अपनी जीवनी के खिलाफ मोदी की सोच एकदम सही

30 मई 2014
संपादकीय
भाजपा की सरकारों वाले दो राज्यों में तय किया था कि नरेन्द्र मोदी की जीवनी के पाठ स्कूली किताबों में शामिल किए जाएं, इस सोच को नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया, और कहा कि उनका यह स्पष्ट मानना है कि जिंदा लोगों की जीवनी स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में बहुत से महान लोगों का संपन्न इतिहास है, स्कूली बच्चों को उनके बारे में पढ़ाया जाना चाहिए। 
मोदी लीक से हटकर काम कर रहे हैं, और उन्हें मिला विशाल चुनावी बहुमत उनको ऐसे फैसले लेने का हक भी दे रहा है। हिन्दुस्तान का आजादी के बाद का इतिहास स्कूली किताबों के राजनीतिक इस्तेमाल से लदा हुआ है। न सिर्फ किताबें, बल्कि सार्वजनिक जगहों, और सरकारी योजनाओं को लेकर लंबे अरसे से यह शिकायत चली आ रही थी कि नेहरू-गांधी परिवार के गिने-चुने तीन-चार लोगों के नाम पर देश-प्रदेश में सब कुछ रख दिया गया है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी की सरकार का एक रूख बिना औपचारिक घोषणा के खबरों में है कि यह सरकार मौजूदा योजनाओं के नाम बदलने नहीं जा रही। नरेन्द्र मोदी अगर सचमुच ऐसा करते हैं, तो इन दो बातों को मिलाकर देखने की जरूरत है। अपने खुद के महिमामंडन से बचकर वे अगर पिछली सरकार की योजनाओं के नाम बदलने के अधिकार से भी बचते हैं, तो वे अपने लिए एक तंगदिली, और विरोधियों के लिए एक दरियादिली दर्ज करेंगे, और इससे उनका ही कद और ऊंचा आंका जाएगा। 
लोगों को अपने खुद के, अपने कुनबे के, अपने रिश्तेदारों के सम्मान को बढ़ाने की कोशिशों को छोडऩा चाहिए। अपने ही लोगों के उठाए झंडों से कोई इतिहास में दर्ज नहीं हो सकते। फिर भारत जैसे लोकतंत्र में जो लोग राजनीति में हैं, या सरकारी नौकरियों में हंै, कारोबार में हैं, या सार्वजनिक जीवन में हैं, उनको सरकार की तरफ से दिए जानेे वाले सम्मान में भी हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। बहुत से लोगों के गलत काम महीनों और बरसों बाद सामने आते हैं, और फिर उनको सजा होती है। ऐसी सजा के पहले ही अगर लोगों को राजकीय सम्मान दिए जाते हैं, तो बाद में उनके खतरे में पडऩे का खतरा भी रहता है, और ऐसे सम्मानों का सम्मान भी घटता है। 
नरेन्द्र मोदी ने जिंदा लोगों की जीवनी के बारे में जो कहा है, वह एकदम सही है। सत्ता पर बैठे लोगों की वाहवाही के लिए बहुत से लोग ऐसे स्कूली पाठ लेकर सामने आ सकते हैं। लेकिन ऐसे में उन लोगों को कुछ त्याग करना चाहिए, जो कि देश-प्रदेश की ऊंची कुर्सियों पर हैं। सम्मान उस वक्त जाकर जायज साबित होता है, जब उनकी जीवनियां पढ़ाई जाएं, जो कि आज किसी का भला या बुरा नहीं कर सकते। 

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