अंदाज से बेहतर बहुमत से देश में आया मोदीराज

16 मई 2014
संपादकीय

लोकसभा के चुनाव जैसी कि एक्जिट पोल की उम्मीद थी, वैसे ही रहे, भाजपा-एनडीए के पक्ष में उससे भी अधिक बेहतर रहे, और इस पल एनडीए की सीटें सवा तीन सौ से आगे बढ़ चुकी हैं। देश ने जितने जोर-शोर से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दिया है, शायद उससे कहीं अधिक जोर-शोर से कांग्रेस और यूपीए को हराने के लिए वोट दिया है। भाजपा के लिए यह उसके अस्तित्व का सबसे ऐतिहासिक मौका है कि वह आज गठबंधन के साथियों के बिना भी अपने खुद के बूते पर देश की सरकार बनाने की हालत में है। और इस जीत का सेहरा पार्टी के सिर पर तो है ही, उससे अधिक अकेले नरेन्द्र मोदी के सिर पर है, जिन्होंने हिन्दुस्तान के चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व मेहनत करते हुए, अकेले अपनी साख को दांव पर लगाते हुए यह चुनाव लड़ा था। 
हमने पिछले महीनों में बार-बार यह लिखा था कि कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार, कांग्रेस पार्टी, और कांग्रेस के नेताओं ने हाल के बरसों में भ्रष्टाचार और चोरी-बेईमानी के अलावा जिस परले दर्जे की बददिमागी, बेदिमागी, और बदजुबानी दिखाई थी, वह महंगाई की मार से घायल देश की जनता के जख्मों पर तेजाबी पेशाब करने जैसा था। ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता था जब कांग्रेस के लोग अपने किसी न किसी बयान से जनता के लिए हिकारत जाहिर न करते हों। दरअसल मोदी की जीत को कम न आंकते हुए भी हम यह लिखना चाहेंगे कि कांग्रेस ने अपनी हार की गारंटी करने के लिए खासा ओवरटाईम किया था, और एक ठेका-मजदूर जिस तरह कमरतोड़ रफ्तार से मेहनत करता है, कांग्रेस के नेताओं ने अपनी पार्टी की कब्र खोदने में कुछ उसी दर्जे की मेहनत की थी। देश के समझदार लोग यह सोच रहे थे कि ऐसी कांग्रेस पार्टी का एक बार खारिज होना जरूरी है, और उसके बाद फिर वह चाहे तो राख से अपने आपको दुबारा गढ़कर खड़ी हो जाए। आज हालत कुछ वैसी ही है। 
हम एक्जिट पोल के तकरीबन एक जैसे नतीजों को न भी मानते, तो भी यह बात हमेें दीवारों पर लिखी हुई दिख रही थी कि देश में आमतौर पर लोग यूपीए-कांग्रेस से नफरत कर रहे हैं, और नरेन्द्र मोदी में लोगों को एक मजबूत और स्थायी, काबिल और साफ-सुथरी सरकार की संभावना दिख रही थी। आज के नतीजे जनता की इसी नाउम्मीद, और इसी उम्मीद का नतीजा हैं। ये नतीजे एक खतरनाक नौबत लेकर भी आए हैं कि भारतीय लोकसभा में अब एक मजबूत विपक्ष भी नहीं रह गया है, और यह कमजोर हाल लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। 
पिछले पांच-दस बरसों में देश की जनता ने जितनी बदहाली झेली है, महंगाई की मार उस पर जितनी पड़ी है, और केंद्र के भ्रष्टाचार को देखते हुए भी चुप रहना, बर्दाश्त करना उसकी जिस तरह की बेबसी हो गई थी, उसका यही नतीजा निकलना भी था। कुछ महीने पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चार बड़े राज्यों में जिस तरह की शिकस्त कांगे्रस की हुई थी, वह आज के नतीजों का एक संकेत था। दूसरी बात जिसे कम नहीं आंकना चाहिए, यह चुनाव मोदी और राहुल गांधी के व्यक्तित्वों के बीच सीधे टकराव का चुनाव भी था। और यह बात कांगे्रस के खिलाफ इसलिए गई कि राहुल गांधी मोदी के पासंग भी नहीं ठहरते थे। न सत्ता का उनका अनुभव था, न उनकी बातें असरदार थीं, और न उनके पास अपनी बातों के लिए अपनी सरकार का कोई वजनदार मुद्दा ही था। इसलिए लोगों को मोदी और गोदी में से जब एक चुनने की बात आई, तो उन्होंने देखा-परखा और खरा, आर्थिक मोर्चे पर कामयाब, सरकार को ईमानदारी से चलाने वाला मुख्यमंत्री चुना, और यूपीए के कुकर्मों का टोकरा ढोते हुए चुनाव की नदी को पार करने का कद राहुल गांधी का था भी नहीं।
सुबह नौ बजे के पहले एनडीए ने यूपीए को सौ से अधिक सीटों से पीछे छोड़ दिया था। यूपीए कुल पचास सीटों पर आगे थी, और एनडीए डेढ़ सौ सीटों पर। टीवी पर हर दस-पन्द्रह सेकंड में एक-एक सीट का रूझान बढ़ते चल रहा था, और पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों के मुकाबले यूपीए को जितनी सीटों का नुकसान हो रहा था, एनडीए को तकरीबन उतनी ही सीटों का फायदा हो रहा था। इसके बाद अगले पौन घंटे में, एनडीए के रूझान के आंकड़े बहुमत के लिए जरूरी 272 से काफी अधिक पार कर चुके थे, और पौने दस बजे यह आंकड़ा 290 हो चुका था। इसके बाद जिस तरह भाजपा कमल छाप पर संसद के भीतर बहुमत पा चुकी थी, वह देखने लायक था। और देश भर में कांगे्रस-यूपीए के दिग्गज जिस अंदाज में चुनाव हारे हैं, उनको लेकर इस पार्टी को आत्ममंथन करने बैठ जाना चाहिए। 
जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है तो यहां के चुनावी नतीजे किसी भी नाटकीय से परे रहे। भाजपा के पास 11 में से 10 सीटें थीं, और अब करीब उतनी ही, एक कम, नौ सीटें रहते दिख रही हैं। कांग्रेस में फर्क यह पड़ा है कि उसके केन्द्रीय मंत्री रहे चरणदास महंत अपनी ही पार्टी के खुले वार को झेलते हुए चुनाव जीतते नहीं दिख रहे, और दूसरी तरफ अजीत जोगी को महासमुंद में भाजपा हरा नहीं पाई। लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में जिन पांच लोकसभा सीटों में बढ़त दिख रही थी, वह बढ़त हवा हो गई, और सत्ता के तीसरे कार्यकाल में भी, अपने सांसदों के खिलाफ जनता की नाराजगी के चलते हुए भी डॉ. रमन सिंह पिछली गिनती लगभग कायम रखने में कामयाब रहे। 

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