अब यह देखने का मौका कि कांग्रेस अपना क्या करती है?

18 मई 2014
संपादकीय
बिहार के घोर मोदी विरोधी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी जदयू की शर्मनाक हार के बाद कल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, और आज वहां पर एक और भाजपा विरोधी, राजद के लालू यादव के साथ मिलकर एक नई सरकार बनाने की कोशिश नीतीश कुमार की पार्टी के नेता शरद यादव कर रहे हैं। बिहार में चाहे जो हो, नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर एक रूख सामने रखा है, और इसे दूसरी पार्टियों में कौन-कौन, कहां-कहां मानते हैं, यह देखने की बात है। आज सबसे बड़ा सवाल देश में सबसे बुरी शिकस्त के बाद चौराहे पर खड़ी हुई कांग्रेस पार्टी के सामने है, वह जाए तो कहां जाए, किसकी उंगली थामकर जाए, उस पार्टी में इस हार की जिम्मेदारी कौन ले, और कौन इस पार्टी को राख से उठाकर खड़ा करने की ताकत रखते हैं? ऐसे बहुत से सवाल आज कांग्रेस के सामने हैं, और देश में आज सबसे बड़ा सवाल यही है। यह न सिर्फ राजनीति में सबसे बड़ा सवाल है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल है कि कांग्रेस पार्टी अब क्या करती है? 
दरअसल कांग्रेस ने अपना सारा दांव राहुल गांधी पर लगा दिया था, जो कि कुनबे के कांग्रेसी चापलूसों से परे किसी को भी संभावनाओं वाले नहीं दिख रहे थे। इसमें उनकी कोई खामी नहीं है, उनकी लीडरशिप की खूबियों में कमी थी, है, और शायद आने वाले निकट भविष्य में भी रहेगी। कांग्रेस के भीतर सोनिया परिवार के सम्मान, और उसके पिछले करिश्मे के चलते हुए इस पार्टी में राहुल गांधी को भविष्य की अपनी अकेली उम्मीद बनाकर यह चुनाव लड़ा था। लेकिन ऐसा करते हुए इस पार्टी ने राहुल के साथ एक बड़ी बेइंसाफी यह की थी, कि बिना तजुर्बे, बिना समझ, बिना काबिलीयत एक ऐसे नौजवान को एक भ्रष्ट और बदनाम हो चुकी सरकार को वापिस जिताने का जिम्मा दे दिया गया था, जिसकी ताकत को इसके पहले कभी परखा नहीं गया था। एक हिसाब से देखें तो कांग्रेस के नेताओं के लिए इससे अच्छी और कोई तरकीब नहीं हो सकती थी कि हारने की गारंटी वाले इस चुनाव का ठीकरा फोडऩे के लिए राहुल गांधी का सिर छांटकर रखा जाए, ताकि तोहमत और किसी पर न लगे। हम इसे राहुल गांधी के साथ उन्हीं की पार्टी की की गई बेइंसाफी इसलिए मानते हैं क्योंकि इस शिकस्त के साथ राहुल गांधी की संभावनाओं को पूरी तरह कुचलकर रख दिया गया है। 
ऐसे में आज सोनिया और राहुल, और चुनावी मौसम की कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी को क्या करना चाहिए? यहां दो बातों को समझना जरूरी है, आज इस परिवार के राजनीतिक हित, और कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक हित अलग-अलग हैं। अगर इस पार्टी को दुबारा खड़ा करना है, तो इसे सोनिया-राहुल से परे सोचने की हिम्मत भी करनी होगी। और अगर यह इस परिवार के करिश्मे पर ही पूरा दांव लगाना जारी रखती है, तो इसके उबरने की संभावनाएं आशंकाओं से परे नहीं रहेंगी। जैसे किसी कारोबार में होता है कि मालिक वहां सबसे काबिल मैनेजर नहीं होता, और समझदारी इसमें होती है कि एक काबिल मैनेजर को रखकर मालिक घर बैठे दुकान चलाए, कुछ उसी तरह कांग्रेस पार्टी में एक नए मैनेजर की जरूरत है, और उसमें ऐसे मैनेजर हो सकते हैं जो कि मालिक के प्रति वफादार भी हों। ऐसा न करके पार्टी पर अपने कब्जे को घर के भीतर से बरकरार और जारी रखकर सोनिया-राहुल कोई अच्छी मिसाल पेश नहीं करेंगे, और न ही पार्टी को उबरने का एक मौका देंगे। जहां तक कांग्रेस पर इस परिवार के कब्जे का सवाल है, तो वह पार्टी के खड़े हो जाने के बाद भी कायम रह सकता है, और अगर पार्टी खड़ी नहीं हो पाती है, तो फिर उस पर कब्जा भी किस काम का? 
इस परिवार की बात से परे की बात करें, तो कांग्रेस पार्टी को बहुत से सबक लेने की जरूरत है, इसमें सबसे बड़ा यह है कि उसे देश की जनता की यह मजबूरी मानकर नहीं चलना चाहिए कि जनता कांग्रेस को नहीं चुनेगी तो कहां जाएगी। ऐसे ही घमंड के चलते इस पार्टी के नेता लूटपाट में भी लगे रहे, लुटी हुई जनता को कूद-कूदकर लात भी मारते रहे। ऐसी दर्जनों बातें हमने पिछले बरसों में इसी जगह लिखी हैं, और कल भी उन बातों को दुहराया है, कांग्रेस को अपने आपको जिंदा रखने के लिए ऐसी तमाम बातों पर सोचना चाहिए। हमें किसी एक कुनबे की कोई फिक्र नहीं है, लेकिन हमको लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की फिक्र जरूर है, और यह एक शर्मनाक नौबत है कि नेहरू-गांधी की पार्टी को, दस बरस देश पर राज करने वाली पार्टी को आज लोकसभा के भीतर विपक्ष का दर्जा भी हासिल नहीं है। इस पार्टी को अपने सबसे नीचे के कार्यकर्ताओं से लेकर अपने हाईकमान तक के तौर-तरीकों को सुधारने की जरूरत है, और उसके पास अगले पांच-दस बरस का वक्त भी इसके लिए है। आने वाले दिन राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए दिलचस्प होंगे कि इतना नीचे गिरने के बाद अब कांग्रेस खड़े होने के लिए क्या करती है। 

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