20 मई 2014
संपादकीय
लोकसभा में भाजपा संसदीय दल के नेता चुने जाने के मौके पर नरेन्द्र मोदी ने बड़प्पन की बहुत बातें कहीं। इनमें से एक बात जिस पर आज यहां चर्चा होनी चाहिए कि देश के लोगों ने किसी एक पार्टी या प्रधानमंत्री को वोट नहीं दिया है, उन्होंने देश की सरकार बनाई है। यह मौका न सिर्फ मोदी और भाजपा के लिए, बल्कि देश के लिए भी बहुत ऐतिहासिक मौका है और ऐसे में उनकी कही हुई इस बात को आगे बढ़ाने की जरूरत है। चुनाव निपट गए हैं, और कटुता का दौर खत्म हो गया है। अब जीते हुए सत्ता पक्ष और हारे हुए विपक्ष, इन दोनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी हमलावर और हल्की राजनीति से परे निभानी चाहिए। देश ने भाजपा को दिए हुए अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत के साथ दो बातें बड़ी साफ-साफ कही हैं। एक तो यह कि वह भाजपा को पांच बरस के लिए देश चलाने दे रहा है, और दूसरी बात यह कि वह कांग्रेस-दूसरी पार्टियों के घमंड के खिलाफ नाराजगी दिखा रहा है। अब अगर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस-दूसरी पार्टियों में से भाजपा घमंड दिखाने लगेगी, और विपक्ष सरकार चलाने नहीं देगा, तो यह जनता के फैसले के खिलाफ जाएगा। यह बात जितनी भाजपा को समझनी है, उतनी ही विपक्षी पार्टियों को भी समझनी है। इस बार के चुनावी फैसलों ने यह साबित किया है कि किस तरह धीरे-धीरे करके जनमत तैयार होता है और किस तरह वह पांच बरस में एक बार हिसाब चुकता कर सकता है, करता है। इसलिए आने वाले पांच बरस हर किसी को जिम्मेदारी के साथ पूरे करने चाहिए, और पिछले दिनों हमने यहां पर बार-बार यह बात लिखी है कि न सिर्फ देश के राजनीतिक दलों को, और नेताओं को, सबक लेना चाहिए, बल्कि इस बार के चुनावी नतीजों का सबक जिंदगी के बाकी दायरों में भी हर किसी को लेना चाहिए।
आज एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के सामने कई किस्म की चुनौतियां खड़ी हुई हैं। देश के कई राज्यों में भाजपा और एनडीए की कोई हस्ती नहीं है। कई राज्यों में सरकारें एनडीए-विरोधी पार्टियों की हैं। और इसके साथ-साथ देश की राजनीति का इतिहास बताता है कि राख में मिल चुकी, खाक हो चुकी पार्टियां भी पांच बरस पूरे होने के पहले कई बार उठकर खड़ी हो जाती हैं। इसलिए आज भाजपा संसदीय दल की बैठक में नरेन्द्र मोदी ने जिस विनम्रता से बड़प्पन की बातें कही हैं, उन बातों पर आने वाले दिनों में अमल भी दिखना चाहिए, वरना वो बातें सिर्फ एक खास मौके के भाषण का इतिहास बनकर रह जाएंगी, और वजन खो बैठेंगी।
भारत के लोकतंत्र, यहां की गरीब जनता, और यहां की विकास की संभावनाओं, इन सबके हित में यही है कि चुनावी राजनीति चुनाव के साथ खत्म हो, और अब संसदीय राजनीति एक परिपक्व केन्द्र-राज्य संबंधों के साथ देश को बेहतर बनाने का काम करे। नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों अपने बहुत से भाषणों और साक्षात्कारों में यह बात कही है कि वे प्रधानमंत्री की हैसियत से बदला निकालने के बजाय देश के विकास के काम में लगेंगे। आज नरेन्द्र मोदी को खुद अपनी बातों को सबसे अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि देश की जनता ने तो आजाद भारत के इतिहास में सबसे अधिक गंभीरता से एक अनोखे चुनाव में मोदी को मानो सीधे ही प्रधानमंत्री चुन लिया है, जनता तो देश के सामने खड़ी चुनौती पर खरी उतरी है, लेकिन अब मोदी के खरे उतरने की बारी है। दरअसल प्रधानमंत्री बन जाने के बाद मोदी के पास हासिल करने के और अधिक कुछ भी नहीं रहेगा, सिवाय इसके कि वे एक ऐतिहासिक प्रधानमंत्री बन सकें, और अपनी चुनावी साख से अधिक बढ़कर काम करने वाले एक प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को दर्ज कर सकें। और यह दर्ज करना महज आर्थिक पैमानों पर काफी नहीं होगा, इसके लिए सामाजिक और मानवीय पैमानों पर कामयाब होने की जरूरत भी होगी, और राजनीतिक दरियादिली और विनम्रता की जरूरत भी होगी। आज उन्होंने शब्दों में तो सभी के लिए विनम्रता दिखाई है, और आने वाले दिन उनके इन्हीं शब्दों को पकड़कर उनसे सवाल भी करेंगे।
लेकिन मोदी से परे देश की बाकी राजनीतिक ताकतों को भी अपने सिद्धांतों से कोई समझौता किए बिना संसद के भीतर और बाहर कितनी परिपक्वता और उदारता दिखानी होगी जो कि देश के भले के लिए जरूरी है। अब भी अगर चुनावी टकराव वाले तेवर कायम रहेंगे, तो ऐसे लोग चाहे सत्ता में हों, या विपक्ष में, वे अपनी जमीन खोएंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें