27 मई 2014
संपादकीय
अपने कामकाज के पहले दिन नरेन्द्र मोदी ने पहली ट्वीट जवाहर लाल नेहरू श्रद्धांजलि देने के लिए की। आज नेहरू की पुण्यतिथि है, और कोई और मौका होता तो प्रधानमंत्री से उम्मीद की जाती कि वे दिल्ली में नेहरू की समाधि से दिन की शुरुआत करें, लेकिन मोदी ने कल की सुबह तो बापू के राजघाट से शुरू की थी, आज की सुबह उन्होंने सीधे दफ्तर जाकर काम संभालकर शुरू की। कुछ लोगों को यह बात खटक सकती है कि उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू को श्रद्धांजलि देने जाना जरूरी नहीं समझा। लेकिन पिछले बहुत से कांग्रेसी, और शायद गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री भी नेहरू को श्रद्धांजलि देने जाते रहे होंगे, और कांग्रेस ने तो मानो नेहरू की सोच, उनकी परंपराओं, उनकी स्मृतियों, इन सबका पिंडदान ही करके छुटकारा पा लिया था। इसलिए ऐसी संतानों से बेहतर हम उनको मानते हैं जो नेहरू की तरह काम पर अधिक यकीन रखते हैं, पाखंड पर कम।
आज नेहरू की समाधि पर जाने के बजाय उसी वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सार्क देशों के आए हुए राष्ट्रप्रमुखों या शासनप्रमुखों से बातचीत की तैयारी में लगे थे। हफ्ते भर पहले यह किसने सोचा था कि मोदी अपने कामकाज का पहला दिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ बातचीत करके शुरू करेंगे? लेकिन एक नई सोच के साथ उन्होंने यह पहल की, और सरहद की सबसे बड़ी दिक्कत को सुलझाने की एक ऐसी कोशिश शुरू की, जो कि शायद नेहरू अपने वक्त करते, और उन्होंने बहुत से मौकों पर ऐसी बहुत सी अंतरराष्ट्रीय पहल की भी थीं। मोदी की इस एक पहल को लेकर उनकी नेहरू की अंतरराष्ट्रीय नीति से कोई तुलना करना गलत होगा, लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में इतना विशाल बहुमत लेकर आया हुआ प्रधानमंत्री पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों के मामले में जो पहला कदम उठाता है, उसे कम से कम एक पहले कदम की तरह परखने की जरूरत तो है ही।
हम परंपरागत श्रद्धांजलि को निहायत गैरजरूरी मानते हैं, और इस अखबार में भी हम श्रद्धांजलि लेखन को जगह नहीं देते हैं। खुद नेहरू बातों की जगह काम पर अधिक भरोसा रखते थे, और रीति-रिवाजों के बोझ से उन्होंने अपने आपको अलग रखा हुआ था। वे कड़ी मेहनत करने में भरोसा रखते थे, और मोदी सरकार के लोग, मोदी सरकार से लोग, कड़ी मेहनत की उम्मीद ही कर रहे हैं। बातों की लफ्फाजी के बजाय, फूलों के बजाय यह बेहतर है कि गांधी और नेहरू की सोच के कुछ टुकड़े ही सही, नरेन्द्र मोदी अपनी सरकार और देश को चलाते हुए इस्तेमाल करें। पाकिस्तान के साथ बातचीत की जो पहल आज इस वक्त दिल्ली में हो रही है, उससे दोनों देशों की तस्वीर बदल जाने की एक संभावना तो पैदा होती ही है। नरेन्द्र मोदी के बारे में हमने यहां लिखा भी है कि ऐतिहासिक चुनावी कामयाबी के बाद, उनके पास आगे इससे बड़ी कामयाबी साबित करना खासा मुश्किल काम होगा। लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्तों में तनाव अगर कम होता है, अगर सरहद पर आपसी खतरों को घटाकर फौजी खर्च को घटाया जा सकता है, अगर आपसी कारोबार से दोनों देशों का भला हो सकता है, तो यह नरेन्द्र मोदी के नाम इस चुनावी जीत से भी बड़ी जीत दर्ज होगी, और साथ-साथ पाकिस्तान के लीडर के नाम भी।
विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय नीति को अगर देखें, तो न चाहते हुए भी भारत की सरहद-पार की फिक्रों का एक गैरजरूरी बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की सरहद पर खर्च होता है। इस अकेले देश के साथ भारत के रिश्तों की कामयाबी या नाकामयाबी से ही उसकी विदेश नीति को आंका जाता है। इसलिए सबसे मुश्किल मोर्चे को अपने काम को सबसे पहले दिन छूने का जो हौसला नरेन्द्र मोदी ने दिखाया है, उसकी तारीफ उमर अब्दुल्ला जैसे नेता भी कर रहे हैं, और कांग्रेस के भीतर अब भी समझदारी की इक्का-दुक्का बातें करने वाले लोग भी मोदी की इस पहल की तारीफ कर चुके हैं। यह बहुत ही शर्मिंदगी की बात है कि नेहरू की कांग्रेस पार्टी ने मोदी की इस पाक-पहल के खिलाफ बड़ी बकवास की है।
आज के दिन कांग्रेस के बहुत से लोग दिल्ली में शांतिवन जाकर नेहरू को श्रद्धांजलि देकर आए होंगे, लेकिन बिना वहां गए मोदी ने सार्क देशों के साथ बातचीत करके आज का जो दिन गुजारना शुरू किया है, उससे बड़ी श्रद्धांजलि नेहरू को और कुछ नहीं दी जा सकती थी। ऐसे में मोदी की पोस्ट की गई ट्वीटांजलि हम काफी मानते हैं।

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