे। फिर से कांग्रेस संसदीय दल का अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी के नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्यों और राज्यसभा सदस्यों की बैठक को संबोधित करते हुए सोनिया ने कहा- इस चुनाव में कई राज्यों में हम एक भी सीट नहीं जीत पाए। इस अभूतपूर्व आघात से हम सभी को व्यक्तिगत तौर पर तथा सामूहिक रूप से उचित सबक लेना होगा। 
सोनिया गांधी ने आज लगभग सार्वजनिक रूप से इस बात को माना है, जिसे कि देश पिछले कुछ बरसों से अच्छी तरह जान रहा था, और उस पूरे दौर में कांग्रेस के पास अपने इस बदहाल को कुछ हद तक बचाने के लिए थोड़ी सी गुंजाइश थी, लेकिन वह ऐसा करते दिखी नहीं। आज जब एक कहावत के मुताबिक चिडिय़ा खेत चुग गई हैं, तब कांग्रेस माथे पर हाथ धरे बैठी है। खैर, हम इसे कांग्रेस की जिंदगी का अंत नहीं मानते। राजनीतिक दलों की जिंदगी में ऐसे मौके आते हैं, और उनसे उबरने के इतिहास भी हैं। भारत के राज्यों में भी हैं, भारत में राष्ट्रीय स्तर पर भी हैं। और पड़ोस के देशों में भी हैं, जहां जेल और देश निकाले के बाद भी लोग लौटकर आते हैं, और अपने को शरीफ साबित करते हुए दुबारा चुने जाते हैं। इसलिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि कांग्रेस अपने आपको खत्म मानकर बैठ जाए। लेकिन कांग्रेस अपने आपको एक बुरी मोदी सरकार का पांच साल बाद का जनता की मजबूर पसंद मानकर न बैठे, हो सकता है कि पांच बरस बाद मोदी सरकार बुरी न हों, और जनता के सामने कांग्रेस सुधरी हुई एक बेहतर पार्टी न हो। 
सोनिया गांधी और कांग्रेस बहुत बड़ा मुद्दा नहीं हैं, उनके बिना भी आज भारत की सरकार और संसद बखूबी काम कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की मिसाल को लेकर हम जो लिख रहे हैं, उस पर ध्यान देने से दूसरी पार्टियों और दूसरे नेताओं का भी भला हो सकता है। भारत जैसी राजनीति में देश और प्रदेशों में समय-समय पर बेहतर विकल्प लोगों के सामने आते हैं, और बुरी मिसालें जनता खारिज कर देती है। इसलिए जो पार्टियां या सरकारें, नेता या निर्वाचित जनप्रतिनिधि, अपने आपके काम पर फिदा होकर खुशफहमी में जीते हैं, उनको पीछे छोडऩे वाले बेहतर लोग कब आकर जनता के दिल-दिमाग पर काबिज हो जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता। फिर हिन्दुस्तानी चुनाव एक और बात की मिसाल हैं, यहां पर बहुत से अच्छे नेता अपने कुकर्मो से नहीं हारते, बल्कि वे अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के कुकर्मो का भुगतान करते हुए हार जाते हैं। ऐसी नौबत में कई बार ऐसे बड़े नेताओं की अपनी जीत को दिखाया जाता है कि वे तो खुद जीत गए हैं, और हारने वाले छोटे नेता अपनी वजह से हारे होंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। छत्तीसगढ़ से लेकर बाकी देश तक ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जिनमें सोनिया-राहुल से लेकर मुलायम तक, बहुत से बड़े नेता खुद तो जीत गए, लेकिन उनसे नाराजगी की वजह से उनकी बाकी पार्टी हार गई। 
ऐसी बुरी तरह शिकस्त वाली पार्टियों को जनता से जुडऩे की बहुत आसान तरकीब इस्तेमाल करना चाहिए। देश के मीडिया में जो अखबार गंभीरता और ईमानदारी से लिखते हैं, उनमें छपी आलोचना को देखने के बजाय जब कोई पार्टी अपने बड़े नेताओं की चापलूसी में लगी रहती है, तो सच पढऩे के बजाय झूठ लिखने का काम करते-करते ऐसी पार्टी जनता से कट जाती है। और कांग्रेस के साथ ठीक यही हुआ है। हम सिर्फ अपनी बात नहीं करते, देश में हमारे जैसे दर्जनों से अधिक अखबार रहे होंगे जिन्होंने पिछले बरसों में बार-बार हर पार्टी और बहुत से नेताओं के गलत कामों पर खुलकर लिखा, अगर कांग्रेस में जनता की नब्ज पर हाथ धरने के लिए अखबारी पन्नों पर हाथ धरने की आसान तरकीब इस्तेमाल हुई होती, तो ईमानदार आलोचकों की बातों से ही सोनिया गांधी को जनता की नाराजगी, उसकी हिकारत, और उसकी नफरत, इन सबका अंदाज लग गया होता। लेकिन कांग्रेस पार्टी जमीन से इसलिए कट गई है, कि उसके लगभग सभी नेता और बहुत से कार्यकर्ता अब जमीन से खासी ऊंची महंगी गाडिय़ों में चलने लगे हैं, और उनकी राजनीति जनता केन्द्रित न होकर नेता केन्द्रित रह गई है। इसके अलावा इस पार्टी ने अपने आत्मघाती नेताओं पर किसी भी तरह की कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा, और देश में जगह-जगह इस घर को आग लग गई, घर के चिराग से। 
कांग्रेस को जिंदा रखने के लिए, और इसे खड़ा करने के लिए अब भी सोनिया गांधी को अपनी पार्टी के भीतर एक ऐसा ढांचा खड़ा करना चाहिए जो कि गंभीर और ईमानदार आलोचकों की कही और लिखी हुई बातों पर आत्ममंथन करे। चापलूसी की हुआ-हुआ के बीच किसी का भला नहीं होता। 

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